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BJP और TMC की सियासी लड़ाई, 'टैगोर vs बंकिम चंद्र' कैसे हुई?

राष्ट्रगान रवींद्रनाथ टैगोर ने लिखा है, वहीं राष्ट्रगीत बंकिम चंद्र ने लिखा है। दोनों अविभाजित बंगाल से थे। वंदे मारतम को आम जनता तक पहुंचाने का श्रेय, टैगोर को जाता है।

Ravindra Nath Tagore

रविंद्र नाथ टैगोर और बंकिम चंद्र चट्टोपध्याय। AI इमेज। Photo Credit: Sora

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पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस बनाम भारतीय जनता पार्टी की सियासी लड़ाई, अब बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय बनाम रबींद्र नाथ टौगोर हो गया है। ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली टीएमसी का कहना कहना है कि बीजेपी, वंदे मातरम के सभी श्लोकों को गाकर, रवींद्रनाथ टौगोर का अपमान कर रही है। टीएमसी ने यह दावा इसलिए किया है, क्योंकि केंद्र सरकार ने वंदे मातरम से जुड़ा एक आदेश जारी किया है।

केंद्र सरकार के नए निर्देशों के मुताबिक, अब जब सरकारी कार्यक्रमों में जब 'वंदे मातरम' और 'जन गण मन' दोनों गाए या बजाए जाएंगे तो पहले वंदे मातरम के सभी छह छंद गाए जाएंगे। जन गण मन से पहले आएगा और सबको खड़े होकर सम्मान देना होगा। यह आदेश 6 फरवरी 2026 को जारी हुआ है। वंदे मातरम के पूरे छह छंदों को गाने में करीब 3 मिनट 10 सेकंड का वक्त लगेगा। इसे वंदे मातरम का आधिकारिक संस्करण केंद्र सरकार ने बताया है। 

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क्यों अब तक नहीं गाए जा रहे थे 6 छंद?

वंदे मातरम के कुछ छंदों में हिंदू देवी-देवताओं का जिक्र है। भारत धर्म निरपेक्ष राष्ट्र है। किसी भी धर्म की प्रार्थना, कैसे देश का राष्ट्रगान हो सकता है, यही तर्क देकर, कई नेताओं ने वंदे मातरम के संक्षिप्त खंड को राष्ट्रगान मानने की वकालत की थी। 'वंदे मातरम' के 150 साल पूरे होने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद में नेहरू पर आरोप लगाया था कि उन्होंने मुहम्मद अली जिन्ना की मांगों के आगे झुककर 'वंदे मातरम्' को छोटा किया था। साल 1950 में संविधान सभा ने केवल पहले दो छंदों को अपनाया था। साल 1937 में कांग्रेस की बैठक में रवींद्रनाथ टैगोर की सलाह पर इसे अपनाया गया था। वह उदारवादी विचारधारा के थे और धर्मनिरपेक्षता और वसुधैव कुटुंबकम की पुरजोर वकालत करते थे।

 

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BJP vs TMC क्यों हुई है यह लड़ाई?

अप्रैल-मई 2026 में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। भारतीय जनता पार्टी की केंद्र में सरकार है। बीजेपी, पश्चिम बंगाल में 2021 के विधानसभा चुनावों से बढ़त बनाकर, सत्ता में आना चाह रही है। बंगाल के लोग, बंकिम चंद्र और रवींद्रनाथ टैगोर दोनों को अपना प्रतीक पुरुष मानते रहे हैं। दिलचस्प यह है कि बंकिम चंद्र, जहां हिंदुत्व के पक्षधर थे, वहीं रवींद्रनाथ उदारवादी विचारधारा के थे।

तृणमूल कांग्रेस का आरोप है बीजेपी, विचारधारा पर हमला कर रही है। टीएमसी का कहना है कि राष्ट्र गीत के सभी छंदों को स्वीकारना, रवींद्रनाथ टैगोर के सर्वधर्म समभाव की भावना के खिलाफ है। उन्होंने केवल गीत के संक्षिप्त संस्करण को अपनाया था। TMC इसे बंगाल की समावेशी परंपरा के खिलाफ बता रही है। टैगोर, पश्चिम बंगाल के सबसे बड़े सांस्कृतिक प्रतीकों में से एक माने जाते हैं। 

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BJP क्या कह रही है?

बीजेपी ने सवाल किया है कि दुर्गा पूजा और पंडाल के लिए दुनियाभर में मशहूर पश्चिम बंगाल में टीएमसी को पश्चिम बंगाल की 'आराध्य देवी' पर एतराज क्या है। टीएमसी की स्तुति करने वाले छंदों से परेशानी क्या है। दोनों दल सांस्कृतिक प्रतीकों को अपने पक्ष में करने की कोशिश कर रहे हैं। अब बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय और रवींद्रनाथ टैगोर में वैचारिक विरोध दिखाने की कोशिश की जा रही है। 

सुकांत मजूमदार:-
ब्रात्य बसु ने जो कहा वह पूरी तरह से मूर्खतापूर्ण है। रवींद्रनाथ बंगाली साहित्य में इतने बड़े व्यक्तित्व हैं कि उन्हें छोटा नहीं दिखाया जा सकता। बंकिम की महिमा करके रवींद्रनाथ को छोटा दिखाने की यह धारणा बेबुनियाद है।

CMP नेता सुजन चक्रवर्ती ने कहा, 'यह सब राजनीतिक वजहों से हो रहा है। अमित शाह को लगता है कि वे रवींद्रनाथ और नेताजी से बेहतर समझते हैं। लोग इसे मंजूर नहीं करेंगे। हम कैसे सोच सकते हैं कि बीजेपी रवींद्रनाथ या बंकिम का सम्मान करेगी, जब उन्होंने नेताजी सुभाष चंद्र डॉक का नाम स्यामा प्रसाद मुखर्जी के नाम पर बदल दिया? वे महान व्यक्तियों को भी राजनीति के लिए बांटते हैं।

 

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समिक भट्टाचार्य, अध्यक्ष, पश्चिम बंगाल बीजेपी:-
काजी नजरुल इस्लाम, सैयद मुस्तफा सिराज या सैयद मुजतबा अली से कोई आपत्ति नहीं थी, आपत्ति मुहम्मद अली जिन्ना से आई थी और कांग्रेस को झुकना पड़ा। तृणमूल चाहती है कि बंगाल के मुसलमान अफजल गुरु की विचारधारा अपनाएं, नजरुल इस्लाम या सैयद मुस्तफा सिराज की नहीं।

 

ब्रात्य बसु, शिक्षा मंत्री, पश्चिम बंगाल:-
TMC इस मुद्दे पर बहुत साफ थे। चट्टोपाध्याय का वंदे मातरम बंगाल में पूजनीय है। लेकिन केंद्र ने वंदे मातरम सर्कुलर जारी करके टैगोर को नीचा दिखाने की कोशिश की। यह एक ऐतिहासिक सच्चाई है कि RSS और ऐसी दक्षिणपंथी ताकतें टैगोर को पसंद नहीं करतीं। अपनी रचनाओं और गीतों के जरिए, टैगोर ने हमेशा एकता की बात की, न कि बांटने की, जिसे वे बढ़ावा देते हैं।


पश्चिम बंगाल की वित्त मंत्री चंद्रिमा भट्टाचार्य ने कहा, 'बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय के लिए उनका प्यार, तभी झलक गया, जब उन्होंने उन्हें बंकिम दा कहा। शायद वे इसे डैमेज कंट्रोल के तौर पर देख रहे हैं।'

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क्यों हो रहा है ऐसा?

वंदे मातरम के 6 छंदों के कुछ हिस्से में 'दुर्गा देवी' का जिक्र है। टीएमसी, इसे सेक्युलर भावना के खिलाफ मानती है। मुस्लिम समुदाय का एक बड़ा तबका, वंदे मातरम का मुखर हो कर विरोध करता है। साल 2011 में हुई जनगणना के आंकड़े बताते हैं कि पश्चिम बंगाल में मुस्लिम आबादी 27 फीसदी से ज्यादा है। टीएमसी, अल्पसंख्यक राजनीति करती है।  टीएमसी, बीजेपी पर लगातार पश्चिम बंगाल की संस्कृति का अपमान करने का आरोप लगा रही है। टीएमसी बीजेपी को बाहरी पार्टी बताती रही है, जिन्हें बंगाली संस्कृति की कद्र नहीं है। विपक्ष का एक धड़ा मानता है कि बंकिम चंद्र के बहाने बीजेपी, हिंदू वोटरों को एकजुट करने के लिए यह कवायद कर रही है। बीजेपी नेता, ममता बनर्जी की एंटी हिंदू छवि बना रहे हैं।

क्या बंकिम चंद्र के विरोधी थे टैगोर?

अनिमेष मुखर्जी, लेखक, ठाकुरबाड़ी:-
टैगोर से पहले वंदे मातरम को लयबद्ध तरीके से गाया नहीं गया था। आज भी 99 फीसदी तक, उसी लय में धुन गुनगुनाई जाती है। 2 छंद ही क्यों गाए जाते हैं, इसकी भी एक कहानी है। देश बंगाल में सांप्रदायिक तनाव देख चुका था। अंग्रेज, भारतीयों को बांटने के पक्षधर थे ही। गीत में कुछ हिस्सा केवल बंगाल केंद्रित था, कुछ हिस्सा धार्मिक था। यही वजह है कि टैगोर ने नेहरू को 2 छंदों तक अपनाने की सलाह दी थी। टैगोर, बंकिम चंद्र के बाद के कवि हैं। वह खुद कह चुके हैं कि बतौर लेखक, जितनी प्रसिद्धि बंकिम चंद्र चटर्जी को मिली है, उसका कुछ हिस्सा भी हमको मिल जाए तो बड़ी बात हो जाए।'


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