कैसे एक विवादित समझौता त्रिपुरा में आदिवासी राजनीति को दे रहा नया रूप?
त्रिपुरा में आदिवासी समुदाय के अधिकारों को लेकर राज्य की दो मुख्य पार्टियों के बीच तल्खियां बढ़ गई हैं, जो आगे भी कम नहीं होंगी।

प्रद्योत देबबर्मा। Photo Credit- PTI
त्रिपुरा में भारतीय जनता पार्टी और टिपरा मोथा पार्टी का गठबंधन मार्च 2024 में हुआ था। चुनाव बाद बीजेपी ने जब सरकार बनाई तो इसके एक साल बाद टिपरा मोथा सरकार में शामिल हुई। यानी यह चुनाव बाद का गठबंधन बना था। दरअसल, राज्य में पहली बार विधानसभा चुनाव लड़ी प्रद्योत देबबर्मा की पार्टी ने अकेले दम पर 13 सीटें जीतकर राज्य में बड़ी राजनीतिक ताकत बनकर उभरी। लगभग दो साल से तक बीजेपी के साथ गठबंधन में टिपरा मोथा ने सरकार चलाई। मगर, हाल के महीनों में दोनों दलों के बीच काफी उतार-चढ़ाव देखने को मिला है।
इस गठबंधन के पीछे सबसे मुख्य कारण आदिवासी मुद्दे, ग्रेटर टिपरालैंड और आदिवासी अधिकारों की मांग था। दोनों दलों में बातचीत होने के बाद केंद्र और राज्य सरकार के साथ एक समझौता हुआ, जिसमें आदिवासी विकास के वादे शामिल थे। सरकार में शामिल होने के बाद टिपरा मोथा को सरकार में मंत्री पद मिला, जिससे उसे नीतिगत प्रभाव मिला। मगर, वर्तमान में एक विवादित समझौते की वजह से त्रिपुरा में आदिवासी राजनीति को नया रूप मिल रहा है। आइए जानते है कि आखिर यह पूरा मामला क्या है...
टिपरा मोथा-बीजेपी के बीच का समझौता
टिपरा मोथा के अध्यक्ष प्रद्योत किशोर देबबर्मा ने बीजेपी के साथ जो समझौता किया था, उसपर अब परत जम गई है। उन्होंने बीजेपी से समझौता किया था कि आदिवासी समाज के मुख्य मुद्दों और उनकी मांगों पर केंद्र-राज्य और पार्टी मिलकर काम करेगी, मगर उन्होंने कहा कि इसपर कोई ठोस काम नहीं हुआ है। उनके आरोप के बाद गठबंधन लगभग टूट गया है। अब दोनों दल त्रिपुरा में विरोधी हो गए हैं। जैसे-जैसे 12 अप्रैल की तारीख नजदीक आ रही है वैसे-वैसे दोनों के बीच तल्खियां और अधिक आ रही है।
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दरअसल, 12 को त्रिपुरा ट्राइबल एरियाज ऑटोनॉमस डिस्ट्रिक्ट काउंसिल (TTAADC) के चुनाव होने हैं। काउंसिल में अभी टिपरा मोथा काबिज है। इन घटनाक्रमों के बीच टिपरा मोथा के नेता और विधायक पार्टी छोड़कर बीजेपी में शामिल हो रहे हैं। साथ ही समझौता अभी तक लागू नहीं हुआ है। गठबंधन टूटने के बाद TTAADC के चुनाव यह तय कर देंगे कि त्रिपुरा में आखिर ट्राइबल राजनीति की असपी पावर किसके पास है। बीजेपी या फिर टिपरा मोथा के पास?
प्रद्योत ने बीजेपी पर लगाए गंभीर आरोप
इसी हफ्ते टिपरा मोथा के सुप्रीमो प्रद्योत देबबर्मा ने आरोप लगाया कि उनसे बीजेपी ने एक प्रस्ताव के साथ बीजेपी ने संपर्क किया था। उन्होंने कहा कि बीजेपी ने प्रस्ताव में कहा था कि TTAADC चुनावों से पहले पार्टी के साथ बिना शर्त गठबंधन के लिए सहमत हों और इसके बदले में शर्तिया तौर पर पैसे की फंडिंग और चुनावी जीत पाएं। देबबर्मा ने कहा कि बीजेपी के इस प्रस्ताव को साफ मना कर दिया क्योंकि बीजेपी ने प्रस्ताव में 'टिपरासा समझौते' का सम्मान करने का कोई वादा नहीं किया।

टूटने लगी टिपरा मोथा पार्टी
प्रद्योत देबबर्मा ने जैसे ही बीजेपी के साथ गठबंधन को तोड़ने की बात कही, वैसे ही त्रिपुरा में एक बड़ी घटना घटी। टिपरा मोथा के दो सीनियर नेता सौदागर कलाई और अनंत देबबर्मा अपने समर्थकों के साथ में बीजेपी में शामिल हो गए। अनंत देबबर्मा TTAADC के एग्जीक्यूटिव सदस्य (राज्य कैबिनेट मंत्री के बराबर) हैं। टिपरा मोथा के कार्यकर्ता भी उनके साथ बीजेपी में चले गए। यह कदम देबबर्मा के लिए किसी झटके से कम नहीं है।
हालांकि, इसके बाद प्रद्योत ने कहा है कि पार्टी छोड़ने वालों से उन्हें कोई नाराजगी नहीं है। उन्होंने कहा, 'लोगों को पैसे और पोस्ट से नहीं खरीदा जा सकता'। यह साफ तौर पर बीजेपी की लालच देने की स्ट्रैटेजी की ओर इशारा था। टिपरा मोथा के वरिष्ठ विधायक रंजीत देबबर्मा ने चिंता जताते हुए आरोप लगाया कि पार्टी के मंत्री अनिमेष देबबर्मा चुपचाप बीजेपी के लिए काम कर रहे थे। अनिमेष देबबर्मा और विधायक चित्ता रंजन देबबर्मा दोनों को धलाई और खोवाई जिले में बीजेपी की रैली में देखा गया था।
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इस विवाद पर बीजेपी ने क्या कहा?
त्रिपुरा बीजेपी ने प्रद्योत देबबर्मा के आरोपों को राजनैतिक ड्रामा बताकर खारिज कर दिया है। टिपरा मोथा के विधायकों और नेताओं के बीजेपी में शामिल होने के सवाल पर बीजेपी ने कहा, 'राज्य के अलग-अलग हिस्सों में अच्छी सामाजिक और राजनैतिक मौजूदगी रखने वाले बहुत से लोग हमारे टच में हैं। उन्हें पार्टी में कब शामिल किया जाएगा, इसका फैसला संगठन तय करेगा।'

बीजेपी ने प्रद्योत देबबर्मा के आरोपों पर सवाल उठाते हुए कहा कि यह कहना कि गैर-आदिवासी आदिवासियों पर ज़ुल्म कर रहे हैं, एक सोची-समझी चाल है। न तो आदिवासी और न ही गैर-आदिवासी इसको नहीं मानते हैं। हालांकि, इस बीच प्रद्योत ने कहा है कि उनका झगड़ा त्रिपुरा राज्य की बीजेपी लीडरशिप से है, केंद्रीय बीजेपी हाईकमान से नहीं। टिपरा मोथा का यह बयान रणनीतिक सोच का हिस्सा है ताकि भविष्य में बीजेपी से तालमेल की गुंजाइश बनी रहे।
अगर, TTAADC चुनावों बीजेपी की जीत होती है तो आदिवासी इलाकों में राष्ट्रीय राजनीति की एंट्री हो सकती है, जिससे जिससे जातीयता पर आधारित क्षेत्रीय पार्टियों के लिए जगह कम हो जाएगी। साथ ही टिपरा मोथा राज्य में कमजोर होगी।
TTAADC क्या है?
TTAADC कोई आम स्थानीय निकाय नहीं है। साल 1982 से संविधान के छठी अनुसूची के तहत इसे बनाया गया था। यह स्वायत्त बॉडी है, जो त्रिपुरा के लगभग 70 प्रतिशत भौगोलिक क्षेत्र पर राज करती है। त्रिपुरा विधानसभा की 60 में से 20 सीटें आदिवासी समुदायों के लिए रिजर्व हैं। इन 20 सीटों को काउंसिल को कंट्रोल करती है। जो पार्टी TTAADC का चुनाव जीतती है, उसका विधानसभा चुनावों के गणित पर काफी असर होता है। काउंसिल में कुल 28 सीटें हैं। इसमें से टिपरा मोथा के पास 18 सीटें हैं। खास बात यह है कि 2021 में टिपरा मोथा पहली बार चुनाव लड़कर काउंसिल की सत्ता पर काबिज हुई थी।
काउंसिल में पैसे का खेल
त्रिपुरा की आबादी में आदिवासी 30 प्रतिशत हैं। उनकी लंबे समय से शिकायतें हैं। शिकायतों में सीमित वित्तीय स्वायत्तता, ADC की सीमाओं के अंदर जमीन के मालिकाना हक का न होना, स्वास्थ्य और पीने के पानी की कम सुविधा और राजनतिक संस्थाओं में कम प्रतिनिधित्व का कम होना है। त्रिपुरा में 2026-27 के बजट में ट्राइबल सब प्लान के लिए 7,542 करोड़ दिए गए। यह राज्य के कुल खर्च का 39.39 प्रतिशत है। मगर, TTAADC का इसमें हिस्सा मात्र 914.82 करोड़ रहा। क्षेत्रिय पार्टियों ने हमेशा से काउंसिल में फंड की कमी का आरोप लगाया है। इसके बदले में राज्य सरकारें काउंसिल के अंदर ही प्रशासनिक नाकामियों को गिनाती हैं।
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बता दें कि 2024 में टिपरा मोथा के बीजेपी के नेतृत्व वाले गठबंधन में शामिल होने से पहले साइन किए गए टिपरासा समझौते का मकसद केंद्र सरकार, त्रिपुरा राज्य सरकार और पार्टी के बीच एक तीन-तरफा समझौते के जरिए इन झगड़ों को सुलझाना था। इसे लागू नहीं किया गया है।
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