BJP को बाहरी दिखाने वाले नैरेटिव में सफल क्यों हो जाती है TMC? समझिए बारीकियां
पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस हर बार, भारतीय जनता पार्टी को बाहरी पार्टी दिखाने में सफल हो जाती है। TMC का कहना है कि बीजेपी, बंगाल की संस्कृति नहीं समझती है।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी। Photo Credit: X/TMC
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, भारतीय जनता पार्टी को बाहरी पार्टी बताती हैं। उनके नेता मुखर होकर कहते हैं कि बीजेपी की राजनीति गुजरात और यूपी और हिंदी भाषी राज्यों की संस्कृति थोपने की है। तृणमूल कांग्रेस, बीजेपी को पश्चिम बंगाल की संस्कृति के लिए खतरा मानती है। टीएमसी का कहना है कि बांग्ला संस्कृति, संगीत, कला, त्योहारों और प्रतीक पुरुषों को बीजेपी समझ ही नहीं पाई है।
बंगाल, सांस्कृति नवजागरण की जमीन रही है। ममता बनर्जी और उनकी पार्टी के नेता, सार्वजनिक मचों के कहते हैं कि जिस प्रांत में टैगोर और नजरुल का साहित्य हो, संगीत हो, कला हो, दुर्गा पूजा जैसे विविधतापूर्ण त्योहार हों, मजबूत संस्कृति हो, वहां बीजेपी कभी नहीं आ सकती है। ऐसा क्यों है, क्यों एक बार फिर बाहरी बनाम बंगाली का मुद्दा छाया है, हो क्या रहा है, इन सवालों के जवाब तलाशते हैं-
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क्यों बीजेपी पर बाहरी होने के आरोप लगते हैं?
19 फरवरी को रामकृष्ण परमहंस की जयंती थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें श्रद्धांजलि दी। नाम के आगे 'स्वामी' लगा दिया। यह बात TMC को नागवार गुजरी। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, पीएम मोदी पर भड़क गईं। उन्होंने कहा कि पीएम मोदी में 'सांस्कृतिक संवेदनहीनता' है। ममता बनर्जी का कहना है कि बंगाल की परंपरा में रामकृष्ण परमहंस को हमेशा 'ठाकुर' कहकर संबोधित किया जाता है, जबकि 'स्वामी' शब्द उनके संन्यासी शिष्यों के लिए इस्तेमाल किया जाता है। ममता बनर्जी ने विस्तार से समझाते हुए कहा कि रामकृष्ण मिशन की पवित्र त्रयी में ठाकुर, मां और स्वामीजी शामिल हैं। ठाकुर, रामकृष्ण परमहंस हैं, मां सारदा देवी हैं, स्वामीजी विवेकानंद के लिए इस्तेमाल होता है।
उपसर्गों के बहाने बाहरी बताती है TMC
ममता बनर्जी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सलाह दी है कि वे बंगाल के महान मनीषियों के लिए अपनी मर्जी से नए उपसर्ग न जोड़ें। उपसर्ग, उन शब्दों को कहते हैं, जो किसी शब्द में जुड़कर उनका विशेषता बताते है या अर्थ बदल देते हैं। अंग्रेजी में इसे प्रीफिक्स कहते हैं। तृणमूल कांग्रेस, इन दिनों पीएम मोदी की सांस्कृतिक गलतियां याद दिला रही है। पीएम मोदी ने, बजट सत्र पर अपने संबोधन के दौरान राज्य सभा में बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय को 'बंकिम दा' कह दिया था। टीएमसी ने इसे, बंकिम चंद्र का अपमान बताया था।
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क्या PM मोदी गलत उपसर्गों का इस्तेमाल करते हैं?
बीजेपी, इसे गलती नहीं मानती है। बीजेपी प्रवक्ता का कहना है कि पूरे भारत में महान संतों के लिए स्वामी शब्द का इस्तेमाल होता है। यह पंरपरा रही है। यह, समर्पण की भावना वाला शब्द है। ममता बनर्जी, गैर जरूरी मुद्दे को तूल दे रहे हैं। 'स्वामी' का अर्थ आध्यात्मिक गुरु के संदर्भ में होता है। अलग बात है कि बंगाल में 'ठाकुर' कहना ज्यादा प्रचलित है। 'स्वामी' शब्द का प्रयोग करना भाषाई तौर पर अपराध नहीं है। ममता बनर्जी, स्थानीय स्तर पर अपनी रणनीति में सफल भी नजर आ रही हैं, जबकि बीजेपी, सफाई देते-देते उलझ रही है।
क्यों बाहरी बनाम घरेलू की लड़ाई में फंस जाती है बीजेपी?
अंजन दत्ता, सुप्रीम कोर्ट में अधिवक्ता हैं, बीजेपी की तरफ झुकाव रखते हैं। बंगाल की कई सांस्कृति समितियों का हिस्सा हैं और इतिहास के विद्यार्थी भी रहे हैं। जब यही सवाल उनसे किया गया तो उन्होंने कहा, बाहरी बनाम बंगाली अस्मिता की लड़ाई में बीजेपी कमजोर इसलिए है, क्योंकि ममता बनर्जी, दशकों पहले, 'मां, माटी और मानुष' की नैरेटिव में कीर्तिमान स्थापित कर चुकी हैं। जैसे अब, हिंदुत्ववादी किसी पार्टी का उदय हो लेकिन वह बीजेपी के ग्राफ को नहीं छू पाएगी, वैसा ही पश्चिम बंगाल में इन दिनों टीएमसी के लिए माहौल बना है। ममता बनर्जी को लोग दीदी मान रहे हैं और अभिषेक बनर्जी को उनका उत्तराधिकारी।
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नैरेटिव की जंग, क्यों जीतती है टीएमसी, इसकी कुछ वजहें हैं, जिनसे बीजेपी जीत नहीं पा रही है-
बंगाली अस्मिता की जंग में कैसे पिछड़ती है बीजेपी?
: ममता बनर्जी, सिंगूर और नंदीग्राम आंदोलन के बाद खुद को बंगाली संस्कृति, भाषा और परंपराओं के एकमात्र संरक्षक के तौर पर पेश किया था। उनका यह नजरिया, जनता के मन में गहरे तक बैठ गया है। ममता बनर्जी अक्सर 'मां, माटी, मानुष' के नारे के साथ खुद को 'बंगाल की बेटी' बताती हैं। बीजेपी यहां चूक जाती है। बीजेपी के प्रमुख बड़े और केंद्रीय स्तर के नेता, पश्चिम बंगाल से नहीं हैं। जब प्रधानमंत्री मोदी, अमित शाह या सीएम योगी दिल्ली से आकर रैलियां करते हैं तो TMC इसे दिल्ली का बंगाल पर हमला बता देती है, अपने क्षेत्रीय गौरव के लिए संकट बता देती है।
सांस्कृतिक अनभिज्ञता के क्यों आरोप लगते हैं?
राजनीति में शब्द पकड़े जाते हैं। टीएमसी, बीजेपी पर यही आरोप लगाती है। सुवेंदु अधिकारी या सौमिक भट्टाचार्य का कद, अभी ममता बनर्जी के स्तर का हुआ नहीं है कि ये प्रांत में चुनौती दें। वहीं, रामकृष्ण परमहंस को 'स्वामी' कहना या बंकिम चंद्र को 'बंकिम दा' कहना, बीजेपी के नेताओं से अनजाने में हुई सांस्कृतिक गलतियां, TMC के लिए हथियार बनती हैं।
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एक हादसा, जिसे नहीं भूल पाए बंगाली
अंजन दत्ता बताते हैं कि साल 2019 में लोकसभा चुनावों के दौरान, ईश्वर चंद विद्यासागर की एक प्रतिमा, टूट गई थी। टीएमसी ने आरोप लगाया था कि अमित शाह की रैली के दौरान, इसे जानबूझकर बीजेपी ने हिंसा फैलने के मकसद से तोड़ा था। टीएमसी ने इसे बंगाली संस्कृति पर हमला बता दिया था। टीएमसी का कहना है कि बीजेपी बंगाल की जड़ों और भावनाओं को नहीं समझती।
जीवनशैली का अंतर, जिसे लेकर उठते हैं सवाल
बंगाल की संस्कृति का एक अहम हिस्सा, मछली और मांस है। लोग मांसाहार से परहेज नहीं करते हैं। परम धार्मिक होने के बाद भी ऐसा उल्लेख मिलता है कि रामकृष्ण परमहंस और विवेकानंद भी मांसाहार करते थे। बीजेपी के कई नेता, मांसाहार के खिलाफ बयान देते हैं। जिन राज्यों में बीजेपी की सरकार है, वहां मंदिरों के आसपास वाले इलाके में मांसाहार बैन कर दिया जाता है। TMC इस अंतर का भी चुनावी इस्तेमाल कर ले जाती है। टीएमसी का कहना है कि बीजेपी बंगाल के उदारवादी और बहुरंगी खान-पान वाले समाज में फिट नहीं बैठती।
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एक मसला, केंद्रीय नेतृत्व का भी है
बीजेपी के पास बंगाल में ममता बनर्जी के कद का कोई एक बड़ा चेहरा नहीं है। यह चुनाव अक्सर ममता बनाम मोदी बन जाता है। TMC यह नैरेटिव सेट करने में सफल रहती है कि चुनाव के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दिल्ली चले जाएंगे, स्थानीय नेताओं के हवाले बीजेपी का शासन होगा लेकिन उनमें ममता बनर्जी की तरह लंबा प्रशासनिक अनुभव नहीं होगा। वह बीजेपी और बीजेपी नेतृत्व को बाहरी दिखाने में चुनाव-दर-चुनाव सफल हो रही हैं। साल 2014 से अब तक, बीजेपी बड़ी सफलता से दूर है।
इतिहास में कहां चूकता है उत्तर भारत?
बंगाल का इतिहास 'पुनर्जागरण' का इतिहास रहा है। सांस्कृतिक पुनर्जागरण का यह राज्य केंद्र रहा है। राजा राममोहन राय, विवेकानंद, बंकिम चंद्र चटर्जी और रबींद्रनाथ टैगोर जैसे विचारकों ने आधुनिक भारत की नींव रखी। सुभाष चंद्र बोस जैसे अमर क्रांतिकारी हुए। बंगाल के नेतृत्व को अपने प्रतीकों पर गर्व है, जिसे भुनाने में टीएमसी कामयाब हो जाती है। तृणमूल कांग्रेस यह प्रचार करती है कि बीजेपी की विचारधारा है, बीजेपी के नेता, बंगाल के प्रगतिशील इतिहास को बदलना चाहती है।
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