सनातन धर्म में जन्माष्टमी का त्योहार बेहद खास माना जाता है। इस पर्व को मनाने के लिए लाखों भक्त बेसब्री से इंतजार करते हैं, क्योंकि सभी भक्त इस पर्व को बेहद हर्ष और उल्लास के साथ मनाते हैं। जन्माष्टमी पर्व में भगवान कृष्ण के जन्म का उत्सव मनाया जाता है। साथ ही, कई लोग इस दौरान भगवान कृष्ण के बाल स्वरूप की पूजा करते हैं और व्रत रखते हैं। जन्माष्टमी पर्व के लिए देश के अनेक मंदिरों में सजावट की तैयारियां अब शुरू हो चुकी हैं, क्योंकि सितंबर के पहले हफ्ते में ही सभी भक्त जन्माष्टमी का पर्व मनाएंगे।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, सभी भक्तों को जन्माष्टमी पर्व के दिन पूजा-पाठ करना चाहिए। साथ ही, रात के बारह बजे तक भजन-कीर्तन करना चाहिए। इसके अलावा, इस पावन दिन भक्तों को व्रत रखना चाहिए, ताकि भगवान कृष्ण की कृपा बरसे। इस साल कई लोगों को त्योहार की सही तारीख को लेकर कन्फ्यूजन हो रही है। जहां एक तरफ कई लोगों का मानना है कि 4 सितंबर को जन्माष्टमी का पर्व मनाना चाहिए, वहीं दूसरी तरफ लोगों का मानना है कि 5 सितंबर को जन्माष्टमी का पर्व मनाना चाहिए।
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कब है जन्माष्टमी?
हिंदू पंचांग के अनुसार, जन्माष्टमी त्योहार की शुरुआत 4 सितंबर की रात 12 बजकर 25 मिनट पर हो रही है, जो 5 सितंबर की रात 12 बजकर 13 मिनट तक रहेगी। इस वजह से 4 सितंबर को जन्माष्टमी का त्योहार मनाया जाएगा। 4 सितंबर के दिन ही लोगों को व्रत रखना चाहिए। साथ ही, मंदिर और घर में भजन-कीर्तन और मंत्र जाप करना चाहिए।
धार्मिक मान्यता के मुताबिक, भगवान कृष्ण का जन्म रोहिणी नक्षत्र में अष्टमी तिथि को हुआ था। उस हिसाब से देखा जाए तो इस साल 4 सितंबर की रात 12:29 बजे से अष्टमी तिथि शुरू होगी। इसी वजह से जन्माष्टमी का पर्व 4 सितंबर को मनाना चाहिए।
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क्या है व्रत और पूजा की विधि?
जन्माष्टमी के दिन भक्तों को सुबह-सुबह उठकर स्नान करना चाहिए। उसके बाद साफ कपड़े पहनकर मंदिर जाएं या अपने घर के पूजा स्थान पर जाएं। जहां आप व्रत का संकल्प लें और उसके बाद दिनभर व्रत का पालन करें। धार्मिक मान्यता के अनुसार, जन्माष्टमी पर्व पर निर्जला व्रत सबसे ज्यादा शुभ माना जाता है। हालांकि, जो लोग निर्जला व्रत नहीं रख सकते हैं, वे लोग फलाहार व्रत रख सकते हैं।
जन्माष्टमी के दिन लोगों को सोने से बचना चाहिए। इसके बजाय धार्मिक ग्रंथ पढ़ना चाहिए, साथ ही मंत्र जाप करना चाहिए। रात होते ही सभी भक्तों को कृष्ण जी का पंचामृत से अभिषेक करना चाहिए और उन्हें नए कपड़े पहनाने चाहिए। साथ ही, भगवान कृष्ण को पालने पर विराजमान करें। इसके बाद भक्तों को भजन-कीर्तन करना चाहिए और आरती करनी चाहिए।
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व्रत पारण का सही समय
जन्माष्टमी व्रत के पारण को लेकर दो अलग-अलग परंपराएं देखने को मिलती हैं। जहां एक तरफ कई लोगों का मानना है कि व्यक्ति को जन्माष्टमी के अगले दिन पारण करना चाहिए। वहीं दूसरी तरफ कई लोग जन्मोत्सव के ठीक बाद व्रत खोल लेते हैं।
नोट: यह लेख धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है। हम इसकी पुष्टि नहीं करते हैं।