पंजाब में तमाम राजनीतिक दल आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारी में लग गए हैं। इस बीच भारतीय जनता पार्टी ने अपने पुराने सहयोगी शिरोमणि अकाली दल को बड़ा झटका देते हुए पूर्व सीएम प्रकाश सिंह बादल के चचेरे भाई भूपिंदर सिंह ढिल्लों को पार्टी में शामिल किया। मेजर भूपिंदप सिंह ढिल्लों सेना में सेवा दे चुके हैं और हरियाणा के सीएम नायब सिंह सैनी ने खुद उन्हें पार्टी की सदस्यता दिलवाई। मेजर भूपिंदर सिंह ढिल्लों पंजाब के पूर्व सीएम के करीबी सहयोगी रहे हैं और अब अपने परिवार के खिलाफ राजनीति करेंगे। वह अकेले नहीं है जो अपने ही भाई की पार्टी के खिलाफ मैदान में उतरे हैं। उनके पहले तमाम दलों में ऐसे नेता हैं जो अपने भाई के खिलाफ विरोधी दल में राजनीति कर रहे हैं।
बादल परिवार में यह पहली बार नहीं है जब परिवार के सदस्य एक दूसरे के खिलाफ राजनीति करेंगे। इससे पहले प्रकाश सिंह बादल के सगे भाई गुरदास सिंह बादल के बेटे मनप्रीत बादल भी अपने चचेरे भाई सुखबीर बादल के खिलाफ खुलकर मैदान में आए हैं। राजनीतिक मतभेद के कारण उन्होंने साल 2010 में अकाली दल को छोड़ दिया था। इसके बाद से उन्होंने अपनी अलग पार्टी बनाई। 2012 में तो स्थिति यह रही कि गुरदास बादल ने अपने बड़े भाई प्रकाश सिंह बादल के खिलाफ लांबी से विधानसभा चुनाव लड़ा। मनप्रीत बादल ने पार्टी बदली लेकिन कभी अपने भाई सुखबीर के साथ नहीं आए। अब वह भारतीय जनता पार्टी में हैं।
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भगवंत मान के भाई
भगवंत मान के चचेरे भाई ने भी कुछ दिन पहले उनकी विरोधी भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम लिया है। भगवंत मान और उनके भाई ज्ञान सिंह मान ने राजनीति की शुरुआत पीपुल्स पार्टी ऑफ पंजाब से और फिर आम आदमी पार्टी से ही की लेकिन अब दोनों अलग-अलग पार्टियों में हैं। मई 2026 में ज्ञान सिंह मान भाजपा में शामिल हो गए और AAP सरकार की नीतियों पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि पार्टी अपनी मूल नीतियों से भटक गई है।
भाई-बहन बने विरोधी
पंजाब की राजनीति में भाई-बहन के सीधे चुनावी मुकाबले का चर्चित उदाहरण मालेरकोटला का है। 2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने पूर्व विधायक राजिया सुल्ताना को मैदान में उतारा, जबकि आम आदमी पार्टी ने उनके भाई मोहम्मद अरशद डाली को उम्मीदवार बनाया। दोनों भाई-बहन एक ही सीट पर अलग-अलग पार्टियों से उम्मीदवार बने। चुनाव प्रचार के दौरान दोनों के बीच लंबे समय से चले आ रहे पारिवारिक मतभेद भी चर्चा में रहे। मुकाबले में राजिया सुल्ताना को 58,982 वोट मिले और उन्होंने SAD के मोहम्मद ओवैस को 12,702 वोट से हराया, जबकि अरशद डाली 17,635 वोट के साथ तीसरे स्थान पर रहे।
बाजवा ब्रदर्स साथ रह रहे लेकिन पार्टियां अलग
पंजाब कांग्रेस के दिग्गज नेता और नेता प्रतिपक्ष प्रताप सिंग बाजवा और उनके छोटे भाई फतेह जंग सिंह बाजवा भी अलग-अलग दलों से राजनीति कर रहे हैं। कादियां विधानसभा सीट उनके परिवार की पारंपरिक सीट रही लेकिन बाद में यही सीट परिवार के बीच विवाद का कारण बनी। 2012 में कांग्रेस ने प्रताप सिंह बाजवा की पत्नी चरनजीत कौर बाजवा को कादियां से टिकट दिया, जिससे फतेह जंग नाराज हुए। बाद में 2017 में फतेह जंग इसी सीट से कांग्रेस के विधायक बने लेकिन बाद में प्रताप सिंह बाजवा ने इस सीट से चुनाव लड़ने की इच्छा जाहिर की। इसके बाद फतेह जंग सिंह बाजवा बीजेपी में शामिल हो गए और गुरदासपुर की बटाला सीट से चुनाव लड़े लेकिन वह हार गए।
इन दोनों भाईयों के बारे में रोचक कहानी यह भी है कि ये दोनों भाई गुरदासपुर में अपने पैतृक घर में एक दूसरे के पड़ोसी भी हैं। दोनों भाईयों का घर एक ही जगह हैं जहां ग्राउंड फ्लोर प्रताप सिंह बाजवा और ऊपर का फ्लोर फतेह जंग सिंह बाजवा का घर है। इन दोनों को आम आदमी पार्टी कई बार तंज भी कसती है। भगवंत मान ने कहा कि अगर प्रताप सिंह बाजवा कभी गलती से कुछ सीढ़ी ऊपर चढ़ गए तो वह बीजेपी में चले जाएंगे।
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कई अन्य नाम
पंजाब की राजनीति में एक ही परिवार में राजनीतिक लड़ाई के कई किस्सें हैं। डेरा बाबा नानक में 2017 में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सुखजिंदर सिंह रंधावा के सामने उनके भतीजे दीपिंदर रंधावा आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार के रूप में उतरे। इसके अलावा भी कई राजनीतिक परिवारों में सत्ता की लड़ाई देखने को मिली है। आगामी विधानसभा चुनाव में भी कई परिवारों के सदस्य आपस में लड़ाई करते दिख सकते हैं।