कर्नाटक में कुर्सी के लिए 'कलह', फिर भी कांग्रेस का पंजाब जैसा हाल क्यों नहीं?
डीके शिवकुमार और सिद्धारमैया कर्नाटक कांग्रेस की दो धुरी हैं। दोनों बाहर एकजुट नजर आते हैं और अंदर एक-दूसरे को अपना प्रतिद्वंद्वी समझते हैं। यह कलह, कांग्रेस का नुकसान नहीं कर पाती है।

कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार। Photo Credit: PTI
13 मई 2023। कर्नाटक में हुए विधानसभा चुनावों के नतीजे आ गए थे। कांग्रेस के लिए यह बड़ी कामयाबी थी। दक्षिण में भारतीय जनता पार्टी (BJP) के इकलौते दुर्ग को कांग्रेस ने ध्वस्त कर दिया था। कर्नाटक की सत्ता से बासवराव बोम्मई की विदाई हुई थी और एक बार फिर कांग्रेस सरकार बनाने जा रही थी। कर्नाटक चुनाव जीतने से ज्यादा बड़ी चुनौती, कांग्रेस में मुख्यमंत्री चुनने की थी।
राज्य में कांग्रेस की जीत के 2 चेहरे थे। एक सिद्धारमैया, दूसरे डीके शिवकुमार। सिद्धारमैया, राज्य की बागडोर पहले भी संभाल चुके थे। उनके नाम कई उपलब्धियां जुड़ चुकी थीं लेकिन डीके शिवकुमार वह कड़ी थे, जिनकी कांग्रेस को अक्सर जरूरत पड़ती थी। जब-जब कांग्रेस शासित राज्यों में 'ऑपरेशन कमल' शुरू होता, डीके शिवकुमार 'संकटमोचक' की तरह अपने विधायकों को बचाने उतरते।
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कांग्रेस की असमंजस और सिद्धारमैया का दांव
जब राज्य में मुख्यमंत्री पद के दो दावेदार हों, दोनों योग्य हों तो किसी भी पार्टी के लिए चेहरा चुनने में मुश्किल होती है। कांग्रेस का आलाकमान यह तय नहीं कर पा रहा था कि मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार होंगे या सिद्धारमैया। वजह यह थी कि राज्य में सिद्धारमैया की पकड़, ज्यादा मजबूत थी, वह कुरुबा गौड़ा समुदाय से आते हैं, जिसकी आबादी करीब 9 फीसदी है। वह लोकप्रिय चेहरे हैं।
डीके शिवकुमार तब भले ही राज्य में सिद्धारमैया जैसा जन समर्थन न हासिल कर सके हों लेकिन संगठन के चहेते नेता रहे हैं। डीके शिवकुमार की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत उनका 'संकटमोचक' होना था। उनका उनके संगठनात्मक कौशल के कायल, विपक्षी हैं।
कांग्रोस को उन्होंने कई मोर्चे पर कांग्रेस की मदद की थी। वह कर्नाटक के बेहद प्रभावशाली वोक्कालिगा समुदाय से आते हैं। राज्य की 10 से 12 फीसदी आबादी इसी समुदाय की है। कांग्रेस इसी असमंजस में थी कि किसे चुने। दोनों मुख्यमंत्री पद के दावेदार थे, दोनों में से किसी एक को चुनना था।
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सिद्धारमैया कैसे बाजी मार ले गए?
सिद्धारमैया पार्टी के चर्चित चेहरे थे, जनता में लोकप्रियता थी, राजनीतिक अनुभव ज्यादा था। डीके शिवकुमार संगठन के चहेते थे। सिद्धारमैया के पास पहले से ही एक सफल मुख्यमंत्री के कार्यकाल का अनुभव रहा है। साल 2013 से 2018 तक, वह मुख्यमंत्री रहे। उनका ट्रैक रिकॉर्ड बेहतर रहा। उन्हें 'अहिंदा' का समर्थन था, जिसके नाते उनकी स्वीकार्यता और बढ़ी।
पार्टी नेतृत्व ने यह तय किया कि डीके शिवकुमार को कर्नाटक कांग्रेस अध्यक्ष के पद पर बने रहने देते हैं। राज्य में संगठन स्तर पर वह डीके सिद्धारमैया के बॉस बने रहेंगे लेकिन शासन व्यवस्था में वह उनके डिप्टी रहेंगे। अगले ही साल 2024 में विधानसभा चुनाव होने वाले थे। अगर सिद्धारमैया नाराज होते तो उनका समर्थक एक बड़ा वर्ग कुरुबा गौड़ा समुदाय भी उखड़ता।
ज्यादातर विधायक भी सिद्धारमैया के साथ थे। कांग्रेस ने उनके नाम पर मुहर लगाना ठीक समझा। राहुल गांधी, डीके शिवकुमार और सिद्धारमैया की एक तस्वीर सामने आई। विधायक दल की बैठक के बाद हुई गुप्त बैठक में विधायकों ने सिद्धारमैया का साथ दिया। फैसला हो चुका था कि मुख्यमंत्री सिद्धारमैया बनेंगे, डिप्टी सीएम डीके शिवकुमार होंगे। खबरें यह भी चलीं कि ढाई-ढाई साल दोनों मुख्यमंत्री रहेंगे लेकिन सिद्धारमैया ने हर बार कहा कि 'कुर्सी' सिर्फ उनकी है।
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कब-कब उभरा तनाव?
कर्नाटक में 20 मई 2023 में कांग्रेस की सरकार बन गई। महत्वाकांक्षाएं थीं तो अनबन की बात भी स्वाभिवक थी। कांग्रेस के सूत्र बताते हैं कि झगड़े की वजह से 'ढाई-ढाई साल का पावर-शेयरिंग फॉर्मूला' है। 2023 के अंतिम दिनों से चली गुटबाजी 2024 और 2025 तक जारी रही। दोनों के समर्थक विधायक और मंत्री, मुख्यमंत्री पद को लेकर दावा ठोकते रहे।
दोनों नेताओं के बीच कई बार अंदरूनी कलह खुलकर सामने आई। 2024-25 में यह मुद्दा दबा रहा, लेकिन 2025 के मध्य तक पहुंचते-पहुंचते खुलकर खेमेबाजी होने लगी। नवंबर 2025 में तो ऐसा लगने लगा कि अब डीके शिवकुमार के समर्थक विधायक बगावत कर देंगे। वजह यह थी कि ढाई साल पूरे हो गए थे और तय फॉर्मूले के मुताबिक, अब सिद्धारमैया को डीके शिवकुमार के लिए कुर्सी छोड़नी थी।
डीके शिवकुमार समर्थकों ने 'वर्ड पावर इज वर्ल्ड पावर' जैसे नारे गढ़े। दिसंबर 2025 तक यह मामला हाई कमान तक पहुंच गया। राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे जी-जान से मतभेद सुलझाने उतरे। जुलाई में ही डीके शिवकुमार के समर्थन में कांग्रेस विधायक इकबाल हुसैन ने कांग्रेस महासचिव रणदीप सुरजेवाला से मांग की थी कि अब मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार बनें, 100 विधायकों का समर्थन उनके पास है। यह कवायद, कवायद ही रही।
मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने एक प्रेस रिपोर्टर से जुलाई 2025 में कहा, 'मैं ही रहूंगा मुख्यमंत्री। आपको संदेह क्यों है।'
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2 जुलाई 2025 को भी बाजी मुख्यमंत्री सिद्धारमैया मार ले गए। डीके शिवकुमार को कहना पड़ा-
'मेरे पास विकल्प क्या हैं? मुझे उनके साथ खड़ा होना होगा, समर्थन देना होगा। मुझे इस पर कोई आपत्ति नहीं है। पार्टी के हाई कमान जो तय करेंगे, जो फैसला करेंगे, उसे पूरा किया जाएगा।'
सिद्धारमैया इस्तीफा देंगे, ऐसी खबरों की सच्चाई क्या है?
26 मई 2026 को लगा कि कर्नाटक में सत्ता परिवर्तन होकर रहेगा। डीके शिवकुमार और सिद्धारमैया की अनबन बढ़ गईं। मीडिया में खबरें चलने लगीं कि कांग्रेस ने सिद्धारमैया को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने का प्रस्ताव दिया है। कांग्रेस हाईकमान ने कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया से कहा है कि वह CM पद छोड़कर दिल्ली आ जाएं। पार्टी उन्हें राज्यसभा भेजकर 2029 लोकसभा चुनाव से पहले राष्ट्रीय स्तर पर बड़ा OBC चेहरा बनाना चाहती है।
दिल्ली में मंगलवार को करीब 7 घंटे बैठक चली। राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे ने उन्हें समझाया कि उनकी छवि का अब पूरे देश में इस्तेमाल किया जाएगा। मीडिया के सूत्र कह रहे हैं कि सिद्धारमैया ने अभी कोई साफ जवाब नहीं दिया है और समय मांगा है। अगर वह मान गए तो डीके शिवकुमार के मुख्यमंत्री बनने की संभावना बढ़ जाएगी। पार्टी इसे सिद्धारमैया के लिए पदोन्नति बता रही है, न कि हटाया जाना लेकिन यह अटकलें हैं। इन सूत्रों पर खुद कांग्रेस ने पानी फेरा है। कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल ने कहा है कि राज्य में सत्ता परिवर्तन नहीं होने जा रहा है।
केसी वेणुगोपाल, महासचिव, कांग्रेस:-
आज हमने कर्नाटक की राज्यसभा सीटों और विधान परिषद सीटों के बारे में चर्चा की। कर्नाटक की राज्यसभा और विधान परिषद सीटों के उम्मीदवारों की घोषणा, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, राजस्थान और झारखंड जैसे अन्य राज्यों की सीटों के साथ ही की जाएगी। बस इतना ही। आज हमने यही फैसला किया है। आज इसके अलावा और किसी विषय पर चर्चा नहीं हुई। आप लोग जो भी अटकलें लगा रहे हैं, वे केवल अटकलें ही हैं। उनमें कोई सच्चाई नहीं है।
पंजाब और मध्य प्रदेश जैसा क्यों नहीं होता कर्नाटक का हाल?
कर्नाटक कांग्रेस में मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के बीच अनबन ठीक वैसे ही है, जैसे मध्य प्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया और कमलनाथ में थी, राजस्थान में अशोक गहलोत और सचिन पायलट में थी और पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह और नवजोत सिंह सिद्धू में थी। मध्य प्रदेश में तो चुनाव हारने के बाद भी बीजेपी ने सरकार बना ली।
मार्च 2020 को सिंधिया के समर्थन वाले 22 विधायकों ने एक साथ इस्तीफा दिया और बीजेपी में शामिल हो गए। राजस्थान में यह होते-होते बचा था, 2020 में सचिन पायलट के समर्थक विधायक मानेसर में डेरा डाल चुके थे। जैसे-तैसे डीके शिवकुमार के हस्तक्षेप के बाद सरकार बची।
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बहुमत में सिद्धारमैया से पिछड़ते हैं डीके शिवकुमार
कर्नाटक में अनबन के बावजूद सरकार के न गिरने का सबसे बड़ी वजह, दोनों नेताओं का एक-दूसरे पर अत्यधिक निर्भर होना और पार्टी के पास 135 सीटों का प्रचंड बहुमत होना है। सिद्धारमैया के पास जहां अल्पसंख्यक, पिछड़ा वर्ग और दलित का अहिंदा वोट बैंक है। सिद्धारमैया जनता के नेता कहे जाते हैं, डीके शिवकुमार संगठन के हैं।
कर्नाटक में 224 विधानसभा सीटें हैं। 135 सीटें कांग्रेस के पास हैं। बहुमत साबित करने के लिए 113 विधायकों का साथ चाहिए। 100 से ज्यादा समर्थक विधायक सिद्धारमैया गुट के हैं। डीके शिवकुमार यहीं कमजोर पड़ जाते हैं। ज्योतिरादित्य सिंधिया इसलिए कमलनाथ सरकार गिरा सके क्योंकि पार्टी ने जैसे-तैसे बहुमत हासिल किया था। 22 विधायक छिटके तो सरकार गिर गई। यहां कांग्रेस के पास प्रचंड बहुमत है।
2019 का सीख नहीं भूले हैं डीके शिवकुमार
कर्नाटक कांग्रेस ने साल 2019 में 'ऑपरेशन लोटस' की वजह से अपनी सरकार गंवाई थी। सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार दोनों सत्ता से बाहर चले गए तो बीजेपी फिर वापस आने की राह मुश्किल कर देगी। दोनों के पास अपनी सरकार गंवाने का पुराना अनुभव है। एचडी कुमारस्वामी की सरकार, ऐसे ही गिरी थी। कर्नाटक कांग्रेस अब ज्यादा सतर्क हो गई है। दोनों नेता नहीं चाहते कि उन्हें विपक्ष में बैठना पड़े।
मल्लिकार्जुन खड़गे फैक्टर भी मजबूत है
एक बात यह भी है कि कांग्रेस के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, खुद यहीं से आते हैं। राज्य पर उनकी पकड़,सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार दोनों से ज्यादा है। यहां डीके शिवकुमार की अनबन सिर्फ सिद्धारमैया से है, वह भी सार्वजनिक रूप से नहीं। पंजाब में हाल यह था कि कैप्टन अमरिंदर मुख्यमंत्री के तौर पर फैसले लेते, सिद्धू मीडिया में आकर उन्हें गलत ठहराते। वह खुलकर बगावत करते। उन्होंने न कैप्टन को बख्शा, न ही जब चरणजीत सिंह चन्नी सीएम बने तब उन्हें। डीके शिवकुमार, राजनीतिक गंभीरता से वाकिफ हैं और सधे कदमों से सत्ता के समझौते की बात करते हैं।
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