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अपना ही उसूल भूलीं मायावती? आकाश के बाद ईशान की एंट्री से परिवारवाद पर उठे सवाल

BSP चीफ मायावती हमेशा परिवारवाद को लेकर विपक्षी पार्टियों पर सवाल उठाती रही लेकिन अब भाई भतीजवाद को लेकर सियासी गलियारों में फंसती नजर आ रही हैं। आकाश आनंद के बाद ईशान के साथ पार्टी के अन्य दो नेताओं के बेटों लाचिंग पर सवाल खड़े हो रहे हैं।

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पूर्व सीएम मायावती, Photo Credit: PTI

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बहुजन समाज पार्टी (बसपा) सुप्रीमो मायावती ने 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले संगठन में नई पीढ़ी को आगे बढ़ाने की कवायद तेज कर दी है। इसी के साथ उनके पुराने परिवारवाद विरोधी रुख पर भी सवाल उठने लगे हैं। आकाश आनंद को पार्टी की जिम्मेदारियों से अलग किए जाने के बाद अब उनके छोटे भाई ईशान आनंद को बड़ी संगठनात्मक जिम्मेदारी दी गई है। ईशान को मुख्य सेक्टर प्रभारी बनाया गया है और उनके जिम्मे करीब 15 राज्यों के संगठनात्मक कामकाज की निगरानी है। 

मामला सिर्फ ईशान तक सीमित नहीं है। दिवंगत बसपा विधायक उमाशंकर सिंह के बेटे प्रिंस यूकेश सिंह को भी सियासत में आगे बढ़ाने के संकेत मिले हैं। वहीं बसपा के राष्ट्रीय महासचिव सतीश चंद्र मिश्रा के बेटे कपिल मिश्रा लंबे समय से पार्टी के कार्यक्रमों में सक्रिय हैं और उनकी भूमिका को भी आगे और मजबूत किए जाने की चर्चा है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जिस मायावती ने लंबे समय तक परिवारवाद को राजनीति की बड़ी बुराई बताया, क्या अब बसपा में परिवार से जुड़े चेहरों को आगे बढ़ाना उनकी नई रणनीति है?

 

मायावती लंबे समय से परिवारवाद को लेकर दूसरी पार्टियों पर हमला करती रही हैं। वर्ष 2018 में उन्होंने बसपा के संविधान में बदलाव करते हुए कहा था कि पार्टी अध्यक्ष के करीबी परिवार के सदस्यों को संगठन में महत्वपूर्ण पद नहीं दिया जाएगा और उन्हें चुनाव लड़ाने या राज्यसभा, विधान परिषद अथवा मंत्री जैसे पद देने से भी दूर रखा जाएगा।

किताब में भी परिवार से दूर रहने का संकल्प

मायावती के राजनीतिक जीवन का एक अहम पक्ष उनका अविवाहित रहकर पूरा जीवन आंदोलन और पार्टी को समर्पित करने का संकल्प भी रहा है। अपनी किताब और अपने राजनीतिक जीवन से जुड़े प्रसंगों में मायावती ने इस बात पर जोर दिया है कि उन्होंने व्यक्तिगत परिवार बसाने के बजाय अपना जीवन बहुजन आंदोलन को समर्पित करने का रास्ता चुना।उनका यह रुख भी परिवारवाद के खिलाफ उनकी राजनीति से जोड़कर देखा जाता रहा है। मायावती का संदेश रहा कि व्यक्तिगत पारिवारिक हितों के बजाय संगठन और बहुजन आंदोलन को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। यही वजह है कि अब बसपा में परिवार से जुड़े चेहरों को मिल रही अहमियत को लेकर राजनीतिक सवाल उठ रहे हैं।

 

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हाल के घटनाक्रम ने इस बहस को और तेज कर दिया है। मायावती ने अपने भतीजे आकाश आनंद को पार्टी की सभी जिम्मेदारियों से अलग कर दिया है। इसके बाद उनके छोटे भाई ईशान आनंद को संगठन में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मिली है। ईशान को मुख्य सेक्टर प्रभारी बनाया गया है और उनके पास उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड को छोड़कर दूसरे राज्यों के संगठनात्मक कामकाज की निगरानी की जिम्मेदारी है। एक तरफ आकाश को जिम्मेदारियों से अलग किया गया, तो दूसरी तरफ परिवार के ही दूसरे युवा चेहरे ईशान को संगठन में बड़ी भूमिका दी गई। इसी विरोधाभास ने परिवारवाद की बहस को जन्म दिया है।

उमाशंकर सिंह के बेटे यूकेश को भी सियासी लॉन्चिंग

बसपा के इकलौते विधायक रहे उमाशंकर सिंह के निधन के बाद उनके बेटे प्रिंस यूकेश सिंह को राजनीति में आगे बढ़ाने के संकेत मिले। मायावती ने उमाशंकर सिंह के परिवार से अपने पुराने संबंधों का जिक्र करते हुए यह भी कहा था कि यदि परिवार चाहे तो यूकेश को राजनीति में आगे बढ़ाने में मदद की जाएगी। इसके बाद लखनऊ में हुई बसपा की अहम बैठक में यूकेश प्रमुखता से नजर आए। अब चर्चा है कि यूकेश अपने पिता की राजनीतिक विरासत संभाल सकते हैं और उन्हें रसड़ा विधानसभा सीट से चुनाव मैदान में उतारा जा सकता है। हालांकि, टिकट को लेकर अंतिम आधिकारिक घोषणा अलग विषय है, लेकिन यूकेश की पार्टी की गतिविधियों में बढ़ती मौजूदगी ने संकेत जरूर दे दिए हैं।

 

दूसरा नाम बसपा के वरिष्ठ नेता सतीश चंद्र मिश्रा के बेटे कपिल मिश्रा का है। कपिल लंबे समय से बसपा के कार्यक्रमों में सक्रिय रहे हैं और पार्टी के ब्राह्मण सम्मेलनों में भी उनकी भूमिका रही है। ऐसे में 2027 के चुनाव से पहले कपिल मिश्रा की भूमिका को और मजबूत किए जाने की चर्चा भी राजनीतिक हलकों में है। इससे परिवारवाद को लेकर मायावती के पुराने रुख पर सवाल और गहरा हो रहा है।

उसूल बदला या रणनीति?

बसपा में सामने आ रहे इन घटनाक्रमों को केवल परिवारवाद कहकर खारिज करना भी आसान नहीं है। मायावती की रणनीति में युवा चेहरों को आगे लाने की कोशिश साफ दिखाई दे रही है। ईशान आनंद को जिम्मेदारी देना भी पार्टी में नई पीढ़ी को सक्रिय करने की कवायद के तौर पर देखा जा रहा है लेकिन राजनीतिक सवाल अपनी जगह कायम है। आकाश आनंद के बाद ईशान, उमाशंकर सिंह के बाद उनके बेटे यूकेश और सतीश मिश्रा के बाद कपिल मिश्रा क्या बसपा में अब राजनीतिक विरासत परिवार के रास्ते आगे बढ़ रही है?

 

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2027 से पहले मायावती के सामने बड़ा सवाल

2027 का विधानसभा चुनाव बसपा के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। पार्टी एक तरफ संगठन को दोबारा मजबूत करने और युवा वोटरों को जोड़ने की कोशिश कर रही है, तो दूसरी तरफ परिवार से जुड़े चेहरों को मिल रही जिम्मेदारियां विपक्ष को मायावती पर सवाल उठाने का मौका दे रही हैं।जिस परिवारवाद को मायावती कभी दूसरी पार्टियों की सबसे बड़ी कमजोरी बताती थीं, क्या अब वही सवाल बसपा के दरवाजे पर खड़ा है? ईशान आनंद की बढ़ती भूमिका, यूकेश सिंह की सियासी लॉन्चिंग और कपिल मिश्रा की सक्रियता के बीच 2027 से पहले यही सवाल बसपा की राजनीति के केंद्र में आता दिख रहा है।

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