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BJP ने शुरू किया मिशन-61, सपा के गढ़ में सेंध लगाने की तैयारी

यूपी में 2017 से ही सरकार चला रही बीजेपी के लिए अभी भी कुछ सीटें ऐसी हैं जहां वह लगातार हार रही है। इन सीटों पर जीत के लिए अब उसने मिशन 61 शुरू किया है।

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योगी आदित्यनाथ, File Photo Credit: Social Media

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उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने अभी से चुनावी रणनीति पर काम शुरू कर दिया है। पार्टी ने उन 61 विधानसभा सीटों को चिह्नित किया है, जहां वह 2012, 2017 और 2022 के लगातार तीन विधानसभा चुनावों में जीत दर्ज नहीं कर सकी। इन सीटों को जीतने के लिए बीजेपी ने विशेष अभियान शुरू किया है, जिसे संगठन के भीतर 'मिशन-61' नाम दिया गया है।


राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर बीजेपी इन सीटों पर प्रदर्शन सुधारने में सफल रहती है तो लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी के साथ 300 से ज्यादा सीटों का लक्ष्य भी हासिल कर सकती है। यही वजह है कि संगठन से लेकर सरकार तक इन सीटों पर विशेष नजर रखी जा रही है।

 

पूर्वांचल की 22 सीटें बीजेपी के लिए सबसे बड़ी चुनौती

मिशन-61 में सबसे ज्यादा फोकस पूर्वांचल की उन सीटों पर है, जहां समाजवादी पार्टी का परंपरागत जनाधार मजबूत माना जाता है। आजमगढ़, मऊ, गाजीपुर, अंबेडकरनगर, संतकबीरनगर, भदोही और बलिया जिले की कई सीटें बीजेपी की प्राथमिकता सूची में शामिल हैं। इनमें अतरौलिया, गोपालपुर, सगड़ी, मुबारकपुर, निजामाबाद, दीदारगंज, मोहम्मदाबाद गोहना, मऊ सदर, जहूराबाद, जखनियां, मल्हनी, केराकत, सकलडीहा, जंगीपुर और जमानियां जैसी सीटें प्रमुख हैं। इन क्षेत्रों में बीजेपी गैर-यादव पिछड़ों, दलितों और लाभार्थी वर्ग के बीच पकड़ मजबूत करने की रणनीति पर काम कर रही है।

 

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पश्चिमी यूपी की 13 सीटों पर भी विशेष अभियान

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सहारनपुर, बिजनौर, मुरादाबाद, संभल और बागपत की कई सीटें भी मिशन-61 का हिस्सा मानी जा रही हैं। इन क्षेत्रों में मुस्लिम, जाट और दलित मतदाताओं का प्रभाव अधिक है। बीजेपी यहां राष्ट्रीय लोकदल और अन्य सहयोगी दलों के सहारे सामाजिक समीकरण मजबूत करने की कोशिश कर रही है।


बेहट, देवबंद, नकुड़, मुरादाबाद ग्रामीण, कुंदरकी, कांठ, ठाकुरद्वारा, चांदपुर, नजीबाबाद, धामपुर और नूरपुर जैसी सीटों पर पार्टी विशेष रणनीति के तहत काम कर रही है।

बूथ स्तर तक तैयार हो रहा चुनावी खाका

बीजेपी ने मिशन-61 के तहत हर विधानसभा सीट का अलग-अलग सामाजिक और राजनीतिक अध्ययन शुरू कर दिया है। पार्टी यह पता लगाने में जुटी है कि किन बूथों पर लगातार कमजोरी रही, किन जातीय समूहों में उसकी पकड़ कमजोर है और किन स्थानीय मुद्दों ने चुनावी परिणामों को प्रभावित किया।

 

कार्यकर्ताओं को घर-घर संपर्क अभियान चलाने, लाभार्थियों तक पहुंच बनाने और बूथ समितियों को सक्रिय करने के निर्देश दिए गए हैं। सांसदों, विधायकों और वरिष्ठ नेताओं को भी इन सीटों पर विशेष जिम्मेदारी सौंपी गई है।

 

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सपा के लिए क्यों बढ़ी चिंता?

मिशन-61 की बड़ी संख्या ऐसी सीटों की है जहां वर्तमान में समाजवादी पार्टी या उसके सहयोगी दल मजबूत स्थिति में हैं। 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा ने पूर्वांचल और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई क्षेत्रों में बीजेपी को कड़ी चुनौती दी थी।

 

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि बीजेपी इन सीटों पर अपनी स्थिति मजबूत करने में सफल हो जाती है तो इसका सीधा असर समाजवादी पार्टी के विधानसभा प्रदर्शन पर पड़ सकता है। यही कारण है कि बीजेपी का यह अभियान विपक्ष, खासकर सपा, के लिए चिंता का विषय बनता जा रहा है।

जातीय समीकरण साधने पर भी जोर

मिशन-61 के तहत बीजेपी गैर-यादव पिछड़े वर्ग, गैर-जाटव दलित, महिलाओं और सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों को अपने साथ जोड़ने की रणनीति पर काम कर रही है। पार्टी का मानना है कि इन वर्गों में मजबूत पकड़ विपक्ष की सामाजिक समीकरण आधारित राजनीति को चुनौती दे सकती है।


इस अभियान में बीजेपी के सहयोगी दल अपना दल (एस) और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी की भूमिका भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। दोनों दल अपने-अपने प्रभाव वाले क्षेत्रों में संगठन को मजबूत करने और सामाजिक आधार बढ़ाने में जुटे हैं।

2027 की लड़ाई का केंद्र बन सकती हैं ये सीटें

राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि 2027 का चुनाव केवल बड़े नेताओं और मुद्दों का नहीं, बल्कि बूथ प्रबंधन और सामाजिक समीकरणों का चुनाव होगा। ऐसे में मिशन-61 की ये सीटें सत्ता की राह तय करने में निर्णायक भूमिका निभा सकती हैं। बीजेपी जहां इन क्षेत्रों में जीत का सूखा खत्म करना चाहती है, वहीं सपा अपने मजबूत गढ़ बचाने की चुनौती का सामना कर रही है।


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