ममता बनर्जी के सामने बिखर क्यों गया लेफ्ट? कहानी TMC के सत्ता में आने की
2000 के दशक तक, पश्चिम बंगाल में वामदलों का दबदबा रहा। 34 साल से चले आ रहे वाम राजनीति को ममता बनर्जी ने साल 2000 में हाशिए पर पहुंचाया। यह कैसे हुआ, आइए समझते हैं

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी। (Photo Credit: PTI)
20 मार्च 1972। कांग्रेस के सिद्धार्थ शंकर रे पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बने। बंगाल कांग्रेस की विदाई हुई, मुख्य धारा की कांग्रेस पार्टी को राज्य संभालने का मौका मिला। सिद्धार्थ शंकर, 30 अप्रैल 1977 तक मुख्यमंत्री रहे लेकिन यह 5 साल 41 दिनों का कार्यकाल कांग्रेस के लिए पश्चिम बंगाल में आखिरी कार्यकाल रहा। जब 1977 में विधानसभा चुनाव हुए तो कांग्रेस की करारी हार हुई। कांग्रेस 20 सीटों पर सिमट गई, लेफ्ट के पास 230 से ज्यादा सीटें आईं।
लेफ्ट फ्रंट की अगुवाई, कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) कर रही थी। इंदिरा गांधी के आपातकाल खिलाफ के लोगों में गुस्सा था। पश्चिम बंगाल में यह और गंभीर था क्योंकि मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर रे की सरकार पर कम्युनिस्टों और नक्सलवादियों के खिलाफ राज्य-प्रायोजित हिंसा के संगीन आरोप लगे थे।
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कांग्रेस के हाथों से कैसे फिसला पश्चिम बंगाल?
कांग्रेस पर 1972 के चुनावों में धांधली के आरोप लगे थे। कांग्रेस में गुटबाजी, अनुशासन हीनता और दलबदल इस कदर हावी रहा कि आम जनता ऊब गई। नतीजा यह हुआ कि लेफ्ट फ्रंट सत्ता में आया और 1977 से 2011 तक लगातार 34 साल तक बंगाल को लेफ्ट का गढ़ बना दिया। वामपंथी सरकार ने भूमि सुधार, पंचायती राज और ग्रामीण विकास जैसे कामों का प्रचार किया और राज्य में अजेय बनी रही। लेफ्ट से 2000 के दशक में कुछ ऐसी गलतियां हुईं, जिसकी वजह से 2011 तक, लेफ्ट से जनता भरोसा उठ गया। पश्चिम बंगाल में साल 2011, किसी क्रांति की तरह रहा। 34 साल से जिस वामपंथी सरकार की सत्ता पश्चिम बंगाल में स्थिर हो गई थी, ममता बनर्जी ने उसे उखाड़ फेंका। उखाड़ा भी इस तरह कि अब वामपंथ, वहां हाशिए पर है, अस्तित्व बचाने की जंग लड़ रहा है। अंजाम सिर्फ लेफ्ट का बुरा नहीं हुआ। ममता बनर्जी खुद जिस कांग्रेस पार्टी से आती हैं, उसे भी हाशिए पर पहुंचा दिया।
लेफ्ट के 34 साल के शासन का अंत कैसे हुआ?
3 दशक तक लगातार दुनिया के किसी भी हिस्से में, लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई कम्युनिस्ट सरकार अस्तित्व में नहीं रही। पश्चिम बंगाल अपवाद था यहां 1977 से लेकर 2011 तक कम्युनिस्ट सत्ता में रहे। साल 2011 में ममता बनर्जी ने वामदल की सरकार को ऐसे विदा किया कि यह सारे वम दल, पश्चिम बंगाल में हाशिए पर हैं। टीएमसी और कांग्रेस के गठबंधन ने भारी बहुमत से जीत हासिल की थी। तृणमूल कांग्रेस ने 184 सीटें जीत ली थीं, वाम दल 62 सीटों पर सिमट गए थे। पश्चिम बंगाल की 294 विधानसभा सीटों पर टीएमसी-कांग्रेस गठबंधन को 227 सीटों पर कामयाबी मिली, वहीं लेफ्ट फ्रंट 62 सीटों पर सिमट गया।
34 साल के शासन में पश्चिम बंगाल में सिर्फ 2 मुख्यमंत्री रहे। ज्योति बसु और उनके राजनीतिक उत्तराधिकारी बुद्धदेब भट्टाचार्य। 1977, 1982, 1987 और 1996 के विधानसभा चुनावों में जीत के बाद लगातार ज्योति बसु मुख्यमंत्री रहे। वह 23 साल 138 दिन मुख्यमंत्री रहे। उनेक बाद साल 1996 में ही बु्धदेव भट्टाचार्य ने कमन संभाली। 1996, 2001 और 2006 के चुनावों में उनके नेतृत्व में लेफ्ट को जीत मिली और वह 10 साल 195 दिनों तक मुख्यमंत्री रहे। यह लेफ्ट की आखिरी सरकार साबित हुई।
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विवाद, जिन्होंने लेफ्ट को विदा किया
34 साल का शासन, किसी भी सरकार का रहे तो राज्य में सत्ता विरोधी लहर उठनी तय है। ममता बनर्जी, विपक्ष का बड़ा चेहरा बन चुकी थीं। 1 जनवरी 1998 को ममता बनर्जी ने कांग्रेस से राहें अलग कीं और अलग पार्टी तृणमूल कांग्रेस की नींव रखी। अलग बात है कि वह चुनाव में कांग्रेस के साथ गठबंधन करती रहीं। साल 2011 के चुनाव में भी गठबंधन था। वाम दल जनता का मिजाज समझने में असफल रहे और ममता बनर्जी ने इसे भुना लिया। दो आंदोलनों ने पश्चिम बंगाल की सत्ता से लेफ्ट को विदा कर दिया।
- सिंगूर आंदोलन: पश्चिम बंगाल राजनीतिक रूप से अस्थिर दौर से गुजर रहा था। देश के दूसरे हिस्सों में औद्योगीकरण अपने चरम पर था, लेफ्ट सरकार पर भी दबाव बढ़ रहा था। बुद्धदेव भट्टाचार्य सरकार ने भी औद्योगीकरण की नीति अपनाई। हुगली जिले के सिंगुर में टाटा मोटर्स को 'नैनो' कार फैक्टरी के लिए 997 एकड़ जमीन दी गई। सरकार का कहना था कि इस नीति से रोजगार और विकास को गति मिलेगी। ज्यादातर किसानों ने जमीन देने से इनकार कर दिया। उनका कहना था कि यह कृषि के लिहाज से उपजाऊ जमीन है, यहां चावल, आलू और जूट की खेती होती है। किसानों को जो मुआवजा दिया जा रहा है, वह अपर्याप्त है। ममता बनर्जी ने सिंगूर आंदोलन की अगुवाई की। उन्होंने इस आंदोलन को 'माटी, मानुष' का संघर्ष बताया। पश्चिम बंगाल में धरना, रैली और बंद का दौर चला। महिलाओं की अगुवाई में शुरू यह आंदोलन पुलिस के साथ झड़पों में बदला। ममता बनर्जी ने 2006 में 25 दिनों की भूख हड़ताल की। उन्हें बुद्धिजीवियों का समर्थन मिला। साल 2008 तक विरोध इतना बढ़ा कि टाटा ने इस प्रोजेक्ट को वहां से हटा लिया। गुजरात में यह प्रोजेक्ट है। लेफ्ट के खिलाफ जनता का आक्रोश चरम पर पहुंच गया।
- नंदीग्राम आंदोलन: पूर्वी मेदिनीपुर जिले में 2007 में आंदोलन भड़का। अधिग्रहण के खिलाफ वाम सरकार घिर गई थी। इंडोनेशिया की सलीम ग्रुप कंपनी को केमिकल हब, स्पेशल इकॉनमिक जोन बनाने के लिए करीब 14,000 एकड़ उपजाऊ जमीन का सौदा किया गया। सरकार का कहना था कि इससे उद्योग आएंगे और रोजगार बढ़ेगा, लेकिन किसान तैयार नहीं थे। वाम सरकार के इस आंदोलन के खिलाफ माओवादी भी आ गए, जबकि लेफ्ट के साथ उनका नैतिक समर्थन रहता है। कांग्रेस, टीएमसी और जमात-उलेमा-ए-हिंद ने आंदोलन किया। किसानों ने सड़कों को खोद दिया, कार्यकर्ताओं को रोका। 14 मार्च 2007 को पुलिस ने गांवों में घुसकर फायरिंग की, जिसमें आधिकारिक तौर पर 14 लोग मारे गए। कई घायल हुए, बलात्कार और हिंसा की खबरें आईं। पश्चिम बंगाल की सियासत में इसकी अगले एक दशक के ममता सरकार की नींव रख गया।
ममता बनर्जी ने कैसे जनता में बनाई पैठ?
ममता बनर्जी की भूमिका दोनों आंदोलनों में मुखर रही। ममता बनर्जी, जन आंदोलनों की नेता बन गईं। उनकी पार्टी का विस्तार हुआ। ममता बनर्जी ने तय किया कि आने वाले विधानसभा चुनाव में वह 226 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारेंगी, कांग्रेस को 60 से ज्यादा सीटें देंगी। ममता बनर्जी का आंदोलनों में बढ़-चढ़कर शामिल रहना काम आया। साल 2011 में ममता सत्ता में आईं। उन्होंने किसानों को 400 एकड़ जमीन वापस दिलाने का कानून पास करवाया। 2016 में सुप्रीम कोर्ट ने अधिग्रहण अवैध बताया और जमीन लौटाने का आदेश दिया। सिंगूर के किसान ममता बनर्जी से खुश हुए।
ऐसे हाशिए पर पहुंचता चला गया लेफ्ट
- विचारधारा की जंग हारा लेफ्ट: वामदलों की छवि किसान, दलित, पीड़ित और वंचित समर्थक की होती है। ग्रामीण, गरीब और किसान की सियासत करने वाले लेफ्ट ने इसी वर्ग की राजनीति छोड़ दी। लेफ्ट का विकासवादी होना, जनता को रास नहीं आया।
- मां, माटी, मानुष का नैरेटिव सफल: एक तरफ लेफ्ट की छवि जन विरोधी बनी, ममता बनर्जी लेफ्ट से इतर नई रणनीति बनाकर ले आईं, जिसकी वजह से लोगों ने लेफ्ट को किसान विरोधी मान लिया। लेफ्ट ता पॉपुलिस्ट वोट बैंक ही छिन गया। कांग्रेस से अलग होकर अपनी जमीन तैयार की और लेफ्ट के खिलाफ एक आक्रामक चेहरा बनकर उभरीं।
- भ्रष्टाचार और पार्टी की ब्यूरोक्रेसी: लेफ्ट के साथ दिक्कत यह रही कि वह विचारधारा की तरह सरकार चलाने लगे। जैसे वाम दलों में आंतरिक अफसरशाही होती है, वैसी ही पार्टी और प्रशासन की छवि बनी। कैडर स्तर पर CPI (M) कैडरों की गुंडागर्दी, हिंसा में संलिप्तता ने पार्टी की छवि धूमिल की। बुद्धदेव भट्टाचार्य ने भी खुद मान लिया कि उनकी सरकार में भ्रष्टाचार चरम पर था, लोगों ने हरा कर पार्टी को सजा दी।
- CPM कैडरों के खिलाफ असंतोष: ममता बनर्जी लगातार आरोप लगाती रहीं कि 34 सालों के लंबे शासन के दौरान, सीपीएम का कैडर राज हावी हो गया था। सरकारी दफ्तरों से लेकर पुलिस थानों और स्कूल-अस्पतालों तक, हर जगह पार्टी का नियंत्रण था। आम आदमी बिना पार्टी की मर्जी के कोई काम नहीं करा पाता था। इस 'दमघोंटू' व्यवस्था ने जनता के बीच अंदरूनी गुस्सा भर दिया था।
- एकजुट विपक्ष ने लेफ्ट को खत्म किया: कांग्रेस भी जनाधारों वाली पार्टी थी। ममता बनर्जी के साथ आने से पार्टी को बल मिला। साल 2009 के लोकसभा चुनाव में लेफ्ट औंधे मुंह गिरी थी, 2011 का मिजाज टीएमसी भांप गई थी। ममता बनर्जी ने मां, माटी, मानुष और मुसलमान की राजनीति से सत्ता बदल दी।
- ममता बनर्जी का 'दीदी' बनना: ममता बनर्जी ने बिखरे विपक्ष को एकजुट कर लिया। 2009 के बाद ममता बनर्जी का कद अप्रत्याशित तौर पर बढ़ा। उन्होंने मुस्लिम और गरीब ग्रामीणों की बात की। ममता बनर्जी का रुख औद्योगीकरण के खिलाफ रहा। गरीब जनता में ममता बनर्जी अपनी साफ-सुथरी छवि लेकर गईं, जो लेफ्ट की तुलना में जनता को ज्यादा भरोसेमंद लगा। स्वास्थ्य, शिक्षा और स्थानीय प्रशासन को लेकर जनता में असंतोष था। ममता बनर्जी ने इसे भुनाने का काम किया। पंचायत चुनाव और नगर निकाय चुनावों में लेफ्ट की हार ने संकेत दिया था कि ममता बनर्जी राजनीति में टिकने वाली हैं।
मुस्लिम वोट बैंक का ध्रुवीकरण
पश्चिम बंगाल की राजनीति में मुस्लिम आबादी करीब 30 फीसदी है। मुर्शिदाबाद, मालदा, और उत्तर दिनाजपुर में मुस्लिम वोटर हावी हैं। यहां कुल 42 से ज्यादा सीटें हैं, जो रणनीतिक तौर पर अहम हैं। सच्चर कमेटी की एक रिपोर्ट ने तृणमूल कांग्रेस को लेफ्ट पर और हावी कर दिया। दावा किया गया कि लेफ्ट के शासन में राज्य के मुसलमानों की आर्थिक और सामाजिक स्थिति काफी खराब थी। मुस्लिम वोट बैंक लेफ्ट से छिटककर टीएमसी पर शिफ्ट हो गया।
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अब किस हाल में है लेफ्ट?
वामपंथी दलों का जन समर्थन पश्चिम बंगाल में लगातार खराब रहा है। साल 2009 से लेकर 2024 तक लोकसभा में, 2011 से लेकर 2021 तक लेफ्ट का ग्राफ लगातार गिरता रहा है। 2009 के चुनाव में लेफ्ट को सिर्फ 9 सीटें हासिल हुईं। टीएमसी और कांग्रेस के गठबंधन को 19 सीटें मिलीं, बीजेपी ने सिर्फ 1 सीट पर जीत हासिल की थी। 2014 में टीएमसी ने जहां प्रचंड मोदी लहर में भी 34 सीटें जीत लीं, बीजेपी को 2 सीट और कांग्रेस को 4 सीट मिली। लेफ्ट 2 सीट से आगे नहीं बढ़ पाया।
2019 में ममता का गढ़ हिल गया। 22 सीटें ममता बनर्जी को मिलीं, 18 सीटों पर बीजेपी आई। लेफ्ट शून्य पर सिमट गई। 2024 में टीएमसी 28, बीजेपी 12 और कांग्रेस 1 सीट पर सिमटी। लेफ्ट शून्य रही। विधानसभा चुनावों के भी आंकड़े सुखद नहीं रहे। 2011 में टीएमसी को 184 सीटें मिलीं, लेफ्ट 62 पर सिमटा। 2016 में टीएमसी ने 211 सीटें जीतीं, बीजेपी लेफ्ट को 32 सीटें मिलीं। 2021 में टीएमसी को 213 सीटें मिलीं, बीजेपी ने 70 से ज्यादा सीटें जीतीं लेकिन लेफ्ट खाता तक नहीं खोल पाई। पश्चिम बंगाल में अभी लेफ्ट नेतृत्व की तलाश में है, दूसरी तरफ टीएमसी के पास स्थापित चेहरा है।
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