'साइकिल नहीं चली तो सत्ता नहीं...', अखिलेश, 'दुश्मनों' की नसीहत भूल क्यों गए?
अखिलेश यादव के धुर विरोधी भी उन्हें राजनीतिक सक्रियता बढ़ाने की सलाह दे रहे हैं। ऐसा क्यों, आइए समझते हैं।

योगी आदित्यनाथ, मायावती और अखिलेश यादव। AI इमेज। Photo Credit: ChatGPT
'साइकिल यात्रा' के सहारे सड़क से साल 2012 में सत्ता तक आए अखिलेश यादव, इन दिनों सोशल मीडिया पर खासे सक्रिय हैं। कभी वह हरदोई पहुंच रहे हैं, कभी पश्चिम बंगाल। शादी और रिसेप्शन के कार्यक्रमों में जगह-जगह शामिल हो रहे हैं लेकिन वहां नहीं जा रहे हैं, जहां जनता, सरकार के खिलाफ है, विरोध प्रदर्शन करती है। आम जनता की बातें, वह सोशल मीडिया पर खूब करते हैं लेकिन आम जनता से जाकर मिलते नहीं हैं।
अखिलेश यादव के धुर राजनीतिक विरोधी भी उन्हें सलाह दे रहे हैं कि अखिलेश यादव जमीनी आंदोलनों में निष्क्रिय हैं, जबकि वह सोशल मीडिया पर खासे सक्रिय रहते हैं। प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हैं लेकिन जनता से कटे-कटे रहते हैं। भारतीय जनता पार्टी के नेता ब्रजेश पाठक और केशव प्रसाद मौर्य हों या सुहलदेव भारतीय समाज पार्टी (SBSP) के राष्ट्रीय अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर, हर किसी की सलाह होती है कि अखिलेश यादव, जमीन पर उतरें, अखिलेश उतरते नहीं हैं।
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ओम प्रकाश राजभर, अध्यक्ष, SBSP:-
ममता बनर्जी हफ्तों इंतजार करती रहीं कि अखिलेश यादव अब आएंगे तब आएंगे। अखिलेश यादव नहीं गए। भयानक गर्मी में अखिलेश निकलते कहां हैं। कैसे रैलियां और रोड शो करेंगे? पसीना निकलेगा, गर्मी लगेगी। सुबह उठना भी पड़ेगा। सबसे अच्छा काम यह है कि दोपहर में उठने के बाद एक ट्वीट कर देना। यह काम अखिलेश यादव ने बिना नागा किया है।
अखिलेश की साइकिल से हुआ क्या था?
अखिलेश यादव बंगाल गए थे लेकिन बंगाल चुनावों के नतीजे आने के बाद, जब ममता बनर्जी, सत्ता से बाहर हो गईं थीं। यह बातें, उन अखिलेश यादव के लिए कही जा रही हैं, जिनकी साइकिल यात्रा ने मायावती को ही यूपी की सियासत में हाशिए पर पहुंचा दिया है। साल 2012, 2017 और 2022 के विधानसभा चुनावों में मायावती, समाजवादी पार्टी के जाल में ऐसे उलझीं कि उनका वोट बैंक खिसक कर समाजवादी पार्टी के साथ जा मिला, मायावती अब तक नहीं संभाल पाईं।
कैसे अखिलेश की साइकिल यात्रा ने उन्हें सत्ता तक पहुंचाया?
साल 2012 का विधानसभा चुनाव। मुलायम सिंह यादव, अपनी राजनीतिक विरासत, अखिलेश यादव को सौंप रहे थे। इसकी तैयारी कई साल पहले से शुरू हो गई थी। संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (UPA) की देश में सरकार थी, समाजवादी पार्टी की नजर, यूपी के सिंहासन पर बैठने की थी। मायावती ऐसी ताकत बनी थीं, जो बार-बार चुनाव-दर-चुनाव अखिलेश यादव की यह राह मुश्किल कर रही थीं।
ऐसा नहीं है कि अखिलेश यादव ने साल 2011 में राजनीति में एंट्री ली। वह एक दशक पहले ही साल 2000 में कन्नौज लोकसभा सीट से पहला चुनाव लड़ चुके थे। 2002 के चुनाव में वह स्टार प्रचारक रहे हैं। समाजवादी पार्टी ने 'क्रांति रथ यात्रा' निकाली थी, जिसकी अगुवाई अखिलेश कर रहे थे।
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2012 में ऐसे हर जुबान पर चढ़ गई साइकिल
मायावती के खिलाफ उत्तर प्रदेश में सत्ता विरोधी लहर पैदा करने में अखिलेश यादव सफल रहे थे। उन्होंने उत्तर प्रदेश के उन जिलों में समाजवादी पार्टी की साइकिल रैली निकाली, जहां तक, शीर्ष नेतृत्व कभी गया ही नहीं था। अखिलेश यादव ने इटावा से लेकर गोरखपुर और श्रावस्ती जैसे इलाकों तक अपनी रैली निकाली थी। लोगों की जुबान पर अखिलेश यादव चढ़ गए थे।
2012 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले अखिलेश यादव की 'समाजवादी विकास रथ यात्रा' और प्रदेशव्यापी साइकिल यात्रा समाजवादी पार्टी के लिए गेम-चेंजर साबित हुई। इस अभियान के जरिए अखिलेश यादव ने पार्टी से युवाओं को जोड़ा। पहले जिस समाजवादी पार्टी पर आपराधिक छवि के लोगों को टिकट देने के आरोप लगते थे, अखिलेश यादव ने इसे काफी हद तक बदला।
अखिलेश यादव की छवि, युवा नेता की बनी, जिसने मुलायम सिंह और शिवपाल सिंह के नेतृत्व वाली पुरानी 'बाहुबली' और 'अराजकता' वाली छवि को तोड़ने में मदद की। जमीन पर जाने का असर हुआ कि ग्रामीण क्षेत्रों में समाजवादी पार्टी को तगड़ा जनसमर्थन मिला।
पहली बार वोट करने वाले लोगों ने समाजवादी पार्टी का साथ दिया। युवाओं को लैपटॉप और साइकिल बांटने का वादा किया था, युवाओं ने उस वादे पर भरोसा भी जताया। छोटे और सीमांत किसान इस उम्मीद में भी थे अखिलेश यादव अगर सत्ता में आते हैं तो वह कर्ज माफ करेंगे, यह वादा भी लोगों को रास आया था।
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अखिलेश यादव की साइकिल यात्रा का असर क्या हुआ?
समाजवादी पार्टी ने 224 सीटें जीतकर पहली बार राज्य में अपने दम पर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई। 38 साल की उम्र में अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश के सबसे कम उम्र के मुख्यमंत्री बने। मायावती की बहुजन समाज पार्टी सिर्फ 80 सीटों पर सिमट गई। बीजेपी ने कुल 47 सीटें हासिल की। इससे पहले की अस्थिर सरकार की तुलना में अखिलेश यादव, अपने दमखम पर आए थे। वह देखते ही देखते राष्ट्रीय स्तर के नेता बन गए थे।
'साइकिल नहीं चली तो सत्ता नहीं...', कब समझेंगे अखिलेश?
अखिलेश यादव के धुर विरोधी भी उन्हें साइकिल यात्रा की नसीहत दे रहे हैं। नेताओं से समर्थक तक, बार-बार उन्हें ताना दे रहे हैं कि अगर जमीन पर नहीं उतरेंगे तो लोग आपसे जुड़ेंगे कैसे। साइकिल यात्रा में अखिलेश यादव ने करीब 10,000 किलोमीटर की यात्रा पूरी की थी। अब यही यात्रा, दोबारा उनके समर्थक चाहते हैं।
अखिलेश यादव के धुर विरोधी भी यही कह रहे हैं कि अखिलेश यादव, जमीन पर नहीं उतरते हैं, वह सक्रिय सिर्फ सोशल मीडिया पर रहते हैं, रीलबाजी करते हैं लेकिन जमीन पर नहीं उतरते हैं। अखिलेश यादव भी तर्क देते हैं कि उनका एक ट्विटर पोस्ट की सरकार को डरा देता है। अलग बात यह है कि उन्हें भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ चुनावी मैदान में उतरना है।
साल 2024 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने 37 लोकसभा सीटों पर जीत दर्ज की थी। समाजवादी पार्टी ने फैजाबाद लोकसभा सीट से बीजेपी को करारी हार दी। अखिलेश यादव, इसे बार-बार उपलब्धि की तरह पेश भी करते हैं। ध्यान देने वाली बात यह है कि तृणमूल कांग्रेस, पश्चिम बंगाल में तब हारी है, जब 2019 की तुलना में लोकसभा चुनाव में TMC ने 7 सीटें ज्यादा जीती थीं।
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2019 के चुनाव में तृणमूल कांग्रेस को बड़ा झटका लगा था। 2014 में TMC के कुल 34 सांसद थे, बीजेपी के सिर्फ 2। 2019 में टीएमसी के 22 सांसद चुने गए, बीजेपी के 18। बीजेपी के लिए यह बड़ी जीत थी। 2024 में लोकसभा चुनाव हुए और बीजेपी की सीटें घट गईं। 12 सांसद चुने गए, तृणमूल कांग्रेस के 29 सांसद बने। साल 2026 में विधानसभा चुनाव हुए तो बीजेपी ने प्रचंड बहुमत हासिल किया। 207 विधायक बीजेपी के पास है, तृणमूल कांग्रेस के पास सिर्फ 80। जो आंकड़े 2021 में बीजेपी के पास थे, अब टीएमसी के पास है।
क्या सीख सकते हैं अखिलेश?
ममता बनर्जी का सारा जोर सिर्फ स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR), चुनाव आयोग, वक्फ कानून और नरेंद्र मोदी के मुखर विरोध पर रहा। बीजेपी ने सधी कैंपेनिंग की। करप्शन, कट मनी, अपराध, कानून व्यवस्था और विकास के मुद्दे पर ममता बनर्जी को ग्रामीण स्तर पर घेरा। ममता बनर्जी की पूरी कैंपेनिंग शहरों तक रही, बीजेपी ने गांव में सेंध लगा ली। शहर में पहले ही बीजेपी मजबूत स्थिति में थे। ममता बनर्जी ने अपना कोर वोट खो दिया। अखिलेश यादव, बीजेपी की इस रणनीति से अभी दूर हैं। चुनाव में एक साल का ही वक्त बचा है लेकिन जमीन पर समाजवादी पार्टी की कोई रणनीति नजर नहीं आ रही है।
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