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जरूरी या मजबूरी, गोवा में गठबंधन करने को क्यों मजबूर हो गई केजरीवाल की AAP?

गोवा में विधानसभा के चुनाव से पहले AAP और गोवा फॉरवर्ड पार्टी का गठबंधन हो गया है। इसे AAP और अरविंद केजरीवाल की खास रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है। 

vijay sardesari and arvind kejriwal

विजय सरदेसाई के साथ अरविंद केजरीवाल, Photo Credit: Social Media

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गोवा में दो विधायकों वाली आम आदमी पार्टी (AAP) को लगातार झटके लगते रहे हैं। इसी साल जनवरी के महीने में अमित पालेकर को अध्यक्ष पद से हटाए जाने के बाद उन्होंने पार्टी ही छोड़ दी थी। उनके साथ कई अहम नेता भी पार्टी से अलग हो चुके हैं। AAP की समस्या यह हुई है कि जो नेता पार्टी छोड़कर गए वे काफी मुखर थे और गोवा में पार्टी का चेहरा थे। ऐसे में अब AAP के पास तुरंत कोई ऐसा चेहरा नहीं है जो उसकी मदद कर सके। वहीं, लगातार संघर्ष कर रही गोवा फॉरवर्ड पार्टी भी कांग्रेस के ढुल-मुल रवैये से परेशान होकर नया साथी तलाशने में जुटी हुई थी। माना जा रहा है कि इस गठबंधन में कुछ और छोटे दल भी शामिल हो सकते हैं।

 

गोवा केंद्रित पार्टियों को साथ लाने के लिए ही इस गठबंधन का नाम 'गोवा फर्स्ट अलायंस' रखा गया है। इस मौके पर AAP के मुखिया अरविंद केजरीवाल ने कहा कि अभी तक लोगों के पास कांग्रेस या भारतीय जनता पार्टी (BJP) को छोड़कर कोई विकल्प नहीं था। उन्होंने इस मौके पर कहा कि जो लोग बीजेपी को हराना चाहते हैं और जो लोग कांग्रेस की चीटिंग से परेशान हैं, वे इस गठबंधन को वोट दे सकते हैं। केजरीवाल ने दावा किया कि इस बार गोवा फर्स्ट गठबंधन की सरकार बनेगी।  

पुराने नेताओं ने दिया झटका

AAP ने एक समय पर एल्विस गोम्स को पार्टी का सीएम कैंडिडेट और प्रदेश अध्यक्ष बनाया था। उन्होंने पहले तो पार्टी छोड़ी फिर कांग्रेस में शामिल हो गए। इसी तरह अमित पालेकर ने पहले तो AAP से इस्तीफा दिया फिर कांग्रेस में चले गए। इसी तरह राहुल म्हांब्रे और श्रीकृष्ण परब जैसे नेता भी गोवा में AAP का साथ छोड़ चुके हैं।

 

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2022 ने दे दी नसीहत?

2022 में आम आदमी पार्टी ने 40 में 39 सीट पर अपने उम्मीदवार उतारे थे। उसमें से सिर्फ 2 ही उम्मीदवारों को जीत मिली थी। हालांकि, उसका वोट प्रतिशत 6.77 प्रतिशत था जो कि कई पुरानी पार्टियों से भी ज्यादा था। उस साल गोवा फारवर्ड पार्टी सिर्फ 3 सीटों पर चुनाव लड़ी थी और एक पर ही उसे जीत मिली थी। कुल वोट प्रतिशत में उसकी हिस्सेदारी 1.84 प्रतिशत की ही थी। तब GFP का गठबंधन कांग्रेस के साथ था। कांग्रेस ने 37 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे लेकिन सिर्फ 11 पर ही उसे जीत मिली थी। इस तरह यह गठबंघन 12 सीटों पर ही रह गया था।

इन नतीजों ने दिखाया था कि गोवा में AAP अकेले उतनी बड़ी ताकत नहीं है। ऐसे में अब कई नेताओं के चले जाने के चलते AAP को महसूस हुआ है कि उसे पैर जमाने के लिए ऐसे मजबूत साथी की जरूरत है जो उसकी मदद कर सके। वहीं, GFP भी लगातार बड़े दलों के साथ जाकर बहुत कम सीटों पर लड़ पा रही है। यही वजह है कि कुछ महीनों पहले कांग्रेस से बातचीत कर रही GFP का गठबंधन अब AAP से हो गया है।

 

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क्या है गोवा फॉरवर्ड पार्टी का इतिहास?

साल 2016 में बनी इस पार्टी के पहले मुखिया भले ही प्रभाकर टिंबले बने हों लेकिन पार्टी के पीछे का दिमाग विजय सरदेसाई का ही थी। 2017 के विधानसभा चुनाव में जब यह पार्टी उतरी तो उसका कहना था कि यह पार्टी बीजेपी को छोड़कर किसी से भी गठबंधन कर सकती है। वजह थी कि यह पार्टी गोवा में बीजेपी के विरोध में ही बनी थी। हालांकि, बाद में विजय सरदेसाई बीजेपी की ही सरकार में मंत्री और डिप्टी सीएम तक बने। 

कौन हैं विजय सरदेसाई?

विजय सरदेसाई लगातार तीन बार से फत्रोदा विधानसभा सीट से चुनाव जीत रहे हैं। 2012 में वह निर्दलीय जीते थे लेकिन उसके बाद से लगातार दो बार गोवा फॉरवर्ड पार्टी के टिकट पर जीत रहे हैं। वह प्रमोद सावंत की ही सरकार में मार्च 2019 से जुलाई 2019 तक गोवा डिप्टी सीएम भी रहे थे। इससे पहले वह मनोहर पर्रिपर की सरकार में मार्च 2017 से जुलाई 2019 तक मंत्री भी रहे थे। विजय सरदेसाई ने अपने करियर की शुरुआत कांग्रेस से ही की थी। शुरुआती दिनों में वह गोवा प्रदेश यूथ कांग्रेस के अध्यक्ष भी रहे लेकिन 2012 में चुनाव निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर लड़े। 

गठबंधन की मजबूरी क्यों?

गठबंधन का एलान करते हुए अरविंद केजरीवाल ने कहा उसी में यह छिपा हुआ है कि यह गठबंधन क्यों बना। उन्होंने आरोप लगाए कि कांग्रेस के टिकट पर जीतने वाली विधायक भी बीजेपी में ही चले जाते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि वह ऐंटी-बीजेपी वोट को एकजुट करना चाहते हैं। 

 

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इसे आंकड़ों से समझिए। 2022 में बीजेपी को वोट मिले 33.31 प्रतिशत लेकिन उसे 20 सीटें मिलीं। वहीं, कांग्रेस को 23.46 प्रतिशत वोट के साथ 11 सीटें ही मिलीं। 26 सीटों पर उतरी TMC को एक भी सीट नहीं मिली लेकिन उसे 5.21 प्रतिशत वोट मिले। इसी तरह एनसीपी को 1.124 प्रतिशत, महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी को 7.6 प्रतिशत वोट के साथ 2 सीटें, GFP को 1.84 प्रतिशत वोट के साथ 1 सीट और AAP को 6.77 प्रतिशत वोट के साथ 6.77 प्रतिशत वोट मिले थे। रिवाल्यूशनरी गोअन पार्टी ने 1 सीट जीती थी लेकिन उसे 9.8 प्रतिशत वोट मिले थे।

 

अब अगर इन छोटे दलों का ही वोट प्रतिशत जोड़ें तो यह 32.33 प्रतिशत हो जाता है जो कांग्रेस से काफी ज्यादा और बीजेपी के लगभग करीब है। अब केजरीवाल की कोशिश यही है कि कांग्रेस को जितना ज्यादा नुकसान पहुंचाया जा सके, उतना ही फायदेमंद होगा।  

 

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