अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावा चोरी और दान की चोरी के मामले ने देश की सियासत गर्मा दी है। हिंदुत्व और राम मंदिर के मुद्दे पर फ्रंटफुट पर खेलने वाली बीजेपी और उसके नेता बैकफुट पर नजर आ रहे हैं। वहीं, विपक्षी दल और उनके नेता राम मंदिर में हुई चोरी के मुद्दे पर बीजेपी को जमकर घेर रहे हैं। इसको लेकर घेरने में दो राज्यों के नेता सबसे आगे हैं। एक खुद उत्तर प्रदेश से समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष
अखिलेश यादव
और महाराष्ट्र से शिवसेना (UBT) के अध्यक्ष उद्धव ठाकरे। राम मंदिर आदोलन में शामिल रही अविभाजित शिवसेना में अब भले ही दो फाड़ हो गई है लेकिन शिवसेना का एक एकनाथ शिंदे गुट बीजेपी के साथ है। शिंदे गुट मंदिर में हुई चोरी पर एकदम खामोश है।
मगर, बीजेपी की विरोधी शिवसेना (UBT) उद्धव ठाकरे गुट बीजेपी पर गंभीर आरोप लगाकर उसपर हमलावर है। दरअसल, महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे, उनके पिता बाल ठाकरे और उनकी शिवसेना की पहचान ही फायरब्रांड हिंदुत्व वाली छवि से रही है। साथ ही ठाकरे परिवार राम मंदिर को लेकर आक्रामक रहा है। लेकिन ठाकरे परिवार से पार्टी छिनने और सत्ता से दूरी ने उन्हें एक बार फिर से उठने का मौका दिया है। इस मौके को उद्धव ठाकरे ने लपक लिया है।
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चोरी के खिलाफ 'राम रक्षा आंदोलन'
दरअसल, शिवसेना (UBT) प्रमुख उद्धव ठाकरे ने अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावे की चोरी के खिलाफ 'राम रक्षा आंदोलन' शुरू किया। रविवार को उन्होंने इस मौके पर बीजेपी पर जमकर निशाना साधा। उद्धव ठाकरे ने मुंबई की बारिश में भीगते हुए हजारों शिवसैनिकों के सामने कहा, 'यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि हिंदुओं को लूटने वाले लोग सत्ता में हैं। किसी लुटेरे से उसकी अपनी लूट की जांच करने के लिए नहीं कहा जा सकता। यह काम निष्पक्ष रूप से किया जाना चाहिए।'

पूरी तैयारी करके आए थे उद्धव ठाकरे
इस मौके पर उद्धव ठाकरे पूरी तैयारी करके आए थे। उन्होंने भगवा रंग का कुर्ता पहना हुआ था। पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ में उन्होंने सेंट्रल मुंबई के दादर स्थित हनुमान मंदिर में हनुमान स्तोत्र और हनुमान चालीसा का पाठ किया। यही नहीं शिवसेना प्रमुख ने 'अयोध्या तो झांकी है, काशी-मथुरा अभी बाकी हैं' के नारे का जिक्र करते हुए कहा कि उन्हें इस बात की चिंता है कि काशी और मथुरा में क्या होगा।
मामले की निष्पक्ष जांच की मांग
उद्धव ठाकरे ने हनुमान मंदिर के बाहर एक रैली को संबोधित करते हुए मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की। भगवा रंग का कुर्ता पहने उद्धव ने कहा कि अगर कोई हिंदुत्व का गलत इस्तेमाल करके मंदिर को लूटता है, तो हिंदू उसे नहीं बख्शेंगे।

हिंदुओं को सम्मोहित किया जा रहा
हनुमान चालीसा का पाठ करते हुए उन्होंने अपने सामने खड़े शिवसेना कार्यकर्ताओं से हिंदुत्व की राजनीति पर अपन दावा किया। उन्होंने लोगों से हिंदुत्व की असली विरासत को वापस पाने की अपील की और अपनी शिवसेना को बाल ठाकरे की राजनीति का असली वारिस बताया। उद्धव ने कहा, 'हम निडर, मासूम और देश से प्यार करने वाले हिंदू हैं, लेकिन मूर्ख नहीं। शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे ने हिंदुओं को जगाया था, लेकिन आज उन्हें सम्मोहित किया जा रहा है।'
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उद्धव ठाकरे की जमीन खिसकने की शुरूआत
उद्धव ठाकरे की शिवसेना 2019 से पहले तक बीजेपी की साथी रहा करती थी। दोनों पार्टियों की सियासत लगभग एक जैसी थी। बीजेपी और शिवसेना दोनों ही हिंदुत्व और राम मंदिर की सियासत के महारथी थे। मगर, 2019 में महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में किसी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने पर शिवसेना बीजेपी से अलग हो गई और 'महा विकास अघाड़ी' में शामिल हो गई। ऐसे में महा विकास अघाड़ी की राज्य में सरकार बनी और उद्धव ठाकरे उसके मुख्यमंत्री।

एकनाथ शिंदे को मिला मौका
महा विकास अघाड़ी में कांग्रेस, एनसीपी और शिवसेना शामिल थे। कांग्रेस और एनसीपी के साथ आने से उद्धव ठाकरे और शिवसेना ने अपनी आक्रामक हिंदुत्व वाली राजनीति छोड़ दी और सॉफ्ट हो गए। आखिरकार 2.5 साल महाराष्ट्र की सरकार चलाने के बाद 2022 में शिवसेना में बगावत हो गई और उद्धव ठाकरे की सरकार गिर गई। एकनाथ शिंदे ने उद्धव ठाकरे की पार्टी, सरकार और जनत के दिलों पर विजय हासिल कर ली। 2022 में हुई बगावत के बाद फिर ऐसा कोई मौका नहीं आया, जिससे ठाकरे और उनके हिस्से में आई शिवसेना को उठने का मौका मिले।
सियासी जमीन वापस पाना चाहते हैं उद्धव
शिवसेना (UBT) 2024 का महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव हार गए। 2024 के लोकसभा चुनाव में उन्हें 9 सीटें मिलीं लेकिन हाल ही में 6 सांसदों ने उनसे बगावत करके शिंदे वाली शिवसेना में शामिल हो गए। ऐसे में उद्धव ठाकरे सियासी रूप से मजबूत होने के लिए एक बार फिर से जनता के बीच में अपनी वहीं पुरानी हिंदुत्व वाली छवि को लाइमलाइट में ला रहे हैं। वह बीजेपी की जगह खुद को हिंदुत्व की राजनीति और राम मंदिर के लिए सबसे उपयुक्त बता रहे हैं। ऐसे में उद्धव के सामने पुराने तेवर के साथ में 'राम रक्षा आंदोलन' करके पाने के लिए बहुत कुछ है। ये सब करके शायद उद्धव ठाकरे अपनी खोई हुई सियासी जमीन वापस पाना चाहते हैं?