बाबू सिंह कुशवाहा उत्तर प्रदेश के बड़े ओबीसी नेताओं में शुमार किए जाते हैं। वह मूल रूप से बहुजन समाज पार्टी के प्रोडक्ट हैं, जिन्होंने बसपा संस्थापक कांशीराम के संपर्क में आने के बाद 27 साल तक पार्टी के लिए काम किया और राजनीति की। कुशवाहा कभी बसपा सुप्रीमों मायावती के करीबी विश्वासपात्रों में शुमार किए जाते थे। उनकी गिनती बसपा के टॉप लीडरों में होती थी। मगर, कई विवादों में आने के बाद बसपा ने उन्हें पार्टी से निकाल दिया। बाद में वह बीजेपी में शामिल हुए लेकिन यहां से भी उनको चलता कर दिया गया।
इसके बाद उन्होंने साल 2016 में अपनी पार्टी 'जन अधिकार पार्टी' की स्थापना की। बाबू सिंह कुशवाहा की पार्टी 2022 के यूपी विधानसभा में लड़ी लेकिन उसे मुंह की खानी पड़ी और जमानत जब्त हो गई। मगर, समय का पहिया घुमा और वह 2024 लोकसभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी में शामिल हो गए। लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने उन्हें जौनपुर सीट से टिकट दिया और वह जीतकर सांसद बन गए।
यह भी पढ़ें: 'उनकी हिम्मत नहीं हुई मुझसे पूछने की', AAP ना छोड़ने वाले बलबीर सीचेवाल का बयान
यूपी की राजनीति में चर्चाएं तेज
दरअसल, बाबू सिंह कुशवाहा को लेकर कुछ दिनों से यूपी की राजनीति में चर्चाएं तेज हो गई हैं। सियासी गलियारों में चर्चा है कि कुशवाहा अपनी पार्टी जन अधिकार पार्टी और अपने वोट बैंक के सहारे उत्तर प्रदेश की दोनों बड़ी पार्टियों सपा और बीजेपी से बारगेनिंग कर रहे हैं। वह समाजवादी पार्टी और बीजेपी से आगामी 2027 के विधानसभा चुनाव में ज्यादा से ज्यादा सीटें मांग रहे हैं, ताकि उनकी सियासत यूपी के केंद्र में आ जाए।

कुशवाहा को सपा से क्या चाहिए?
बाबू सिंह कुशवाहा समाजवादी पार्टी के टिकट पर पहली बार जौनपुर से सांसद बने। पिछले एक हफ्ते से चर्चा है कि कुशवाहा सपा के साथ गठबंधन में रहते हुए 30 मांग रहे हैं। हालांकि, उनकी तरफ से इस तरह का कोई बयान सामने नहीं आया है। उनके समर्थक सोशल मीडिया पर लगातार इस बात को भी उठा रहे हैं कि बाबू सिंह कुशवाहा 20 सीटों पर सपा गठबंधन में मान जाएंगे।
इस थ्योरी के अलावा एक और चर्चा हो रही है कि बाबू सिंह कुशवाहा को बीजेपी ने अपनी तरफ से ऑफर दिया है। चर्चा है कि बीजेपी कुशवाहा को एनडीए में आने पर 5 सीट और एक एमएलसी सीट देने का ऑफर दे रही है। ऐसे में अचानक से बाबू सिंह कुशवाहा की यूपी की राजनीति में चर्चा होने लगी है। हालांकि कुछ लोग इसे कुशवाहा की दबाव की राजनीति के तौर पर देखा जा रहा है।
यह भी पढ़ें: केजरीवाल के 'भरोसेमंद सिपाही' रहे राघव चड्ढा का जाना AAP के लिए कितना बड़ा झटका?
किस आधार पर सीटों की मांग?
बाबू सिंह कुशवाहा वर्तमान की राजनीति के हिसाब से यूपी की सियायत के लिए जरूरी बन गए हैं। वह ओबीसी वर्ग से आते हैं लेकिन नॉन यादव हैं। उनके जाति के वोटरों की संख्या चुनावों के दौरान निर्णायक होती है। वह कुशवाहा, सैनी और शाक्य जैसी ओबीसी जातियों का प्रतिनिधित्व करने का दावा करते हैं। इन वर्गों की अखिलेश यादव की PDA (पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक) रणनीति में इनकी बड़ी भूमिका रहने वाली है। इसी को लेकर बाबू सिंह कुशवाहा एक बार कह भी चुके हैं कि 'हम वोट ट्रांसफर करा सकते हैं, इसलिए हिस्सेदारी भी उसी हिसाब से हो।'
ऐसे में 2024 लोकसभा चुनाव में उन्होंने जौनपुर से जीत हासिल करके अपना दावा मजबूत किया है कि वह वे सिर्फ छोटे दल के नेता नहीं हैं बल्कि वोट दिलाने वाले नेता हैं। कुशवाहा का असर खासकर पूर्वांचल में जौनपुर और वाराणसी बेल्ट में माना जाता है इसलिए वे उन सीटों पर दावा कर रहे हैं जहां उनकी जातीय और स्थानीय पकड़ है।