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आजमगढ़ में अखिलेश के गढ़ पर BJP की नजर, 10 सीटों पर सपा को घेरने की तैयारी

UP के जिला आजमगढ़ की दस विधानसभा सीटों पर सपा का कब्जा है। बीजेपी संगठन व जातीय संतुलन सहित नए चेहरों पर दांव लगाकर जीत दर्ज करने के लिए प्रयासरत है। वहीं एनडीए के सहयोगी दल भी यहां से सीटों की मांग कर रहे है।

yogi adityanath vs akhilesh yadav

योगी आदित्यनाथ और अखिलेश यादव। (AI-generated image )

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उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ में 2027 विधानसभा चुनाव को लेकर सियासी बिसात बिछने लगी है। कभी सपा का मजबूत गढ़ माने जाने वाले आजमगढ़ में इस बार बीजेपी पूरे दमखम के साथ सेंधमारी की तैयारी में है। दूसरी ओर समाजवादी पार्टी के सामने 2022 में जिले की सभी 10 विधानसभा सीटों पर मिली जीत को दोहराने की चुनौती है।

 

बीजेपी के लिए यह जिला इसलिए भी अहम है क्योंकि 2022 में यहां उसका खाता तक नहीं खुला था। अब पार्टी संगठन, जातीय समीकरण, स्थानीय मुद्दों और एनडीए के सहयोगी दलों के सहारे अपनी जमीन मजबूत करने में जुटी है। वहीं सपा अपने पुराने राजनीतिक आधार, विधायकों के कामकाज और पीडीए के सामाजिक समीकरण को मजबूत रखने की कोशिश में है।

 

इस बार मुकाबले में ओम प्रकाश राजभर की सुभासपा की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो सकती है। पार्टी ने आजमगढ़ की कुछ सीटों पर अपनी दावेदारी जताई है। अतरौलिया में सुभासपा और निषाद पार्टी की दावेदारी से एनडीए के भीतर सीटों का बंटवारा भी चर्चा का विषय बन गया है।

 

आजमगढ़ जिले में कुल 10 विधानसभा सीटें हैं। इनमें अतरौलिया, गोपालपुर, सगड़ी, मुबारकपुर, आजमगढ़ सदर, निजामाबाद, फूलपुर-पवई, दीदारगंज, लालगंज और मेंहनगर शामिल हैं। 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा ने इन सभी सीटों पर जीत दर्ज की थी। इससे पहले 2017 के चुनाव में भी जिले में सपा का मजबूत प्रदर्शन रहा था और बीजेपी को एक सीट पर जीत मिली थी।

 

आजमगढ़ की राजनीति में लंबे समय से सपा का प्रभाव रहा है। मुस्लिम-यादव समीकरण के साथ स्थानीय नेताओं की पकड़ ने पार्टी को कई सीटों पर मजबूती दी है। हालांकि 2022 में सपा की जीत के बावजूद कई सीटों पर बीजेपी और बसपा को भी अच्छा वोट मिला था। ऐसे में बीजेपी के लिए चुनौती अपने मत प्रतिशत को जीत में बदलने की है, जबकि सपा को अपने पुराने समर्थन को बनाए रखना होगा।

बीजेपी: संगठन, जातीय समीकरण और स्थानीय चेहरे

बीजेपी की रणनीति आजमगढ़ में केवल मोदी-योगी के नाम पर चुनाव लड़ने तक सीमित नहीं दिख रही। पार्टी बूथ स्तर पर संगठन को सक्रिय करने, पिछड़े और अति पिछड़े वर्गों तक पहुंच बढ़ाने तथा स्थानीय प्रभावशाली चेहरों को साथ जोड़ने पर काम कर रही है। बीजेपी की कोशिश है कि सपा के परंपरागत वोट आधार के अलावा उन वर्गों में भी अपनी पैठ बढ़ाई जाए, जहां एनडीए के सहयोगी दलों का प्रभाव है।

 

पार्टी के लिए यादव मतदाताओं के बीच भी अपनी स्वीकार्यता बढ़ाना एक चुनौती है। इसी कारण प्रत्याशी चयन में जातीय समीकरण, स्थानीय पकड़ और चुनावी प्रदर्शन को अहम माना जा रहा है। हालांकि अभी जिले की 10 सीटों पर बीजेपी ने अपने प्रत्याशियों की अंतिम सूची घोषित नहीं की है। ऐसे में पुराने चेहरों को दोबारा मौका मिलेगा या नए उम्मीदवार उतारे जाएंगे, यह आने वाले समय में साफ होगा।

सपा गढ़ बचाने के लिए विधायकों के कामकाज की परीक्षा

सपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने सभी 10 विधायकों की सीट बचाने की है। पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव के लिए आजमगढ़ राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण जिला रहा है। 2022 की जीत के पीछे पार्टी का पारंपरिक समर्थन, स्थानीय नेताओं की पकड़ और उस समय सुभासपा के साथ गठबंधन भी अहम रहा था। अब सुभासपा एनडीए में है, इसलिए पिछला चुनावी समीकरण बदल चुका है।

 

सपा को इस बार पीडीए के साथ-साथ स्थानीय विकास, रोजगार, स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क और बाढ़ जैसी समस्याओं को भी चुनावी मुद्दा बनाना होगा। जिले में विधायकों के कामकाज और जनता के बीच उनकी सक्रियता पर भी चर्चा है। ऐसे में पार्टी के सामने यह फैसला महत्वपूर्ण होगा कि मौजूदा विधायकों पर ही भरोसा किया जाए या कुछ सीटों पर नए चेहरों को मौका दिया जाए। टिकट तय करने में स्थानीय फीडबैक और जीतने की क्षमता अहम हो सकती है।

 

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NDA में राजभर की दावेदारी, अतरौलिया पर भी नजर

आजमगढ़ में बीजेपी के सहयोगी दलों में सबसे ज्यादा चर्चा ओम प्रकाश राजभर की सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी की है। सुभासपा ने 2027 के लिए 32 सीटों पर दावेदारी जताई है। इनमें आजमगढ़ मंडल की सीटें भी उसकी प्राथमिकता में बताई जा रही हैं। पार्टी की ओर से अतरौलिया, मेहनगर और दीदारगंज जैसी सीटों पर दावा सामने आया है।

 

सुभासपा के राष्ट्रीय महासचिव अरुण राजभर ने अतरौलिया से चुनाव लड़ने की इच्छा भी जाहिर की है। दूसरी ओर अतरौलिया में निषाद पार्टी का भी आधार और दावेदारी का पहलू है। 2022 में यहां निषाद पार्टी के प्रशांत सिंह एनडीए के उम्मीदवार के रूप में दूसरे स्थान पर रहे थे। ऐसे में बीजेपी के सामने सहयोगी दलों को साथ रखने और सीटों पर साझा उम्मीदवार तय करने की चुनौती होगी। जुलाई 2026 में बीजेपी अध्यक्ष नितिन नबीन की सहयोगी दलों के साथ हुई बैठक में सीटों पर दावेदारी से पहले आपसी समन्वय बढ़ाने और 2022 में हारी हुई सीटों पर मिलकर काम करने की बात सामने आई थी। 

अतरौलिया

अतरौलिया सीट पर 2022 में सपा के डॉ. संग्राम यादव ने 91,502 वोट हासिल कर जीत दर्ज की थी। निषाद पार्टी के प्रशांत सिंह को 74,255 और बसपा के डॉ. सरोज कुमार पांडेय को 51,293 वोट मिले थे। सपा की जीत का अंतर 17,247 वोट रहा था। इस सीट पर बीजेपी और उसके सहयोगियों के लिए चुनौती सपा की बढ़त को तोड़ने के साथ अपने गठबंधन का समीकरण साधने की भी है। सुभासपा के अरुण राजभर की दावेदारी और निषाद पार्टी की पिछली मौजूदगी से टिकट का सवाल अहम हो गया है। वहीं सपा के सामने डॉ. संग्राम यादव के कामकाज और पुराने समर्थन को बनाए रखने की चुनौती होगी। 

गोपालपुर

गोपालपुर सीट पर 2022 में सपा के नफीस अहमद को 84,401 वोट मिले थे। बीजेपी के सत्येंद्र राय को 60,094 और बसपा के रमेश चंद्र यादव को 45,211 वोट मिले थे। सपा ने 24,307 वोटों से जीत दर्ज की थी। इस सीट पर बीजेपी को अपनी पिछली हार का अंतर कम करने के लिए मजबूत स्थानीय उम्मीदवार और संगठन के सहारे मैदान में उतरना होगा। वहीं सपा को अपनी जीत का आधार बचाना होगा। 

सगड़ी

सगड़ी विधानसभा सीट पर 2022 में सपा के डॉ. एचएन सिंह पटेल को 83,093 वोट मिले थे। बीजेपी की वंदना सिंह को 60,578 और बसपा के शंकर यादव को 41,006 वोट मिले थे। सपा ने 22,515 वोटों से जीत हासिल की थी। यहां चुनावी चर्चा का बड़ा मुद्दा घाघरा नदी की बाढ़ और महुला-गढ़वल बांध की स्थिति है। बाढ़ प्रभावित गांवों में कटान, संपर्क मार्गों के टूटने और आवागमन की परेशानी से स्थायी राहत की मांग उठती रही है। तटबंधों की मजबूती और बाढ़ नियंत्रण के काम को लेकर सत्ता पक्ष के दावों की भी परीक्षा होगी। बीजेपी के लिए यहां स्थानीय समस्याओं को चुनावी मुद्दा बनाना अहम होगा।

मुबारकपुर

मुबारकपुर सीट पर 2022 में सपा के अखिलेश को 80,726 वोट मिले थे। बीजेपी के अरविंद जायसवाल को 51,623, बसपा के अब्दुस्सलाम को 48,734 और एआईएमआईएम के शाह आलम उर्फ गुड्डू जमाली को 36,460 वोट मिले थे। सपा ने 29,103 वोटों से जीत दर्ज की थी। इस सीट पर चार दलों के बीच वोटों का बंटवारा देखने को मिला था। आगामी चुनाव में बीजेपी की कोशिश अपना वोट आधार बढ़ाने की होगी। वहीं सपा के सामने अपनी पिछली बढ़त बनाए रखने की चुनौती होगी। बसपा और एआईएमआईएम की भूमिका भी चुनावी समीकरण को प्रभावित कर सकती है। 

 

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आजमगढ़ सदर

आजमगढ़ सदर सीट पर सपा के दुर्गा प्रसाद यादव लंबे समय से राजनीति में प्रभावशाली चेहरा रहे हैं। 2022 में उन्हें 1,00,813 वोट मिले थे, जबकि बीजेपी के अखिलेश कुमार मिश्रा को 84,777 और बसपा के सुशील कुमार सिंह को 39,281 वोट मिले थे। सपा ने 16,036 वोटों से जीत दर्ज की थी। बीजेपी को इस सीट पर 35 प्रतिशत से अधिक वोट मिले थे, जो उसके मजबूत आधार को दिखाता है। 

निजामाबाद

निजामाबाद सीट पर 2022 में सपा के आलमबदी आजमी को 79,835 वोट मिले थे। बीजेपी के मनोज को 45,648 और बसपा के पीयूष कुमार सिंह को 44,657 वोट मिले थे। सपा ने 34,187 वोटों के बड़े अंतर से जीत दर्ज की थी। बीजेपी और बसपा के बीच महज 991 वोटों का अंतर था। अब आलमबदी आजमी के निधन के बाद इस सीट पर सपा के नए नेतृत्व और उम्मीदवार को लेकर चर्चा अहम हो गई है। पार्टी को ऐसा चेहरा चुनना होगा जो पुराने समर्थन को अपने साथ बनाए रख सके। बीजेपी के लिए भी यह सीट महत्वपूर्ण है, क्योंकि पिछले चुनाव में वह बसपा से बहुत कम अंतर से आगे रही थी। 

फूलपुर-पवई

फूलपुर-पवई में 2022 के चुनाव में सपा के रमाकांत यादव को 81,164 वोट मिले थे। बीजेपी के रामसूरत को 55,858 और बसपा के शकील अहमद को 49,495 वोट मिले थे। सपा ने 25,306 वोटों से जीत दर्ज की थी। यहां बीजेपी और बसपा के बीच वोटों का अंतर 6,363 रहा था। इस सीट पर बसपा का वोट प्रतिशत भी उल्लेखनीय रहा, इसलिए आगामी चुनाव में उसके प्रदर्शन पर नजर रहेगी। बीजेपी की रणनीति अपने वोट आधार को बढ़ाने के साथ बसपा के मतदाताओं तक पहुंच बनाने की हो सकती है। 

दीदारगंज

दीदारगंज सीट पर 2022 में सपा के कमलाकांत राजभर को 74,342 वोट मिले थे। बीजेपी के कृष्ण मुरारी विश्वकर्मा को 60,781 और बसपा के भूपेंद्र सिंह को 47,094 वोट मिले थे। सपा ने 13,561 वोटों से जीत हासिल की थी। जिले की इन पांच सीटों के आंकड़ों में दीदारगंज पर सपा की जीत का अंतर सबसे कम था। इस सीट पर राजभर समुदाय का राजनीतिक प्रभाव और गैर-यादव पिछड़े वर्गों का समर्थन अहम माना जाता है। 2022 में सपा के साथ सुभासपा का गठबंधन था, लेकिन अब ओम प्रकाश राजभर एनडीए में हैं। ऐसे में बीजेपी और सुभासपा की संयुक्त रणनीति यहां महत्वपूर्ण हो सकती है।

लालगंज

लालगंज विधानसभा सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है। 2022 में सपा के बेचई सरोज को 83,767 वोट मिले थे। बीजेपी की नीलम सोनकर को 69,034 और बसपा के आजाद अरिमर्दन को 57,809 वोट मिले थे। सपा ने 14,733 वोटों से जीत दर्ज की थी। यहां तीनों दलों का अपना वोट आधार है। बीजेपी को अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए दलित मतदाताओं के बीच पकड़ बढ़ाने के साथ स्थानीय उम्मीदवार की स्वीकार्यता पर ध्यान देना होगा। बसपा का 26 प्रतिशत से अधिक वोट हासिल करना बताता है कि उसका आधार भी इस सीट पर मौजूद है।

मेंहनगर

मेंहनगर सीट भी अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है। 2022 में सपा की पूजा सरोज को 86,960 वोट मिले थे। बीजेपी की मंजू सरोज को 72,811 और बसपा के पंकज कुमार को 50,173 वोट मिले थे। सपा ने 14,149 वोटों से जीत हासिल की थी। इस सीट पर बीजेपी और बसपा दोनों का उल्लेखनीय वोट आधार है। सपा को अपनी जीत दोहराने के लिए संगठन और स्थानीय नेतृत्व को मजबूत रखना होगा। वहीं बीजेपी की कोशिश दलित मतदाताओं और गैर-यादव पिछड़े वर्गों के बीच अपनी पहुंच बढ़ाने की होगी। 

 लोकसभा चुनाव ने भी दिया सपा को आधार

आजमगढ़ की राजनीति में 2024 का लोकसभा चुनाव भी महत्वपूर्ण संदर्भ है। सपा ने आजमगढ़ और लालगंज दोनों संसदीय सीटों पर जीत दर्ज की थी। आजमगढ़ से धर्मेंद्र यादव और लालगंज से दरोगा प्रसाद सरोज सांसद चुने गए। इससे जिले में सपा की राजनीतिक मौजूदगी को मजबूती मिली। दूसरी ओर बीजेपी के सामने विधानसभा चुनाव में अपनी स्थिति सुधारने की चुनौती बनी हुई है। हालांकि लोकसभा और विधानसभा चुनाव के मुद्दे, उम्मीदवार और स्थानीय समीकरण अलग होते हैं, इसलिए 2024 के नतीजों को 2027 का सीधा संकेत नहीं माना जा सकता।

 

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 गठबंधन का गणित तय करेगा अगला मुकाबला

आजमगढ़ में 2027 का चुनाव कई स्तरों पर दिलचस्प होने जा रहा है। सपा को अपने सभी 10 मौजूदा विधायकों के प्रदर्शन, स्थानीय असंतोष और उम्मीदवारों की स्वीकार्यता को ध्यान में रखकर रणनीति बनानी होगी। वहीं बीजेपी को मजबूत प्रत्याशी उतारने के साथ एनडीए के सहयोगी दलों की दावेदारी को भी संतुलित करना होगा।

 

अतरौलिया, दीदारगंज और मेहनगर जैसी सीटों पर सुभासपा की भूमिका चर्चा में है, जबकि अतरौलिया में निषाद पार्टी की पिछली मौजूदगी भी गठबंधन के फैसले को प्रभावित कर सकती है। अपना दल (एस) और आरएलडी की भूमिका भी एनडीए के व्यापक सामाजिक समीकरण में देखी जाएगी।

 

फिलहाल किसी भी दल ने सभी 10 सीटों पर उम्मीदवारों की अंतिम सूची घोषित नहीं की है। ऐसे में आने वाले महीनों में संगठनात्मक गतिविधियां, स्थानीय नेताओं की सक्रियता, टिकट की दावेदारी और गठबंधन की बातचीत आजमगढ़ की सियासत की दिशा तय करने वाले प्रमुख पहलू होंगे।


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