या तो मिल गए, या हाशिए पर, तीसरे मोर्चे की कवायद करने वाले नेताओं का क्या हुआ?
कांग्रेस के नेतृत्व से अलग, तीसरे मोर्चे की कवायद खूब हुई लेकिन ज्यादातर नेता या तो एनडीए में शामिल हो गए या अलग-थलग पड़ गए। पढ़ें रिपोर्ट।

नीतीश कुमार, ममता बनर्जी और चंद्रबाबू नायडू। AI Edits, Photo Credit: ChatGPT
साल 2024। देश में लोकसभा चुनाव होने वाले थे। 2014 और 2019 के दो चुनावों में भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने प्रचंड बहुमत से जीत हासिल की थी। दोनों चुनाव में कांग्रेस हाशिए पर पहुंच गई थी। 2014 में कांग्रेस ने 44 सीटें जीतीं, 2019 में 52 सीटें। सियासत में क्षेत्रीय दलों के प्रमुखों को यह लगने लगा कि अब कांग्रेस का सफर शून्य है, कांग्रेस का भविष्य नहीं है तो तीसरे मोर्चे की कवायद शुरू होने लगी। यह तीसरा मोर्चा, कांग्रेस के बाहर नहीं, कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन के दायरे में ही हो रहा था।
बिहार में राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के प्रमुख लालू यादव रहे हों या पश्चिम बंगाल की तत्कालीन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, उन्होंने कांग्रेस के नेता राहुल गांधी को अपना नेता मानने से इनकार किया था। राहुल गांधी को तंज भी सुनने को मिला, विरोध भी हुआ। बिहार, पश्चिम बंगाल से लेकर तमिलनाडु तक, कांग्रेस के नेतृत्व वाले 'इंडिया गठबंधन' के अधीन रहने पर ऐतराज कई नेताओं को रहा। ममता बनर्जी, सबसे मुखर स्वर रहीं। उन्हें कांग्रेस का कनिष्ठ सहयोगी बनना रास नहीं आया।
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आइए जानते हैं उन नेताओं का क्या हुआ, जिन्होंने सबसे ज्यादा तीसरे मोर्चे की कवायद की लेकिन हासिल कुछ नहीं हुआ-
ममता बनर्जी, 'इंडिया' का नेतृत्व करना था, TMC नहीं बचा पाईं
पश्चिम बंगाल में 1.5 दशक तक वह लगातार सत्ता में रहीं। सबसे मजबूत नेताओं से एक। किसी जमाने में कांग्रेस में रहीं लेकिन बाद में अपनी पार्टी बनाई। ममता बनर्जी को राहुल गांधी नेता के तौर पर कभी मंजूर नहीं रहा। दिसंबर 2024 में ही उन्होंने साफ कह दिया था कि वह ठीक से नेतृत्व नहीं कर सकते हैं तो यह जिम्मेदारी सौंप दे। ममता बनर्जी खुद, इस मोर्चे की अगुवाई करना चाहती थीं।
साल 2014 और 2019 में ममता बनर्जी ने बीजेपी की प्रचंड लहर के बाद भी पश्चिम बंगाल में बढ़त हासिल की थी। 2014 टीएमसी के 34 सांसद चुने गए, 2019 में 22 और 2024 में 29। ममता बनर्जी को लगा कि वह अब देश का नेतृत्व करेंगी। एकला चलो की राह पर आगे भी बढ़ने लगीं। 2026 में जब विधानसभा चुनाव हुए तो उन्हें तगड़ा झटका लगा। 4 मई को दीदी, पश्चिम बंगाल की सत्ता से चली गईं। अब उनकी पार्टी के 58 विधायक बगावत कर चुके हैं, उनके पास सिर्फ 20 विधायकों का समर्थन है।
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नीतीश कुमार: PM की दावेदारी थी, CM पद से भी इस्तीफा दे बैठे
ममता बनर्जी के बाद एक नाम, जिसकी चर्चा खूब रही वह था नीतीश कुमार। नीतीश कुमार, बिहार की सियासत के धुरी थे। वह 2005 से ही लगातार बिहार की सत्ता में बने हुए थे। 9 अगस्त 2022 को उन्होंने दोबारा बीजेपी के साथ गठबंधन तोड़ा और इंडिया ब्लॉक के अगुवा बने। ममता बनर्जी से मिले, देश भर के दिग्गजों ने उनका साथ दिया।
5 महीने में उन्हें एहसास हो गया कि वह दोबारा गलती कर बैठे हैं, इंडिया ब्लॉक को छोड़कर दोबारा वह एनडीए में लौट आए। 28 जनवरी 2024 को उन्होंने एलान किया कि वह एनडीए का हिस्सा है, दोबारा कभी नहीं आरजेडी से गठबंधन करेंगे। नवंबर 2025 में बिहार में विधानसभा चुनाव हुए, नीतीश कुमार ने 14 अप्रैल 2026 को अपने पद से इस्तीफा दे दिया। तीसरे मोर्चे की कवायद करने वाले नीतीश कुमार, अब मुख्यमंत्री भी नहीं हैं। उनके डिप्टी रहे सम्राट चौधरी, राज्य की कमान संभाल रहे हैं।
चंद्र बाबू नायडू, अब बीजेपी के सच्चे दोस्त हो गए
चंद्र बाबू नायडू, कभी तीसरे मोर्चे की सबसे ज्यादा बात करते थे। 1990 के के बाद से ही वह गैर बीजेपी और गैर कांग्रेसी मोर्चेकी कवायद करने लगे। 2019 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले भी उन्होंने विपक्षी दलों को एकजुट करने की असफल कोशिश की थी लेकिन कामयाबी हासिल नहीं हो पाई। लोगों ने उन्हें नेता नहीं माना, विपक्ष के नेतृत्व की जिम्मेदारी कमजोर होकर भी कांग्रेस के पास ही रही।
भारतीय जनता पार्टी का ऐसा वर्चस्व बढ़ा कि उन्होंने व्यावहारिक राजनीति को प्राथमिता दे दी। यह कवायद ही पूरी तरह बंद कर दी। 2024 में अल्पमत बीजेपी इसलिए सत्ता में है क्योंकि चंद्र बाबू नायडू ने एनडीए गठबंधन के तहत अपना समर्थन दिया है। उनकी पार्टी, तेलगू देशम पार्टी (TDP) एनडीए गठबंधन का हिस्सा है।
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एचडी देवेगौड़ा, धुर विरोधी लेकिन अब एनडीए के अटूट साथी
एची देवेगौड़ा प्रधानमंत्री रहे हैं। वह तीसरे मोर्चे के सबसे पुराने चेहरे हैं। उनकी पार्टी, जनता दल सेक्युलर की सबसे ज्यादा अदावत कभी बीजेपी के साथ ही रही, जब कर्नाटक में एचडी कुमारस्वामी के नेतृत्व वाली सरकार 23 जुलाई 2019 को गिरा दी थी। कांग्रेस और जनता दल सेक्युलर गठबंधन की सरकार कर्नाटक में थी। 2020 से ही वह राज्यसभा में सांसद हैं लेकिन अब कमजोर हालत में हैं। उनकी पार्टी, एनडीए का हिस्सा है। 22 सितंबर 2023 को यह दल, एनडीए गठबंधन में शामिल हो गया। उनके बेटे एचडी कुमारस्वामी अब केंद्रीय मंत्री हैं।
और कौन से चेहरे हैं, जिन्हें तीसरे मोर्चे से उम्मीद
अखिलेश यादव की अध्यक्षता वाली समाजवादी पार्टी, संसद में कांग्रेस के बाद दूसरी सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी है। वह विपक्षी एकता की कवायद करते हैं, कांग्रेस के साथ रहते हैं लेकिन अगर कभी विपक्ष की सरकार बनी तो उनकी अहम भूमिका होगी। यूपी की सियासत में उनका क्रेज कम नहीं हुआ है। 2024 के लोकसभा चुनाव में उनकी पार्टी ने 37 सीटें हासिल हैं। मायवती, तीसरे मोर्चे पर उदासीन रहने वाली वाली नेता रहीं हैं लेकिन अब राजनीतिक तौर पर हाशिए पर हैं। वह अकेले चुनावों में उतरी हैं। उनकी पार्टी का जनाधार 2012 से ही लगतार घट रहा है। वामपंथी दल इतने कमजोर हैं कि अपने दम पर वे तीसरे मोर्चे की कवायद कर ही नहीं सकते हैं।
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