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पंजाब में सरकार बनाने के लिए अकाली दल को साथ लेगी BJP? जानिए क्यों है जरूरी

पंजाब में भारतीय जनता पार्टी और शिरोमणि अकाली दल के बीच गठबंधन की खबरें सुर्खियों में है। पार्टी के नेताओं का कहना है कि गठबंधन के दरवाजे अभी भी खुले हैं।

Punjab politics BJP and Shiromani Akali Dal

बीजेपी और शिरोमणि अकाली दल, Photo Credit: SORA

पंजाब की राजनीति में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) और उनकी पुरानी सहयोगी शिरोमणि अकाली दल के बीच गठबंधन की खबरें एक बार फिर सुर्खियों में हैं। एक न्यूज रिपोर्ट में दावा किया गया कि बीजेपी-अकाली गठबंधन के दरवाजे अभी बंद नहीं हुए हैं। रिपोर्ट में पार्टी के एक नेता के हवाले से बताया गया है कि गठबंधन की संभावना अभी भी है। इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद पंजाब में सियासी हलचल तेज हो गई है। आम आदमी पार्टी ने बीजेपी और अकाली दल पर हमला तेज कर दिया है। 

 

रिपोर्ट में बताया गया कि बीजेपी अध्यक्ष पंजाब के दौरे पर 20 से 22 जून तक रहेंगे। इस दौरान वह कई कार्यक्रमों में शामिल होंगे। इस दौरान वह राज्य में आगामी विधानसभा चुनाव के लिए रणनीति पर चर्चा कर सकते हैं। पार्टी सूत्रों के हवाले से बताया गया है कि 2024 लोकसभा चुनाव से पहले भी गठबंधन पर चर्चा हुई थी लेकिन सीटों को लेकर पेंच फस गया था। बीजेपी को 13 में से सिर्फ 3 सीट ही दी जा रही थी। इसलिए गठबंधन नहीं हो सका। 

 

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2020 में टूटा था गठबंधन

पंजाब में बीजेपी और अकाली दल दशकों तक एक साथ रहा है। इसे एक हिंदू-सिख गठबंधन के तौर पर भी देखा जाता था। 2007 से 2017 तक लगातार पार्टी सत्ता में भी रही। हालांकि, 2017 में हार के बाद 2019 में हुए लोकसभा चुनाव में पार्टी को झटका लगा। इसके बावजूद हरसिमरत कौर बादल को केंद्रीय मंत्रिमंडल में जगह मिली। इसके बाद 2020 में किसान कानूनों को लेकर अकाली दल ने बीजेपी से रिश्ता तोड़ लिया और गठबंधन और सरकार दोनों से अलग हो गए। इसके बाद 2022 विधानसभा चुनाव और 2024 लोकसभा चुनाव में दोनों दल साथ नहीं आए।

गठबंधन मजबूरी क्यों?

पंजाब बीजेपी के दिग्गज नेता और पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने कहा है कि बीजेपी बिना अकाली दल के 2027 तो छोड़िए 2032 में भी सरकार नहीं बना सकती। सुनील जाखड़ का भी कुछ ऐसा ही मानना है कि सरकार बनाने के लिए बीजेपी को गठबंधन करना होगा। इन दोनों बड़े नेताओं का ऐसा कहना कई सियासी समीकरणों और सच्चाईयों क दिखाता है। पंजाब में बीजेपी और अकाली दल दोनों को एक दूसरे की जरूरत है। क्यों?

  • बीजेपी पर हिंदू पार्टी का टैग, अकाली पर सिख, दोनों मिलकर दो बड़े वोट बैंक को साधते हैं।
  • अकाली दल जमीन पर मजबूत लेकिन नेतृत्व संकट। 
  • बीजेपी जमीन पर कमजोर लेकिन नेताओं की लंबी कतार। पीएम मोदी समेत केंद्रीय नेतृत्व का साथ।
  • हिंदू-सिख वोटर्स के बंटने से दोनों को नुकसान।
  • कमजोर विकल्प के कारण पार्टी के वोटर AAP की ओर गए।
  • सरकार बनाने से काफी दूर नजर आ रहे हैं। ऐसे में कार्यकर्ताओं में उत्साह नहीं। 
  • गठबंधन टूटने से दोनों दल कमजोर हुए।

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बिन गठबंधन सत्ता का रास्ता मुश्किल

अकाली दल पंजाब की राजनीति में बड़ा खिलाड़ी रहा है। हालांकि, 2017 में अकाली दल का ग्राफ गिरना शुरू हो गया था। 2017 के चुनावों में अकाली दल मात्र 15 सीटों पर सिमट गई थी। इसके बाद से अकाली दल और बीजेपी का गठबंधन टूट गया और कई बड़े नेताओं ने पार्टी भी छोड़ दी थी। सुखबीर सिंह बादल के पुराने फैसलों के चलते पार्टी को विरोध का सामना करना पड़ा। बीजेपी भी गठबंधन के बाद पंजाब की राजनीति में कुछ खास नहीं कर पाई। विधानसभा चुनाव और लोकसभा चुनाव में पार्टी को कांग्रेस से बड़े नेताओं को तोड़ने के बावजूद भी सफलता नहीं मिली।

 

2022 विधानसभा चुनाव में बीजेपी 2 सीट पर तो अकाली दल 3 सीट पर सिमट गई। बीजेपी के बड़े नेताओं ने पंजाब में मेहनत की लेकिन पंजाब का किला बीजेपी के लिए अभेद ही रहा। अकाली दल के लिए यह अब तक की सबसे शर्मनाक हार थी। पार्टी के बड़े नेता और 11 बार विधायक रहे प्रकाश सिंह बादल, पार्टी प्रधान सुखबीर सिंह बादल भी अपनी सीट नहीं बचा पाए थे। बादल परिवार के सदस्य और सभी करीबी चुनाव में अपनी सीट भी नहीं बचा पाए। अकाली दल को 18.38 प्रतिशत वोट मिले थे, जो 2017 के चुनाव से करीब 7 प्रतिशत कम थे। बीजेपी ने पूरे दमखम के साथ विधानसभा चुनाव लड़ा था लेकिन पार्टी को सिर्फ 6.6 प्रतिशत वोट ही मिले, जो 2017 के चुनाव में मिले 5.4 प्रतिशत वोट से कुछ ही ज्यादा थे। ऐसे में दोनों पार्टियों को गठबंधन के बिना चुनाव लड़ने का नुकसान हुआ। 

मुश्किलें समझिए

अमित शाह ने अपने पंजाब दौरे के दौरान साफ कर दिया है कि बीजेपी अकेले चुनाव लड़ेगी। बीजेपी ने इसके लिए रणनीति पर काम करना भी शुरू कर दिया है। हरियाणा के सीएम को मैदान में उतारकर बीजेपी ने ओबीसी वोटबैंक को साधने की कोशिश की है। इसके साथ ही एक जट्ट सिख को पार्टी अध्यक्ष बनाकर संकेत दे दिया है कि उन्हें अब सिख वोट के लिए अकाली दल की जरूरत नहीं है। इसके साथ ही बीजेपी अकाली दल की शर्तों पर गठबंधन के लिए कभी तैयार नहीं होगी, क्योंकि अकाली दल 2017 से पहले ही तरह गठबंधन चाहती है लेकिन बीजेपी का मानना है कि उनकी ताकत बढ़ी है। यानी बीजेपी अब जूनियर पार्टनर नहीं बनना चाहती है। 

 

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करीब पांच दशक तक साथ रहे

शिरोमणि अकाली दल भारतीय जनता पार्टी का सबसे पुराना सहयोगी था। बीजेपी और अकाली दल 1969 में एक साथ आए थे। उस समय जन संघ ने अकाली दल की सरकार को बाहर से समर्थन दिया था। 1992 तक बीजेपी और अकाली दल अलग-अलग चुनाव लड़ते थे लेकिन चुनाव के बाद एक साथ आ जाते थे। 1994 तक अकाली दल सिर्फ सिखों की पार्टी थी लेकिन इसके बाद अन्य धर्मों के लोगों के लिए भी रास्ते खोले गए। इसके बाद 1997 में बीजेपी और अकाली दल ने एक साथ चुनाव लड़ा था। अकाली बीजेपी का गठजोड़ पंजाब में कई सालों तक कामयाब रहा और पार्टी कई बार सत्ता में आई।

 

2017 के विधानसभा चुनाव में गठबंधन पंजाब की सत्ता से बाहर हुआ और 2020 में 25 साल पुराना गठबंधन किसान कानूनों के कारण टूट गया। अकाली दल ने किसान कानूनों का विरोध किया। 17 दिसंबर 2020 को किसान कानूनों के विरोध में हरसिमरत कौर बादल ने केंद्रीय मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया था। इसके बाद हुए विधानसभा चुनाव और 2024 के लोकसभा चुनाव दोनों दलों ने अलग-अलग लड़े। अकाली दल ने बहुजन समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन कर एक नया प्रयोग किया, जो बुरी तरह असफल रहा। अब दोनों पार्टियों में अंदरखाने गठबंधन की मांग उठ रही है लेकिन बीजेपी के नेताओं का कहना है कि गठबंध का फैसला तो आलाकमान ही करेगा। 


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