भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने आगामी पंजाब विधानसभा चुनाव के लिए तैयारियां तेज कर ली हैं। पीएम मोदी ने खुद 17 जुलाई को जालंधर में एक रैली को संबोधित किया। इस रैली में उन्होंने तमाम राजनीतिक दलों पर निशाना साधा। अब तक बीजेपी नेताओं के निशाने पर शिरोमणि अकाली दल नहीं आता था लेकिन पीएम मोदी ने इस बार अकाली दल को भी नहीं बख्शा। पीएम मोदी ने अकाली दल को निशाने पर लेते हुए पार्टी को स्वार्थी तक कह दिया। इसके बाद राज्य में दोनों पार्टियों के गठबंधन को लेकर लगाई जा रही अटकलों पर चर्चा शुरू हो गई।
अकाली दल और बीजेपी लंबे समय तक एक साथ गठबंधन में रहे। अकाली दल बीजेपी का सबसे पुराना साथी था और कहा जाता था कि दोनों दलों के बीच नाखून-मांस का रिश्ता है। हालांकि, यह रिश्ता 2020 में किसान कानूनों के कारण टूट गया और दोनों पार्टियां एक दूसरे से अलग हो गई। इसके बाद दोनों अलग-अलग चुनाव लड़ रही हैं और इसका नुकसान दोनों दलों को हो रहा है।
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पीएम मोदी ने क्या कहा?
पीएम मोदी अपने भाषण में कांग्रेस पार्टी पर हमला बोल रहे थे। वह कह रहे थे कि कांग्रेस पार्टी में कुर्सी का खेल चल रहा है और स्वार्थी नेता कुर्सी पर नजर बनाए बैठे हैं। इसी बीच पीएम ने शिरोमणि अकाली दल पर भी निशाना साधा और कहा, 'अकाली दल का भी यही हाल है, वह भी अपने स्वार्थों में उलझे हुए हैं। उनको भी पंजाब के लोगों की कोई परवाह नहीं है। पंजाब में असली बदलाव बीजेपी ही ला सकती है।'
अकाली दल चाहता है गठबंधन
शिरोमणि अकाली दल भारतीय जनता पार्टी के साथ गठबंधन करना चाहता है लेकिन इस बार बीजेपी इसके लिए तैयार नहीं दिख रहे है। कम से कम सार्वजनिक बयानों से तो यही लग रहा है। हालांकि, राजनीति में पर्दे के पीछे भी कई खेल होते हैं और बताया जाता है कि दोनों पार्टियों के बीच बातचीत चल रही है। अकाली दल बीजेपी से गठबंधन चाहता है लेकिन किसान कानूनों के बाद टूटे इस गठबंधन को अब बीजेपी अपनी शर्तों पर शुरू करना चाहेगी और अकाली दल को यह मंजूर नहीं है। अकाली दल के नेता बीजेपी पर हमला नहीं करते। पीएम के बयान पर भी सुखबीर बादल ने कहा कि प्रधानमंत्री ने शिरोमणि अकाली दल (बादल) के बारे में कुछ नहीं कहा। उनका इशारा किसी दूसरे अकाली दल (पुर्नसुरजीत) की तरफ था। उनके इस बयान से साफ जाहिर है कि वह अभी भी गठबंधन की उम्मीद पाले हैं।
बीजेपी में दो राय
भारतीय जनता पार्टी में अकाली दल के साथ गठबंधन को लेकर दो राय हैं। एक तरफ वे नेता हैं जो कह रहे हैं कि पार्टी कमजोर है और बिना गठबंधन के चुनावी मैदान में नहीं जा सकती है। इसलिए पार्टी को गठबंधन करना चाहिए ताकि पंजाब में सरकार बनाने की स्थित में आ सके। इसके साथ ही बीजेपी के नेताओं का एक हिस्सा इस बात का समर्थन कर रहा है कि पार्टी को अकेले चुनाव लड़ना चाहिए। इसको लेकर आलाकमान ने साफ कर दिया है कि बीजेपी अकेले ही चुनावी मैदान में उतरेगी और जो नेता गठबंधन में चुनाव लड़ने की बात कह रहे थे उन्हें भी समझा दिया गया है। पार्टी सभी 117 सीटों पर चुनाव लड़ने की बात कह रही है।
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बीजेपी क्यों नहीं चाहती गठबंधन?
भारतीय जनता पार्टी अकाली दल से गठबंधन नहीं चाहती है इसके पीछे कई कारण है। पहला कारण यह है कि बीजेपी पंजाब में विस्तार करना चाहती है लेकिन अकाली दल बड़े भाई की भूमिका में रहना चाहती है। बीजेपी को गठबंधन में बहुत कम सीटें चुनाव लड़ने के लिए मिलती हैं। ऐसे में पार्टी कभी भी पंजाब में विस्तार नहीं कर पाएगी। पार्टी को अकाली दल ने कुछ शहरी हिंदू बहुल सीटों तक ही सीमित रखा है। इसलिए बीजेपी अब अकाली दल के बिना अकेले मैदान में उतरकर विस्तार करना चाहती है।
गठबंधन ना होने का दूसरा सबसे बड़ा कारण अकाली दल की आंतरिक कलह है। 2017 के चुनाव में मिली करारी हार के बाद अकाली दल लगातार कमजोर होता गया है। सुखबीर बादल अध्यक्ष की कुर्सी पर बने हुए हैं लेकिन उनके विरोध में कई बड़े नेता पार्टी को अलविदा कह चुके हैं। इसके साथ ही कई नेताओं ने एक अलग पार्टी भी बना ली और कई दूसरी पार्टियों में शामिल हो गए। मौजूदा समय में अकाली दल खुद अपने पुराने वोटबैंक को पाने की कोशिश कर रही है। 2022 के चुनाव में मिली करारी हार पार्टी की स्थिति को दिखाती है। बीजेपी नेताओं को लगता है कि अकाली दल खुद कमजोर है और अगर दोनों मिलकर चुनाव भी लड़े तो इससे सरकार बनाने की स्थिति में फिलहाल नहीं आएंगे। ऐसे में पार्टी अकेले सभी सीटों पर चुनाव लड़ने का मन बना रही है।