सपा के थप्पड़ कांड से BJP की बढ़ी टेंशन, पूर्वाचंल में निषाद-ठाकुर आमने-सामने
गोरखपुर में समाजवादी पार्टी के थप्पड़ कांड के बाद से पूर्वाचंल में निषाद बनाम ठाकुर समाज की जातीय राजनीति से हड़कंप मचा हुआ है।

योगी आदित्यनाथ और नितिन नवीन, Photo Credit: PTI
उत्तर प्रदेश के जिला गोरखपुर में समाजवादी पार्टी (सपा) के कार्यक्रम में हुआ थप्पड़ कांड अब जातीय और सियासी विवाद का रूप लेता जा रहा है। पूर्व सपा जिलाध्यक्ष नगीना प्रसाद साहनी और सपा नेता अंशुमान सिंह के परिवार के बीच शुरू हुआ विवाद अब निषाद और ठाकुर समाज के बीच खींचतान तक पहुंच गया है। एक तरफ निषाद समाज के नेता नगीना प्रसाद साहनी के समर्थन में उतर आए हैं, दूसरी तरफ ठाकुर समाज के लोगों ने अंशुमान सिंह के समर्थन में बैठकें शुरू कर दी हैं। 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले पूर्वांचल में दोनों समुदायों के बीच बढ़ती तल्खी बीजेपी के लिए भी चुनौती बन सकती है, क्योंकि पार्टी की चुनावी रणनीति में दोनों समाजों की अहम भूमिका रही है।
गोरखपुर के जर्नलिस्ट्स प्रेस क्लब में 3 अक्टूबर 2026 को सपा के कार्यक्रम के दौरान बैठने के लिए कुर्सी को लेकर विवाद हुआ था। आरोप है कि सपा के पूर्व जिलाध्यक्ष नगीना प्रसाद साहनी को अंशुमान सिंह के बेटे कमलेश सिंह ने थप्पड़ मार दिया। घटना का वीडियो भी सामने आया, जिसके बाद मामला लगातार तूल पकड़ता गया। विवाद बढ़ने पर सपा अध्यक्ष
अखिलेश यादव
ने अंशुमान सिंह को पार्टी से निष्कासित कर दिया। इसके साथ ही गोरखपुर की जिला और महानगर इकाइयों को भी भंग कर दिया गया। पार्टी की कार्रवाई के बावजूद मामला शांत नहीं हुआ और दोनों पक्षों के समर्थन में अलग-अलग सामाजिक समूह लामबंद होने लगे।
संजय निषाद के बयान के बाद आमने-सामने आए दोनों पक्ष
निषाद पार्टी के अध्यक्ष और योगी सरकार में कैबिनेट मंत्री डॉ. संजय निषाद ने नगीना प्रसाद साहनी के समर्थन में आवाज उठाई। उन्होंने इस घटना को निषाद समाज के सम्मान से जोड़ते हुए सपा नेतृत्व से कार्रवाई की मांग की। संजय निषाद ने चेतावनी दी कि कार्रवाई नहीं होने पर सपा कार्यालय का घेराव किया जाएगा। उनके बयान के बाद अंशुमान सिंह के समर्थन में ठाकुर समाज के लोगों की बैठकें शुरू हो गईं। गोरखपुर के बांसगांव में भी इस मुद्दे पर विरोध देखने को मिला। दोनों तरफ से तीखी बयानबाजी ने विवाद को और बढ़ा दिया। अब यह मामला केवल दो नेताओं के बीच का विवाद नहीं रह गया है, बल्कि इसके व्यापक राजनीतिक असर को लेकर भी चर्चा होने लगी है।
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निषाद समाज की महापंचायत से बढ़ी सियासी गर्मी
विवाद के बीच सपा नेता और सुल्तानपुर के सांसद रामभुआल निषाद ने गोरखपुर के रुस्तमपुर स्थित निषादराज मंदिर परिसर में निषाद समाज की महापंचायत बुलाई। इसमें पूर्वांचल के कई जिलों से लोग शामिल हुए। महापंचायत में रामभुआल निषाद ने कहा कि नगीना प्रसाद साहनी को थप्पड़ मारने वाले व्यक्ति के समाज का कोई प्रत्याशी किसी भी पार्टी से चुनाव लड़ता है तो निषाद समाज उसका समर्थन नहीं करेगा। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसा प्रत्याशी सपा से भी चुनाव मैदान में उतरता है, तब भी उसे वोट नहीं दिया जाएगा। इस बयान से साफ है कि विवाद को समाज के सम्मान और राजनीतिक समर्थन से जोड़कर देखा जाने लगा है।
BJP के लिए क्यों बढ़ सकती हैं मुश्किलें?
पूर्वांचल की राजनीति में ठाकुर और निषाद, दोनों समुदायों की अहम भूमिका रही है। बीजेपी ने गैर-यादव पिछड़ी जातियों को अपने साथ जोड़ने की रणनीति के तहत निषाद पार्टी के साथ गठबंधन किया। दूसरी ओर, ठाकुर समाज भी लंबे समय से पार्टी के प्रमुख समर्थक वर्गों में गिना जाता रहा है। ऐसे में दोनों समुदायों के बीच तनाव बढ़ने पर बीजेपी के सामने संतुलन बनाए रखने की चुनौती खड़ी हो सकती है।
अगर विवाद चुनाव तक बना रहता है और दोनों समाजों के बीच राजनीतिक गोलबंदी तेज होती है तो इसका असर उम्मीदवारों के चयन से लेकर मतदान के समीकरण तक पड़ सकता है। पूर्वांचल के गोरखपुर, संतकबीरनगर, बस्ती, देवरिया, कुशीनगर, मऊ, बलिया, गाजीपुर, जौनपुर और वाराणसी जैसे जिलों में निषाद समाज की मौजूदगी चुनावी नतीजों को प्रभावित कर सकती है। वहीं, ठाकुर समाज का प्रभाव भी कई विधानसभा क्षेत्रों में महत्वपूर्ण माना जाता है। ऐसे में किसी एक समुदाय की नाराजगी दूसरे समुदाय को एकजुट कर सकती है।
2018 के उपचुनाव ने दिखाया था निषाद वोट का महत्व
गोरखपुर की राजनीति में निषाद समाज के वोटों की अहमियत पहले भी सामने आ चुकी है। 2018 के लोकसभा उपचुनाव में बीजेपी को गोरखपुर सीट पर हार का सामना करना पड़ा था। उस चुनाव में सपा के टिकट पर प्रवीण कुमार निषाद ने जीत दर्ज की थी। निषाद समाज के समर्थन को इस नतीजे का एक महत्वपूर्ण पहलू माना गया था। बीजेपी ने बाद के चुनावों में निषाद पार्टी के साथ गठबंधन के जरिए इस सामाजिक समीकरण को मजबूत करने की कोशिश की। 2019 और 2024 के लोकसभा चुनावों में भी यह गठजोड़ उसकी रणनीति का अहम हिस्सा रहा। ऐसे में मौजूदा विवाद के कारण निषाद समाज के किसी वर्ग में नाराजगी बढ़ती है, तो बीजेपी के लिए उसे नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा।
सपा के सामने भी निषाद समाज को साधने की चुनौती
इस पूरे विवाद में सपा की मुश्किलें भी कम नहीं हैं। घटना पार्टी के ही कार्यक्रम में हुई, जिससे संगठनात्मक अनुशासन पर सवाल उठे। पार्टी ने अंशुमान सिंह के खिलाफ कार्रवाई कर नुकसान को सीमित करने की कोशिश की, लेकिन इसके बावजूद निषाद समाज में नाराजगी दूर करना उसके लिए अहम होगा।दूसरी तरफ, निषाद पार्टी और बीजेपी इस मुद्दे को राजनीतिक रूप से भुनाने की कोशिश कर सकती हैं। ऐसे में सपा के सामने अपने पुराने सामाजिक समर्थन को बनाए रखने और निषाद समाज को भरोसा दिलाने की चुनौती होगी।
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2027 से पहले जातीय समीकरणों की परीक्षा
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले गोरखपुर का थप्पड़ कांड एक स्थानीय विवाद से आगे बढ़कर राजनीतिक समीकरणों की परीक्षा बनता दिखाई दे रहा है। बीजेपी के लिए चुनौती यह है कि वह ठाकुर और निषाद, दोनों समुदायों को साथ लेकर कैसे चलती है। सपा को भी यह देखना होगा कि पार्टी के भीतर हुई घटना का असर उसके सामाजिक आधार पर कितना पड़ता है। फिलहाल इस विवाद का चुनावी असर कितना होगा, यह आने वाले समय में दोनों समुदायों के रुख, राजनीतिक दलों की रणनीति और नेतृत्व की पहल पर निर्भर करेगा। इतना तय है कि पूर्वांचल में निषाद और ठाकुर समाज के बीच बढ़ती तल्खी ने 2027 के चुनाव से पहले सियासी हलचल तेज कर दी है।
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