उत्तर प्रदेश की दलित राजनीति में नई सियासी हलचल दिखाई दे रही है। आज़ाद समाज पार्टी (कांशीराम) के राष्ट्रीय अध्यक्ष चंद्रशेखर आज़ाद लगातार सड़क से लेकर संसद तक अपनी सक्रियता बढ़ा रहे हैं। दिल्ली के जंतर-मंतर पर आंदोलनों में भागीदारी, संसद के बाहर विपक्ष के समर्थन में प्रदर्शन और उत्तर प्रदेश के जिलों में लगातार दौरे के जरिए वह खुद को दलित, पिछड़े और युवा वर्ग की मजबूत आवाज़ के रूप में स्थापित करने की कोशिश में जुटे हैं।
दूसरी ओर बहुजन समाज पार्टी भी इस बदलते राजनीतिक माहौल को देखते हुए संगठन में नई ऊर्जा भरने की तैयारी कर रही है। राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि मायावती ने इसी रणनीति के तहत आकाश आनंद को दोबारा उत्तर प्रदेश की राजनीति में सक्रिय करने का फैसला किया है।
पश्चिमी यूपी से लेकर बुंदेलखंड तक बढ़ा रहे संगठन
चंद्रशेखर आज़ाद का सबसे मजबूत राजनीतिक आधार पश्चिमी उत्तर प्रदेश माना जाता है। सहारनपुर, देवबंद, नकुड़, शामली, मुजफ्फरनगर, मेरठ, बिजनौर और हापुड़ जैसे जिलों में उनकी संगठनात्मक पकड़ लगातार मजबूत हुई है। इसके अलावा आगरा, अलीगढ़, हाथरस और बुलंदशहर में भी पार्टी संगठन को विस्तार देने की कोशिश की जा रही है। पिछले कुछ महीनों में उन्होंने प्रयागराज, वाराणसी, लखनऊ, कानपुर, अयोध्या और बुंदेलखंड के कई जिलों का भी दौरा कर कार्यकर्ताओं के साथ बैठकें की हैं।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में संगठन खड़ा करने के बाद अब चंद्रशेखर आज़ाद का फोकस अवध और पूर्वांचल की ओर है। इसके लिए लगातार जिला स्तर पर बैठकें, सदस्यता अभियान और युवाओं को जोड़ने के कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। पार्टी की कोशिश है कि 2027 विधानसभा चुनाव से पहले पूरे प्रदेश में बूथ स्तर तक संगठन तैयार किया जाए।
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युवाओं में बढ़ती सक्रियता पर BSP की नजर
बसपा नेतृत्व भी मानता है कि दलित युवाओं के बीच नई राजनीतिक पसंद उभर रही है। इसी कारण पार्टी लगातार जिलों में प्रभारी नियुक्त कर संगठन को सक्रिय करने में जुटी है। माना जा रहा है कि मायावती ने आकाश आनंद को उत्तर प्रदेश में दोबारा सक्रिय कर युवा वर्ग और नए मतदाताओं के बीच पार्टी की पकड़ मजबूत करने की रणनीति बनाई है।
राजनीतिक चर्चाओं के अनुसार आकाश आनंद को राजस्थान की जिम्मेदारियों से वापस बुलाकर उत्तर प्रदेश में सक्रिय किया गया है। संभावना जताई जा रही है कि वह प्रदेशभर में संगठनात्मक बैठकें करेंगे, युवाओं से संवाद बढ़ाएंगे और सोशल मीडिया के साथ जमीनी अभियान को भी गति देंगे। यह भी चर्चा है कि वह दिल्ली के जंतर-मंतर पर चल रहे आंदोलनों या विपक्षी कार्यक्रमों में भी दिखाई दे सकते हैं, हालांकि इस पर बसपा की ओर से कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है।
BSP का वोट प्रतिशत लगातार घटा
एक समय उत्तर प्रदेश की सत्ता पर पूर्ण बहुमत से काबिज रही बसपा का चुनावी प्रदर्शन पिछले कुछ वर्षों में कमजोर हुआ है। 2012 के बाद पार्टी सत्ता से बाहर हुई और 2017 तथा 2022 के विधानसभा चुनावों में उसका जनाधार काफी सिमटा। 2024 के लोकसभा चुनाव में भी पार्टी कोई सीट नहीं जीत सकी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि दलित वोटों का एक हिस्सा विभिन्न दलों में बंटा है और इसी कारण बसपा अब संगठन को नए सिरे से मजबूत करने की कोशिश कर रही है।
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2027 में दलित राजनीति का मुकाबला होगा दिलचस्प
उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले दलित वोट बैंक को लेकर मुकाबला और तेज होने के संकेत हैं। एक ओर चंद्रशेखर आज़ाद लगातार आंदोलन, जनसंपर्क और संगठन विस्तार के जरिए अपनी राजनीतिक जमीन बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर बसपा अपने पारंपरिक जनाधार को मजबूत बनाए रखने के लिए आकाश आनंद के नेतृत्व में नई रणनीति पर काम करती दिखाई दे रही है। आने वाले महीनों में यह सियासी मुकाबला उत्तर प्रदेश की राजनीति की सबसे महत्वपूर्ण लड़ाइयों में से एक माना जा रहा है।