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मोदी के बाद शाह-नवीन की जोड़ी मैदान में, पूर्वांचल में 2027 का चक्रव्यूह तैयार

बीजेपी ने पूर्वांचल को साधने की मुहिम तेज कर दी है। नितिन नवीन की आजमगढ़ में चुनावी रैली और 30 अक्टूबर को गृहमंत्री अमित शाह की लखनऊ में बड़ी बैठक से सियासी हलचल तेज हो गई है।

नितिन नवीन, अमित शाह और बीएल संतोष। Photo Credit: BJP

नितिन नवीन, अमित शाह और बीएल संतोष। Photo Credit: BJP

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उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर बीजेपी ने पूर्वांचल में सियासी बिसात बिछानी शुरू कर दी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी , केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के कार्यक्रमों को संगठन की चुनावी तैयारी से जोड़कर देखा जा रहा है। पूर्वांचल में जातीय समीकरणों, संगठन की मजबूती और विपक्षी दलों के प्रभाव को ध्यान में रखते हुए बीजेपी अपनी रणनीति को धार देने में जुटी है। वाराणसी से लेकर आजमगढ़ तक होने वाले कार्यक्रमों के जरिए पार्टी कार्यकर्ताओं में जोश भरने और चुनावी माहौल अपने पक्ष में बनाने की कोशिश करेगी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रविवार को अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी में एक कार्यक्रम में हिस्सा लिया। यहां एक कपड़ा मिल की आधारशिला रखी। इसके बाद 27 अक्टूबर को बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन आजमगढ़ पहुंचेंगे। वहां वह पार्टी के सहयोगी दल सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर के मंच पर नजर आएंगे।

कार्यक्रम को पूर्वांचल में सहयोगी दलों के बीच तालमेल मजबूत करने की कवायद के तौर पर देखा जा रहा है। वहीं, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह 30 अक्टूबर को लखनऊ में रहेंगे। इस दौरान वह प्रदेश और राष्ट्रीय पदाधिकारियों, केंद्र व राज्य सरकार के मंत्रियों, क्षेत्रीय और जिला इकाइयों के पदाधिकारियों के साथ बैठक करेंगे। संगठनात्मक स्तर पर होने वाली इन बैठकों में चुनावी तैयारियों, कार्यकर्ताओं की सक्रियता और विपक्ष के मुकाबले पार्टी की रणनीति पर चर्चा होने की संभावना है।

पूर्वांचल की सीटों पर क्यों है बीजेपी की नजर?

पूर्वांचल उत्तर प्रदेश की राजनीति का अहम केंद्र है। यहां जातीय समीकरण, स्थानीय नेतृत्व, छोटे दलों का प्रभाव और सामाजिक गठजोड़ चुनावी नतीजों को प्रभावित करते हैं। वाराणसी में प्रधानमंत्री मोदी का कार्यक्रम और आजमगढ़ में नितिन नवीन की मौजूदगी को पार्टी की इसी व्यापक रणनीति के हिस्से के रूप में देखा जा रहा है।

 

आजमगढ़ में सुभासपा के मंच पर बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष की मौजूदगी सहयोगी दलों के बीच राजनीतिक तालमेल का संदेश दे सकती है। 

 

पूर्वांचल में राजभर समाज सहित विभिन्न पिछड़े वर्गों के मतदाताओं तक पहुंच बनाना बीजेपी के लिए अहम माना जाता है। पार्टी का जोर केवल बड़े नेताओं की सभाओं तक सीमित रहने के बजाय संगठन के स्थानीय ढांचे को सक्रिय करने पर भी रहेगा।

 

यह भी पढ़ें: प्रदेश कार्यकारिणी अधूरी, विधान परिषद के चुनाव में उतरी BJP, चेहरे कौन हैं?

 सहयोगी दलों को साथ रखने की कोशिश

आजमगढ़ लंबे समय से समाजवादी पार्टी के प्रभाव वाले क्षेत्रों में गिना जाता रहा है। ऐसे में यहां बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष का कार्यक्रम राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। पार्टी की कोशिश होगी कि सहयोगी दलों के साथ समन्वय बनाकर मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत की जाए।सुभासपा प्रमुख ओम प्रकाश राजभर की पूर्वांचल में राजनीतिक मौजूदगी को देखते हुए यह कार्यक्रम सामाजिक समीकरणों के लिहाज से भी अहम हो सकता है। बीजेपी के लिए चुनौती यह होगी कि सहयोगी दलों के समर्थन को स्थानीय स्तर पर वोटों में बदलने के साथ-साथ अपने कार्यकर्ताओं को भी पूरी तरह सक्रिय रखा जाए।

2017 और 2022 के नतीजों से बीजेपी को मिली चुनौती

आजमगढ़ का चुनावी इतिहास बीजेपी के लिए चुनौतीपूर्ण रहा है। वर्ष 2017 में जब प्रदेश में बीजेपी की प्रचंड लहर थी, तब भी आजमगढ़ की 10 विधानसभा सीटों में पार्टी को केवल एक सीट पर जीत मिली थी। 2022 के विधानसभा चुनाव में तो बीजेपी यहां किसी भी सीट पर जीत दर्ज नहीं कर सकी। ऐसे में आजमगढ़ में नितिन नवीन का कार्यक्रम महज संगठनात्मक गतिविधि नहीं, बल्कि आगामी विधानसभा चुनाव के लिए राजनीतिक जमीन तैयार करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।

 

दूसरी ओर, वाराणसी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संसदीय क्षेत्र है। यहां से विकास योजनाओं और संगठनात्मक गतिविधियों के जरिए पूर्वांचल में राजनीतिक संदेश देने की रणनीति पर काम हो सकता है। बीजेपी की कोशिश वाराणसी में अपनी पकड़ मजबूत बनाए रखने के साथ आजमगढ़ जैसे क्षेत्रों में भी राजनीतिक विस्तार करने की होगी।

पीडीए फॉर्मूले के बाद ओबीसी वोटों पर बीजेपी का फोकस

2024 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक समीकरण ने विपक्ष को मजबूती दी। इसके बाद बीजेपी के सामने पिछड़े वर्गों के मतदाताओं को अपने साथ बनाए रखने की चुनौती बढ़ी है। पूर्वांचल में राजभर, निषाद और अन्य पिछड़े वर्गों के मतदाताओं की भूमिका कई सीटों पर निर्णायक हो सकती है।

 

एनडीए के सहयोगी दल निषाद पार्टी की ओर से सामने आए असंतोष के संकेत भी गठबंधन के लिए चुनौती माने जा रहे हैं। ऐसे में सुभासपा के मंच पर बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष की मौजूदगी सहयोगी दलों के साथ तालमेल का संदेश देने के लिहाज से महत्वपूर्ण हो सकती है।

 

अमित शाह की बैठक में बनेगी चुनावी रणनीति की रूपरेखा

30 अक्टूबर को लखनऊ में अमित शाह की मौजूदगी में होने वाली बैठकों को बीजेपी की चुनावी तैयारी के लिहाज से अहम माना जा रहा है। इसमें संगठन के पदाधिकारियों, मंत्रियों और क्षेत्रीय नेतृत्व के साथ चुनावी रणनीति पर चर्चा हो सकती है। पार्टी के सामने सरकार के कामकाज को जनता तक पहुंचाने, बूथ स्तर पर संगठन मजबूत करने और स्थानीय असंतोष को दूर करने जैसी चुनौतियां रहेंगी। विधायकों के खिलाफ संभावित नाराजगी और टिकट बंटवारे को लेकर उठने वाले सवाल भी पार्टी के लिए महत्वपूर्ण होंगे। ऐसे में संगठनात्मक बैठकों के जरिए चुनाव से पहले कमियों की पहचान और कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने पर जोर दिया जा सकता है।

 

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2027 से पहले पूर्वांचल में शक्ति प्रदर्शन की तैयारी

उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी के बड़े नेताओं के कार्यक्रमों को चुनावी तैयारी के क्रम में देखा जा रहा है। वाराणसी में मोदी, आजमगढ़ में नितिन नवीन और लखनऊ में अमित शाह की गतिविधियां पार्टी के लिए अलग-अलग राजनीतिक संदेश देने का अवसर बन सकती हैं। बीजेपी की चुनौती पूर्वांचल में अपने पुराने प्रदर्शन को बनाए रखने के साथ उन सीटों पर भी वापसी करने की होगी, जहां विपक्ष मजबूत रहा है। 

 

समाजवादी पार्टी और उसके सहयोगियों के सामने अपने पीडीए समीकरण को बरकरार रखने की चुनौती होगी।आने वाले दिनों में बीजेपी की रणनीति किस तरह आकार लेती है, इसका असर पूर्वांचल की चुनावी राजनीति पर पड़ सकता है। फिलहाल बड़े नेताओं के कार्यक्रमों, सहयोगी दलों के साथ तालमेल और ओबीसी मतदाताओं को साधने की कोशिशों ने 2027 की सियासी तैयारी को तेज कर दिया है।

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