देश में महिलाओं को राजनीतिक रूप से सशक्त बनाने और विधानसभाओं व संसद में आरक्षण लागू करने की कवायद तेज हो रही है लेकिन उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले का चुनावी इतिहास बताता है कि
राजनीतिक प्रतिनिधित्व के मामले में महिलाओं की राह आज भी आसान नहीं है। जिले की चार विधानसभा सीटों के सात दशक लंबे चुनावी इतिहास में अब तक केवल एक महिला विधायक ही विधानसभा पहुंच सकी हैं।
सोनभद्र जिले की विधानसभा वाली राजनीति पर नजर डालें तो वर्ष 1952 से लेकर 2022 तक हुए चुनावों में पुरुष उम्मीदवारों का ही दबदबा रहा है। इस लंबे राजनीतिक सफर में साल 2012 का चुनाव एक ऐतिहासिक अपवाद साबित हुआ, जब दुद्धी विधानसभा सीट से रूबी प्रसाद ने जीत दर्ज कर जिले की पहली महिला विधायक बनने का गौरव हासिल किया।
रूबी प्रसाद की जीत को उस समय महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी के लिए एक नई शुरुआत माना गया था। उम्मीद जताई गई थी कि भविष्य में अधिक महिलाएं विधानसभा चुनावों में न केवल भाग लेंगी बल्कि जीतकर नेतृत्व भी करेंगी। हालांकि, यह उम्मीद आगे चलकर हकीकत में नहीं बदल सकी।
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2022 में फिर पुरुष उम्मीदवारों का रहा दबदबा
वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में सोनभद्र जिले की चारों सीटों पर पुरुष उम्मीदवार ही विजयी रहे। इससे साफ है कि जिले की राजनीति में महिलाओं की हिस्सेदारी अब भी बेहद सीमित बनी हुई है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि महिलाओं को चुनावी मैदान में पर्याप्त अवसर नहीं मिल पाते। कई बार उन्हें टिकट ही नहीं दिया जाता और यदि टिकट मिलता भी है तो जीतने योग्य सीटों पर मौका कम ही मिलता है।
सोनभद्र आदिवासी, ग्रामीण और सामाजिक विविधताओं वाला जिला है। यहां पंचायत और स्थानीय निकाय चुनावों में महिलाओं की भागीदारी लगातार बढ़ी है। आरक्षण व्यवस्था के चलते बड़ी संख्या में महिलाएं ग्राम प्रधान, क्षेत्र पंचायत सदस्य और जिला पंचायत सदस्य के रूप में चुनी गई हैं।इसके बावजूद विधानसभा जैसे बड़े राजनीतिक मंच पर महिलाओं की उपस्थिति लगभग नगण्य बनी हुई है। स्थानीय निकायों में बढ़ती भागीदारी का प्रभाव अभी तक विधानसभा चुनावों में दिखाई नहीं पड़ा है।
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टिकट वितरण पर उठ रहे सवाल
राजनीतिक दल सार्वजनिक मंचों से महिला सशक्तिकरण और बराबरी की बात तो करते हैं लेकिन टिकट वितरण के समय तस्वीर अक्सर अलग नजर आती है। महिलाओं को चुनाव लड़ाने और उन्हें मजबूत सीटों पर उतारने को लेकर राजनीतिक दलों की प्रतिबद्धता पर लगातार सवाल उठते रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक राजनीतिक दल महिलाओं को संगठन और चुनाव दोनों स्तर पर पर्याप्त अवसर नहीं देंगे, तब तक राजनीतिक प्रतिनिधित्व में वास्तविक संतुलन स्थापित नहीं हो सकेगा।
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आधी आबादी की राजनीतिक हिस्सेदारी का बड़ा सवाल
सोनभद्र का चुनावी इतिहास केवल आंकड़ों की कहानी नहीं है, बल्कि यह आधी आबादी की राजनीतिक भागीदारी से जुड़ा महत्वपूर्ण प्रश्न भी है। सवाल यह है कि क्या महिलाएं केवल वोटर बनकर रह जाएंगी या फिर निर्णय लेने वाले मंचों तक भी उनकी बराबर पहुंच सुनिश्चित की जाएगी।
देश में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत राजनीतिक आरक्षण लागू करने की दिशा में पहल तेज हो रही है। ऐसे समय में सोनभद्र जैसे जिलों के लिए यह अवसर भी है और चुनौती भी। यदि राजनीतिक दल और समाज मिलकर महिलाओं को नेतृत्व की मुख्यधारा में लाने का प्रयास करते हैं, तो आने वाले वर्षों में जिले की राजनीति का चेहरा बदल सकता है। फिलहाल आंकड़े यही बताते हैं कि 70 वर्षों के चुनावी इतिहास में चार विधानसभा सीटों वाले सोनभद्र ने केवल एक महिला विधायक को विधानसभा भेजा है। ऐसे में समान राजनीतिक प्रतिनिधित्व की बहस जिले में पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो गई है।