'मैं खुलेआम कह रहा हूं, छिपा नहीं रहा हूं। मैं कह रहा हूं कि मियां को परेशान करो। जितना परेशान कर पाओ करो, रिक्शे का किराया 5 रुपये है तो 4 ही दो। ये परेशान होंगे तभी असम छोड़ेंगे। जहां हो सके शिकायत करो। इससे वे थोड़ा भागदौड़ करेंगे और परेशान होंगे तो समझ आएगा कि असम के लोग अभी जिंदा हैं।'
ये शब्द असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा के हैं और उनके निशान पर हैं असम में रह रहे मियां मुसलमान। चुनावी साल में हिमंत बिस्व सरमा स्पष्ट रूप से कह रहे हैं कि वह और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) स्पष्ट तौर पर मियां मुसमलान के खिलाफ हैं। वह यह भी कह रहे हैं कि स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के बाद 4 से 5 लाख मियां मुसलमानों के नाम वोटर लिस्ट से हटा दिए जाएंगे। कुल मिलाकर यह स्पष्ट है कि असम के मुख्यमंत्री के निशाने पर राज्य के मुसलमान हैं। आखिर इसकी वजह क्या है? आइए समझते हैं...
सिर्फ हिमंत ही मियां मुस्लिमों का मुद्दा नहीं उठा रहे हैं। हाल ही में कांग्रेस की स्टूडेंट विंग NSUI के नेता मोहसिन खान ने मांग कर डाली थी कि असम की विधानसभा में 48 सीटें मियां मुस्लिमों के लिए आरक्षित कर दी जानी चाहिए। उनकी इस मांग पर बीजेपी ने भी पलटवार किया और कहा कि कांग्रेस पार्टी मुस्लिम लीग की संतान बन गई है। यानी मियां मुस्लिम वाली आग दोनों तरफ लगी हुई है।
कौन हैं मियां मुसलमान?
असम को समझें तो राज्य की आबादी में लगभग 35 से 40 प्रतिशत आबादी मुस्लिमों की है। इसमें कुछ लोग ऐसे हैं तो बांग्ला भाषा बोलते हैं। इन लोगों के पूर्वज कई दशक पहले पूर्वी बंगाल (अब बांग्लादेश) से आकर असम में बसे थे। पहले ब्रिटिश काल में ये लोग आए फिर जब बांग्लादेश बना और जमकर हिंसा मची तब भी बहुत सारे लोग आकर असम में बस गए। इन्हीं लोगों को मियां मुसलमान कहा जाता है। यानी इन्हें स्थानीय मुस्लिमों से अलग देखा जाता है और बीजेपी के नेता इन्हीं को बाहरी और घुसपैठिया बता देते हैं।
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एक समय पर इन लोगों को असम में खेती का उत्पादन बढ़ाने के लिए लाया गया था। अंग्रेजों की सलाह पर लाए गए इन लोगों को ऐसे इलाकों में बसाया गया जहां खेती बड़े स्तर पर हो सकती थी या की जाती थी। साल 1971 में जब भारत पाकिस्तान का युद्ध हुआ और बांग्लादेश नया देश बना तब भी बड़ी संख्या में लोग बांग्लादेश से आए और असम में बस गए।
मियां मुसलमान मुख्यतौर पर असम के निचले जिलों जैसे कि बरपेटा, गोलपाड़ा और धुबरी में बसे हुए हैं। लगभग 30 विधानसभा सीटों पर इन मियां मुसलमानों का प्रभाव है। इन विधानसभा सीटों में ये लोग ज्यादातर ऐसे इलाकों में रहते हैं जो ब्रह्मपुत्र नदी के कटाव और उसकी बाढ़ से प्रभावित होते हैं। नदी के आसपास के इलाकों में बने छोटे-छोटे टापुओं वाले इन इलाकों को चोर-चापोरी कहा जाता है।
अब बांग्लादेश से आए ये लोग वहां के अलग-अलग क्षेत्रों से आए हैं। कई तो ऐसे हैं जो अलग-अलग बोलियां बोलते हैं। मतलब एक की बांग्ला दूसरे से अलग होती है। हालांकि, असम के लोग इन्हें मियां ही कहते हैं।
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हिमंत की चिंता क्या है?
हिमंत बिस्व सरमा अक्सर इन मियां मुसलमानों की आबादी तेजी से बढ़ने का दावा करते हैं। वह बार-बार कहते हैं कि अगर इसी रफ्तार से मियां मुसलमानों की आबादी बढ़ी तो साल 2041 तक असम में हिंदुओं और मुसमलानों की आबादी बराबर हो जाएगी। असम में असमिया बनाम दूसरी भाषाओं की जंग भी पुरानी है। हिंदू हो या मुस्लिम असम में बहुत सारे लोग बांग्ला बोलने वालों को बाहरी मानते हैं। कई बार इसको लेकर संघर्ष भी हो चुके हैं।
अब हिमंत बिस्व सरमा 2026 के विधानसभा चुनवा से पहले इसी 'मूल निवासी' की भावना को अपने पक्ष में एकजुट करना चाहते हैं। वह तो इतना तक कह चुके हैं कि वह मुस्लिम बहुल सीटों पर वोट भी नहीं मांगेंगे। हालांकि, वह असम के मूल निवासी मुस्लिमों को अपने पक्ष में करने के लिए मशक्कत करते भी दिखते हैं। यही वजह है कि जब वह मियां मुस्लिमों को आड़े हाथ लेते हैं तो भीतरी बनाम बाहरी का जिक्र जरूर करते हैं।
मूल निवासी मुस्लिम और बीजेपी
असम के मूल निवासी मुस्लिम मुख्य रूप से 5 कैटगरी में बंटे हुए हैं। ये हैं गोरिया, मोरिया, देशी, जुलहा और सैयद। कुल 1.18 करोड़ मुस्लिमों में 42 लाख मूल निवासी ही हैं, यानी लगभग एक तिहाई से ज्यादा। इनमें सबसे बड़ा ग्रुप गोरिया का है जिनकी संख्या 20 से 22 लाख है। वहीं, मोरिया लोग कुशल कारीगर हैं और जुलहा लोग बुनाई का काम करते हैं।
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बीजेपी की निगाहें इस वोटबैंक पर भी है। ये लोग खुद तो किसी भी सीट पर निर्णायक भूमिका में नहीं हैं लेकिन मूलनिवासी बनाम बाहरी में बीजेपी को उम्मीद है कि ये उसके साथ हो सकते हैं।