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सिसोदिया का भी पेशी से इनकार, राजघाट जाने की तैयारी, पुराने रंग में आ रही AAP?

लगातार झटके झेल रही आम आदमी पार्टी के मुखिया अब ऐसी रणनीति पर काम करते दिख रहे हैं जिसके तहत वह हर दिन खबरों में बने रहते हैं।

arvind kejriwal and manish sisodia

अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया, File Photo Credit: PTI

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दिल्ली में चुनाव हार चुकी आम आदमी पार्टी सत्ता से बाहर है लेकिन पिछले कई महीनों से लगातार चर्चा में बनी हुई है। फरवरी के आखिर में दिल्ली आबकारी नीति केस में अरविंद केजरीवाल समेत तमाम आरोपियों के बरी होने से लेकर राघव चड्ढा और अन्य सांसदों की बगावत तक, AAP लगभग हर दिन न्यूज में बनी हुई है। इसके सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पहलू हैं। अब आबकारी नीति में अरविंद केजरीवाल के बाद मनीष सिसोदिया ने भी जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की अदालत में पेश होने से इनकार कर दिया है। AAP इस मामले को लंबा खींचने के मूड में है और इसे 'सत्याग्रह' का नाम दे रही है। इसी क्रम में AAP के दोनों वरिष्ठ नेता राजघाट जाने वाले हैं। अब इसे AAP के पुराने अंदाज से जोड़कर भी देखा जा रहा है, जब अपने शुरुआती दिनों में यह पार्टी हर मुद्दे पर सड़क पर नजर आती थी।

 

दिल्ली की सत्ता गंवाने के बाद AAP पंजाब में अपनी सत्ता बचाने, गुजरात और गोवा में खुद को मजबूत करने और दिल्ली में वापसी के लिए दम झोंक रही है। इसी बीच उसके सात सांसदों की बगावत ने पार्टी का माहौल बिगाड़ दिया है। हालांकि, अरविंद केजरीवाल एक बार फिर से पार्टी के अभियानों को धार दे रहे हैं। पिछले दो महीने में AAP की गतिविधियां इशारा कर रही हैं कि उसके शीर्ष नेता हर हाल में अब 'विजिबल' रहना चाहते हैं। यह काम अरविंद केजरीवाल खुद भी बखूबी करते दिख रहे हैं।

हर काम में दिख रहा प्लान

दिल्ली आबकारी नीति केस में अरविंद केजरीवाल के साथ-साथ मनीष सिसोदिया और कई अन्य नेता भी आरोपी हैं। अरविंद केजरीवाल ने सोमवार को एक चिट्ठी और वीडियो जारी किया और बताया कि उन्हें स्वर्ण कांता शर्मा से न्याय मिलने की उम्मीद नहीं है इसलिए वह उनकी कोर्ट में पेश ही नहीं होंगे। यही एलान मनीष सिसोदिया भी तुरंत कर सकते थे लेकिन मनीष सिसोदिया ने एक दिन बाद किया और उसी दिन दोनों ने राजघाट जाने का एलान कर दिया। यह दिखाता है कि AAP इस मुद्दे को जीवंत रखना चाहती है और इसके जरिए राजनीतिक लाभ भी लेना चाहती है।

 

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मनीष सिसोदिया ने मंगलवार को सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में लिखा है, 'पूरे सम्मान और आदर के साथ, मैंने दिल्ली हाई कोर्ट की माननीय जस्टिस  स्वर्णकांता शर्मा जी को पत्र लिखकर निवेदन किया है कि वर्तमान परिस्थितियों में मेरी अंतरात्मा मुझे इस मामले की कार्यवाही में उनके समक्ष, आगे भाग लेने की अनुमति नहीं देती। मेरे लिए यह किसी व्यक्ति विशेष का प्रश्न नहीं है, बल्कि उस भरोसे का प्रश्न है जिस पर न्याय व्यवस्था खड़ी होती है कि हर नागरिक को न्याय न केवल निष्पक्ष हो, बल्कि निष्पक्ष दिखाई भी दे।'

उन्होंने आगे लिखा है, 'मैं यह भी स्पष्ट करना चाहता हूँ कि न्यायपालिका और संविधान पर मेरा विश्वास पूरी तरह अटूट है लेकिन जब मन में गंभीर संदेह रह जाए तो केवल औपचारिक भागीदारी मेरे लिए सही नहीं है। इसलिए मेरे पास सत्याग्रह के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा…'

 

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खबरों में बने रहने के फॉर्मूले पर चली AAP

26 फरवरी को आबकारी नीति केस में आरोप मुक्त होते ही अरविंद केजरीवाल अचानक से सक्रिय दिखने लगे। इससे पहले वह पंजाब और गुजरात के राजनीतिक या सरकारी कार्यक्रमों में दिख रहे थे, पार्टी के संगठन से जुड़े कामकाज देख रहे थे लेकिन अब वह देश की राजनीति में AAP की छवि को लेकर काफी सजग दिख रहे हैं। एक समय पर हर राज्य में चुनाव लड़ने वाली AAP ने केरल में अपने उम्मीदवार भी उतारे लेकिन पहले तमिलनाडु में एमके स्टालिन के लिए और फिर पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के लिए वोट मांगने खुद अरविंद केजरीवाल गए।

 

इससे पहले, जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा को अपने केस से हटाने की अपील लेकर अरविंद केजरीवाल खुद उनकी अदालत में पेश हुए, अपनी दलीलें रखीं और इसका वीडियो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुआ। इसके जरिए भी वह अपनी 'फाइटर' वाली इमेज चमकाने में कामयाब रहे और परसेप्शन की लड़ाई में खुद को मजबूत करने की भरपूर कोशिश की।

अब एक बार फिर से 'सत्याग्रह' के नाम पर अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया अपनी पार्टी को विजिबल बनाने में जुट गए हैं। इसका असर यह हो रहा है कि राघव चड्ढा और अन्य सांसदों की बगावत से ज्यादा अरविंद केजरीवाल, उनके केस और जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा से हो रही है। बीते कुछ सालों में अरविंद केजरीवाल के बारे में यह कहा जाता रहा है कि वह सड़क पर उतरने से बचने लगे थे और खुद को 'अराजक' नहीं दिखाना चाहते।

 

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आंदोलन मोड में जाएगी AAP?

दिल्ली की सत्ता से बाहर हो चुकी AAP का गढ़ देश की राजधानी ही रही है। अगले साल दिल्ली नगर निगम के चुनाव हैं और पंजाब में विधानसभा के चुनाव हैं। पंजाब में AAP सत्ता में है तो वहां की चुनौतियां अलग हैं। हालांकि, दिल्ली, गुजरात, गोवा, उत्तराखंड और हिमाचल में अपनी उम्मीद देख रही AAP को आंदोलन मूड सूट करता है। गुजरात में ऐसे ही आंदोलनों के जरिए उसने खुद को मजबूत किया है और 2022 के चुनाव नतीजों में भी यह दिखा था जब उसके वोट प्रतिशत में जबरदस्त इजाफा हुआ था।

 

दिल्ली में AAP के पास ऐसे कई मुद्दे हैं जिन्हें लेकर वह सड़क पर उतर सकती है। अरविंद केजरीवाल की सक्रियता यह दिखा संकेत दे रही है कि आम आदमी पार्टी संभवत: इसी तैयारी में है और पंजाब के साथ-साथ वह बाकी राज्यों में भी अपने अभियान को आंदोलन मोड में धार दे सकती है।

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