टीपू सुल्तान के 'गुनाह', जिन पर BJP, कांग्रेस और AIMIM में जुबानी जंग छिड़ी है?
महाराष्ट्र की सियासत में टीपू सुल्तान को लेकर AIMIM, कांग्रेस और BJP के नेता जुबानी जंग पर उतर आए हैं। टीपू सुल्तान को दक्षिणपंथी हिंदू संगठन पसंद नहीं करते हैं, ऐसा क्यों है, समझिए।

टीपू सुल्तान। AI इमेज। Photo Credit: Sora
महाराष्ट्र के मालेगांव में इस्लाम पार्टी की नेता और मेयर नसरीन शेख के दफ्तर में लगी एक तस्वीर पर महाराष्ट्र में एक बार फिर से टीपू सुल्तान पर बहस छिड़ गई है। मेयर नसरीन शेख के दफ्तर में उनकी चेयर के ठीक पीछे टीपू सुल्तान की एक तस्वीर लगी है। जैसे ही यह तस्वीर सामने आई, लोग सवाल उठाने लगे कि आखिर किस वजह से उन्होंने टीपू सुल्तान को जगह दी लेकिन छत्रपति शिवाजी, महात्मा गांधी,भीम राव अंबेडकर और शहीद भगत सिंह जैसे नेताओं की तस्वीर नहीं लगाई।
इस्लाम पार्टी और AIMIM के विरोधी दलों का कहना है कि यह इस्लामिक स्टेट वाला रवैया है। भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने इसे अस्वीकार्य बताया है। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से लेकर बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता शहजाद पूनावाला तक इस तस्वीर को लेकर अपना आक्रोश जाहिर कर चुके हैं। उन्होंने कहा कि सिर्फ इस्लामिक नायकों को ही नायक मानना कितना गलता है।
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आफताब पूनावाला, राष्ट्रीय प्रवक्ता, बीजेपी:-
यह दुर्भाग्य की बात है कि कुछ लोग ज़ुबान पर संविधान पर मन में शरिया की दुकान चलाते हैं। जैसे मालेगांव के डिप्टी मेयर, जो इस्लाम पार्टी से आते हैं और इस्लामिक स्टेट की मानसिकता से ग्रसित होकर उन्होंने सरकारी दफ्तर में टीपू सुल्तान की तस्वीर तो लगाई है, लेकिन छत्रपति शिवाजी महाराज, अंबेडकर जी, सरदार पटेल, महात्मा गांधी या राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की नहीं। इससे पता चलता है कि उनके आदर्श गजनी, घोरी, टीपू और हिंदुओं के खिलाफ नरसंहार करने वाले लोग हैं। उनके लिए शरिया पहले आता है, संविधान नहीं। इसीलिए संविधान निर्माता अंबेडकर जी की कोई तस्वीर नहीं लगाई

हंगामे की असली वजह क्या है?
महाराष्ट्र अध्यक्ष हर्षवर्धन सपकाल के बयान पर मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने लिखा, 'यह तुलना निंदनीय है। महाराष्ट्र इसे बर्दाश्त नहीं करेगा। सपकाल को छत्रपति शिवाजी महाराज की तुलना टीपू सुल्तान से करने के लिए माफी मांगनी चाहिए। कांग्रेस को इस मामले पर ध्यान देना चाहिए और उसके साथियों को सपकाल के बयान पर अपना स्टैंड साफ करना चाहिए।
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हर्षवर्धन सपकाल, महाराष्ट्र कांग्रेस अध्यक्ष:-
त्रपति शिवाजी महाराज की बहादुरी बेमिसाल है, जबकि टीपू सुल्तान स्वराज्य के प्रेमी थे। छत्रपति शिवाजी महाराज को आदर्श मानकर ही उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी। जब टीपू सुल्तान विदेशी शासकों से लड़ रहे थे, तब संघ-BJP की विचारधारा को मानने वाले लोग अंग्रेजों के गुलाम और जासूस थे। देवेंद्र फडणवीस को हमें इतिहास पढ़ाने का दिखावा नहीं करना चाहिए। महाराष्ट्र के लोग यह नहीं भूले हैं कि BJP-RSS, भगतसिंह कोश्यारी और दूसरों ने छत्रपति शिवाजी महाराज के खिलाफ क्या-क्या कहा और उनका अपमान किया।

टीपू सुल्तान हिंसा मामले में अब तक क्या हुआ?
टीपू सुल्तान की तस्वीर पर विवाद तब भड़का जब, डिप्टी मेयर निहाल अहमद के कार्यालय में भी टूपी सुल्तान की तस्वीर लगा दी गई। विवाद में कांग्रेस पार्टी के महाराष्ट्र अध्यक्ष हर्षवर्धन सपकाल कूद पड़े। उन्होंने टीपू सुल्तान की तुलना छत्रपति शिवाजी से कर दी। उनके बयान के बाद हिंसक झड़प हुई। पुणे पुलिस ने बीजेपी और कांग्रेस के पुणे यूनिट के अध्यक्ष और कार्यकर्ताओं के खिलाफ 2 अलग-अलग मामले दर्ज किए। रविवार को बीजेपी और कांग्रेस के धड़े भिड़ गए थे। 2 पुलिसकर्मी, 2 पत्रकार और 9 आम लोग घायल हुए थे। पुणे पुलिस ने बीजेपी के पुणे यूनिट के अध्यक्ष धीरज घाटे, कांग्रेस के युवा प्रकोष्ठ अध्यक्ष दुष्यंत माहौल और अन्य 60 कार्यर्ताओं के खिलाफ केस किया है।
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बीजपी नेताओं को टीपू सुल्तान से दिक्कत क्यों हैं?
कर्नाटक का एक बड़ा वर्ग टीपू सुल्तान को नायक मानता है। टीपू सुल्तान मैसूर शासक थे जिन्होंने अंग्रेजों के दांत खट्टे कर दिए थे। इतिहास में उनकी गिनती वीर शासक के तौर पर होती है, जिन्होंने अपने साम्राज्य की रक्षा के लिए अंग्रेजों से लोगा लिया। टीपू सुल्तान ने अंग्रेजों के खिलाफ रॉकेट और मिसाइल जैसे हथियारों का इस्तेमाल किया था। उनसे पहले किसी भी भारतीय शासक ने इस तरह के हथियारों का इस्तेमाल नहीं किया था। टीपू सुल्तान पर कोडागु में हिंदू बस्तियों के नरसंहार के आरोप लगे हैं। टीपू सुल्तान, स्कूली किताबों में भी क्रांतिकारी की तरह चित्रित किए गए हैं लेकिन बीजेपी उन्हें क्रांतिकारी नहीं, हिंदओं का दमन करने वाला शासक मानती है। उन्होंने अंग्रेजों से लड़ने के लिए नेपोलियन बोनोपार्ट के साथ भी गठबंधन की कवायद की थी।
टीपू सुल्तान के कथित ऐतिहासिक पत्रों का जिक्र करते हुए बीजेपी यह दावा करती है कि उन्होंने 4 लाख से ज्यादा हिंदुओं का धर्म परिवर्तन कराया था। उन्होंने जब केरल के मालाबार इलाके में हिंदुओं को बंदी बनाया था तो उन्हें इस्लाम में आने के लिए बाध्य किया था। मराठा और टीपू सुल्तान के बीच क्षेत्राधिकार को लेकर लड़ाइयां हुईं हैं। 1785-1787 के दौरान मैसूर-मराठा युद्ध भी हुआ था। इतिहासकारों का एक धड़ा कहता है कि टीपू सुल्तान ने मराठाओं के आक्रमण से शृंगेरी मठ को बचाया था, रंगनाथ स्वामी मंदिर को बचा लिया था। बीजेपी नेताओं का कहना है कि वह धर्मांतरण में लिप्त थे, हिंदुओं का धर्म परिवर्तन कराते थे।
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टीपू सुल्तान हिंदू संगठनों की नजर में विलेन क्यों?
टीपू सुल्तान को कर्नाटक में 'मैसूर के शेर' के नाम से पुकारा जाता है। उनकी बहादुरी की मिसालें दी जाती हैं। कुछ ऐतिहासिक संदर्भों में इस बात का जिक्र मिलता है कि उन्होंने मालाबार, कोडागू और कुर्ग इलाकों में बड़ी संख्या में लोगों का धर्मांतरण कराया था। ऐसे आरोप लगते हैं कि मालाबार विजय के दौरान टीपू ने हजारों नायर हिंदुओं और ईसाइयों का जबरन धर्मांतरण कराया था। कूर्ग क विद्रोह को कुचलने के लिए टीपू ने धर्मांतरण कराया था। हजारों लोगों को अहमदी सेना में शामल किया गया था। टीपू सुल्तान ने शक के आधार पर मंगलौर के कैथोलिक ईसाई को मुस्लिम बनाया था। टीपू सुल्तान ने अपने जनरलों और अधिकारियों कुछ चिट्ठियां लिखीं थीं। सैयद अब्दुल गफ्फार को एक खत लिखा था, जिसमें कहा था कि लाखों काफिरों को इस्लाम कबूल कराया गया है।
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मालाबार, कोडागु और कुर्ग के विषय में भी ऐसी चिट्ठियां, मिलीं हैं। अंग्रेज अधिकारी मार्क विल्स 'हिस्टोरिकल स्केचे ऑफ द साउथ ऑफ इंडिया' में टीपू सुल्तान की क्रूरता और धर्मांतरण वाले रुख का जिक्र किया था। इसकी ऐतिहासिकता इसलिए संदिग्ध है कि वह जीवनभर अंग्रेजों से लड़ते रहे, तब, अंग्रेजों ने उनके खिलाफ माहौल बनाने के लिए ऐसा दुष्प्रचार किया था। सीताराम गोयल की किताब 'टीपू सुल्तान विलेन ऑर हीरो' में भी उन्हें मंदिरों को नष्ट करने वाला और धर्मांतरण कराने वाला बताया गया है। इतिहासकार इरफान हबीब 'स्टेट एंड डिप्लोमेसी अंडर टीपू सुल्तान' में लिखते हैं कि वह युद्ध की रणनीतियों को तैयार करते थे।
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इरफान हबीब की नजर में क्या थे टीपू सुल्तान?
इतिहासकार इरफान हबीब अपनी किताब 'स्टेट एंड डिप्लोमेसी अंडर टीपू सुल्तान' में कई इतिहासकारों के हवाले से टीपू सुल्तान की स्थिति समझाते हैं। उन्होंने लिखा है, 'प्रोफेसर निखिलेश गुहा ने टीपू सुल्तान के राज्य और व्यापारिक नीतियों का विश्लेषण किया। वे कहते हैं कि टीपू ने इस्लाम का सहारा इसलिए लिया ताकि अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई में लोग ज्यादा उत्साह दिखाएं। एक अंग्रेज अधिकारी एडवर्ड मूर ने साल 1794 में लिखा था कि टीपू सुल्तान समझते होंगे कि धर्म के नाम पर उनकी आज्ञाओं का लोग ज्यादा सम्मान करेंगे।'
इरफान हबीब ने लिखा, 'टीपू सुल्तान ने मैसूर की पुरानी परंपराएं जारी रखीं। मंदिरों को दान दिया और हिंदू अधिकारियों को नौकरी दी। 1797 में एक अन्य अंग्रेज अधिकारी ने उन्हें योग्य शासक बताया जो प्रजा का पालन करता है, दमन नहीं। डॉ. ब्रिटलबैंक ने टीपू सुल्तान के बारे में बाद की धारणाओं पर विचार किया। इतिहासकारों के नजरिए अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन जब तक भारतीय ब्रिटिश उपनिवेशवाद के खिलाफ संघर्ष करने वालों को याद रखेंगे, टीपू सुल्तान को हमेशा याद किया जाएगा।'
अब आगे क्या?
महाराष्ट्र में कई सियासी दल अब कह रहे हैं कि इस मुद्दे को गैरजरूरी तरजीह दी जा रही है। शिवसेना (यूबीटी) के सांसद संजय राउत ने इस विवाद पर कहा, 'मालेगांव डिप्टी मेयर के दफ्तर की दीवार पर उनकी तस्वीर लगी थी, जिसे हटा दिया गया है। अब यह मुद्दा खत्म होना चाहिए। बीजेपी के पास कोई काम-धंधा नहीं है। जनता या राष्ट्रहित का कोई मुद्दा नहीं तो यह कोई भी मुद्दा उठाकर हिंदू-मुस्लिम करते हैं। अगर टीपू सुल्तान के बारे में सच जाना है तो राष्ट्रपति कोविंद, जिन्हें आपने खुद बनाया था, उनका कर्नाटक विधानसभा में दिया गया भाषण सुनें। मुंबई महानगरपालिका में बीजेपी कॉर्पोरेटर्स ने सड़क के नाम टीपू सुल्तान के नाम पर रखने का प्रस्ताव भी रखा था।'
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