साल 2022 के चुनाव में समाजवादी पार्टी का अभियान पीक पर था। कई गठबंधन सहयोगी जुड़े थे। पश्चिमी यूपी से लेकर पूर्वांचल तक कई नए समीकरण बने थे और इसका असर सपा के वोट प्रतिशत पर भी पड़ा था। इसके बावजूद सपा सत्ता से दूर हो गई और उसके गठबंधन सहयोगी दूर होते गए। अब समाजवादी पार्टी छोटे सहयोगियों के बजाय राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस के सहारे चुनाव में उतरने की तैयारी में है और इस बार नए समीकरण गढ़े जा रहे हैं। उन सीटों पर सपा ने खास जोर देना भी शुरू कर दिया है जिन पर कम अंतर से हार और जीत हुई थी। पिछली बार 55 सीटें ऐसी थीं जिन पर जीत और हार का अंतर 5 हजार से भी कम था। यही वजह है कि सपा ऐसी सीटें जीतने पर ज्यादा ध्यान दे रही है।
2022 में सपा का गठबंधन जयंत चौधरी के राष्ट्रीय लोक दल (RLD), कृष्णा पटेल के अपना दल (कमेरावादी), प्रगतिशील समाजवादी पार्टी (लोहिया), केश मौर्य के महान दल और ओम प्रकाश राजभर की सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (SBSP) से था। बीजेपी के साथ, अपना दल (सोनेलाल) और निषाद पार्टी थीं। तब कांग्रेस और बहुजन समाज पार्टी (BSP) अलग-अलग चुनाव लड़े थे।
किस पार्टी को कितनी सीट मिली थी?
उत्तर प्रदेश में विधानसभा की कुल 403 सीटें हैं। बहुमत के लिए 202 सीटों पर जीत जरूरी होती है। मुख्य लड़ाई बीजेपी और समाजवादी पार्टी के बीच थी। दोनों पार्टियों के साथ कुछ अन्य दल भी थे। इन दो दलों के अलावा बहुजन समाज पार्टी, कांग्रेस, AIMIM और आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) ने भी जमकर चुनाव लड़ा था।
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BSP ने सभी 403, कांग्रेस ने 399 और बीजेपी ने कुल 376 सीटों पर अपने उम्म्मीदवार उतारे थे। समाजवादी पार्टी ने 347, AIMIM ने 95, RLD ने 33, अपना दल (सोने लाल) ने 17 और आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) ने 110 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे। इसमें से बीजेपी ने 255 और सपा ने 111 सीटों पर जीत हासिल की थी। कांग्रेस को सिर्फ 2, BSP को 1, अपना दल (सोनेलाल) को 12, RLD ने 8, निषाद पार्टी ने 6 और ओण प्रकाश राजभर की SBSP ने 6 सीटों पर जीत हासिल की थी।
कांटे की टक्कर में पीछे हुई सपा
2022 के चुनाव में सबसे बड़ी जीत बीजेपी के सुनील कुमार शर्मा ने हासिल की थी। साहिबाबाद सीट पर सुनील कुमार शर्मा ने सपा के अमरपाल शर्मा को 2,14,835 वोटों से हराया। नोएडा, दादरी, मेरठ कैंट, आगरा उत्तरी, मेहरोनी, मथुरा, ललितपुर, गाजियाबाद, गोरखपुर शहरी और हाथरस सीटें ऐसी थीं जहां बीजेपी ने सपा या उसके सहयोगियों को कम से कम एक लाख वोटों के अंतर से हराया। हालांकि, हम बात कर रहे हैं उन सीटों की जहां कुछ सौ या हजार वोटों के अंतर से पासा पलट गया।
1000 से कम अंतर वाली सीटें: कुल 15 सीटें ऐसी थीं जिन पर जीत और हार का अंतर 1000 से भी कम था। धामपुर विधानसभा में तो BJP के अशोक कुमार राणा ने सपा के नसीम उल हसन को सिर्फ 203 वोटों के अंतर से हरा दिया था। इन 15 में से 6 सीटें समाजवादी पार्टी को मिलीं और 8 सीटों पर बीजेपी ने जीत हासिल की। एक सीट पर निषाद पार्टी के रमेश सिंह जीते थे। यानी बीजेपी के गठबंधन को 9 सीटें मिलीं और सपा को 6 सीटें।
1000 से 2000 वोट का अंतर: कुल 14 सीटें ऐसी थीं जिन पर जीत और हार का अंतर 1000 से 2000 वोटों के बीच का था। इनमें से 7 सीटें बीजेपी ने, 4 सीटें सपा ने, 2 सीटें अपना दल (सोनेलाल) ने जीतीं और एक सीट पर कांग्रेस के विरेंद्र चौधरी को जीत मिली। यहां पर बीजेपी गठबंधन को 9 सीटें मिलीं और सपा को सिर्फ 4 सीटें। एक सीट दोनों गठबंधनों से अलग कांग्रेस पार्टी के खाते में गई।
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2000 से 3000 वोट का अंतर: ऐसी कुल 8 सीटें थीं। इनमें से 5 सीटों पर समाजवादी पार्टी और 3 सीटों पर बीजेपी को जीत मिली थी।
3000 से 4000 वोट का अंतर: 3 से 4 वोटों के अंतर वाली कुल सीटें 7 थीं। इसमें से सपा को 4, बीजेपी को दो और अपना दल (S) को एक सीट पर जीत मिली। यानी बीजेपी के गठबंधन को 3 और सपा को 4 सीटें मिलीं।
4000 से 5000 वोट का अंतर: ऐसी कुल 9 सीटें थीं जिन पर हार-जीत का अंतर 4 से 5 हजार वोटों का ही था। इनमें से 7 सीटें बीजेपी के खाते में गईं और सपा सिर्फ 2 ही सीटें जीत पाईं।
अब अगर इन 55 सीटों का हिसाब देखें तो बीजेपी और उसके सहयोगियों को कुल 33 सीटें मिलीं। 19 सीटों पर समाजवादी पार्टी को जीत मिली और एक सीट पर कांग्रेस पार्टी जीत पाई। यह दिखाता है कि बीजेपी ने कम अंतर वाली सीटें जीतकर खुद को मजबूत स्थिति में रखा। वहीं, अगर सपा इन 19 सीटों पर भी हार जाती तो उसकी स्थिति और भी खराब हो सकती थी। यही वजह है कि दोनों और से इस बार इन सीटों पर खास जोर दिया है। चर्चा है कि दोनों ओर से ऐसे नेताओं का टिकट कट सकता है जो बमुश्किल ही जीत पाए थे।

कितनी सीटों पर होगा रोमांचक मुकाबला?
अगर इसी आंकड़े का दायरा थोड़ा और बढ़ाएं तो पता चलता है कि 5000 से कम अंतर वाली 53 सीटों के अलावा 71 सीटें ऐसी हैं जिन पर जीत हार का अंतर 5 से 10 हजार के बीच का है। वहीं 46 सीटें ऐसी हैं जिन पर जीत और हार का अंतर 10 से 15 हजार वोटों के बीच है। इस तरह कुल 170 सीटें होती हैं जिनके नतीजे बहुत कम अंतर से तय हुए थे।
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अब अगर इसी को पार्टी के हिसाब से देखें तो 170 में 86 सीटें बीजेपी ने ही जीतीं। सपा ने ऐसी 64 सीटों पर जीत हासिल की। वहीं, बीजेपी की सहयोगी रहे दलों ने 10 सीटें जीतीं तो सपा के साथ रहे दलों ने 8 सीटें जीतीं। ये आंकड़े दिखाते हैं कि लगभग 100 सीटों पर सत्ताधारी गठबंधन को बहुत कम अंतर से जीत मिली। अगर इन सीटों पर विपक्ष जीतता तो सरकार बदल भी सकती थी।