उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव 2027 भले अभी दूर हों लेकिन पूर्वांचल की राजनीति में अभी से नए समीकरण बनने लगे हैं। गोरखपुर और आसपास के जिलों में राजनीतिक गलियारों में एक सवाल बार-बार सुनाई दे रहा है कि आखिर 2027 में पूर्वांचल की राजनीति पर किसका असर ज्यादा दिखाई देगा? मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाला गोरखनाथ मठ या फिर पूर्व मंत्री हरिशंकर तिवारी की राजनीतिक विरासत का केंद्र रहा उनका चर्चित ‘हाता’?
एक समय था जब गोरखपुर की राजनीति में मठ और हाता दो ऐसे केंद्र माने जाते थे, जिनकी चर्चा के बिना पूर्वांचल की राजनीति अधूरी मानी जाती थी। हालांकि समय के साथ हालात बदले हैं लेकिन दोनों की राजनीतिक और सामाजिक पहचान आज भी कायम है।
जब हाते से तय होती थी पूर्वांचल की राजनीति
हरिशंकर तिवारी पूर्वांचल की राजनीति का वह चेहरा थे, जिन्होंने अपने दम पर राजनीतिक साम्राज्य खड़ा किया। चिल्लूपार विधानसभा क्षेत्र से कई बार विधायक रहे हरिशंकर तिवारी ने प्रदेश की विभिन्न सरकारों में मंत्री रहते हुए मजबूत राजनीतिक नेटवर्क तैयार किया। गोरखपुर स्थित उनका ‘हाता’ केवल आवास नहीं बल्कि राजनीतिक गतिविधियों का बड़ा केंद्र माना जाता था।
कहा जाता है कि पूर्वांचल के कई जिलों के नेता, ठेकेदार, व्यापारी और स्थानीय जनप्रतिनिधि नियमित रूप से हाते में पहुंचते थे। ब्राह्मण समाज में उनकी गहरी पैठ थी और पूर्वांचल की राजनीति में उनका प्रभाव लंबे समय तक बना रहा।
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हरिशंकर तिवारी की राजनीति की शैली क्या थी?
हरिशंकर तिवारी की राजनीति की सबसे बड़ी विशेषता व्यक्तिगत संपर्क और सामाजिक नेटवर्क था। वह जातीय समीकरणों को साधने के साथ-साथ अपने समर्थकों के सुख-दुख में शामिल रहने वाले नेता माने जाते थे। पूर्वांचल के ग्रामीण इलाकों में आज भी उनके समर्थक बताते हैं कि हाते से कोई भी व्यक्ति खाली हाथ नहीं लौटता था। उनकी राजनीति का आधार संगठन से ज्यादा व्यक्तिगत प्रभाव और सामाजिक संबंध थे। यही वजह थी कि सत्ता में रहने या विपक्ष में होने के बावजूद उनका राजनीतिक महत्व बना रहा।
क्या तिवारी परिवार अब भी प्रभावी है?
हरिशंकर तिवारी के निधन के बाद उनकी राजनीतिक विरासत को उनके बेटे विनय शंकर तिवारी आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि, बदले राजनीतिक माहौल में परिवार को पहले जैसी सफलता नहीं मिल पाई है। 2022 के विधानसभा चुनाव में चिल्लूपार सीट बीजेपी के खाते में चली गई। फिर भी राजनीतिक जानकार मानते हैं कि चिल्लूपार, बड़हलगंज और आसपास के इलाकों में तिवारी परिवार का एक स्थायी जनाधार आज भी मौजूद है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
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योगी के नेतृत्व में मठ की बढ़ी ताकत
दूसरी ओर गोरखनाथ मठ का प्रभाव पिछले एक दशक में काफी बढ़ा है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में मठ केवल धार्मिक संस्था नहीं बल्कि पूर्वांचल की राजनीति का सबसे बड़ा शक्ति केंद्र बन चुका है। मुख्यमंत्री बनने के बाद योगी आदित्यनाथ ने गोरखपुर को अपनी राजनीतिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र बनाए रखा। जनता दर्शन, विकास परियोजनाओं की निगरानी, प्रशासनिक बैठकों और लगातार जनसंपर्क के जरिए उन्होंने क्षेत्र में अपनी मजबूत पकड़ बनाई है।
2027 के चुनाव में सबसे बड़ा अंतर यही है कि अब राजनीति केवल जातीय समीकरणों तक सीमित नहीं रह गई है। बीजेपी विकास कार्यों, कानून-व्यवस्था और संगठनात्मक मजबूती को अपना आधार बना रही है। वहीं तिवारी परिवार के पास आज भी राजनीतिक विरासत, ब्राह्मण समाज में प्रभाव और पुराने समर्थकों का नेटवर्क मौजूद है। यही वजह है कि पूर्वांचल की राजनीति में उनका नाम अभी भी चर्चा में बना रहता है।
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2027 में किसका पलड़ा भारी?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि पूरे गोरखपुर और पूर्वांचल की बात की जाए तो वर्तमान समय में योगी आदित्यनाथ और गोरखनाथ मठ का प्रभाव स्पष्ट रूप से ज्यादा मजबूत दिखाई देता है। सत्ता, संगठन और सरकारी योजनाओं का लाभ बीजेपी के पक्ष में जाता दिख रहा है। हालांकि, चिल्लूपार और आसपास के कुछ इलाकों में तिवारी परिवार अभी भी चुनावी समीकरणों को प्रभावित करने की क्षमता रखता है। अगर विपक्ष ब्राह्मण वोटों को एकजुट करने की रणनीति अपनाता है तो तिवारी परिवार की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।
एक दौर में गोरखपुर का हाता पूर्वांचल की राजनीति का सबसे चर्चित पता था। आज गोरखनाथ मठ प्रदेश की सत्ता का प्रमुख केंद्र है। ऐसे में 2027 का चुनाव केवल सीटों की लड़ाई नहीं होगा, बल्कि यह भी तय करेगा कि पूर्वांचल की राजनीति में विरासत का प्रभाव ज्यादा मजबूत रहता है या फिर संगठन और सत्ता की ताकत। फिलहाल राजनीतिक तस्वीर में योगी आदित्यनाथ का मठ भारी नजर आता है लेकिन हरिशंकर तिवारी की विरासत अभी भी पूर्वांचल की राजनीति से पूरी तरह बाहर नहीं हुई है।