आजकल पूरे देश में गणेश चतुर्थी त्योहार की तैयारियां जोरों-शोरों से की जा रही हैं। महाराष्ट्र समेत देश के कई इलाकों में लोग इसे धूमधाम से मनाने के लिए उत्सुक हैं। इस दौरान कई लोग गणेश भगवान और गौरी माता की प्रतिमा खरीदते हैं, ताकि गणेश चतुर्थी के दिन गणेश भगवान की प्रतिमा को अपने घर में विराजमान कर सकें। सनातन धर्म की मान्यताओं के अनुसार, गणेश चतुर्थी के दिन गणेश भगवान की पूजा-अर्चना करने से भगवान सभी विघ्न हर लेते हैं।
इस साल 14 सितंबर से गणेश चतुर्थी का त्योहार मनाया जाएगा। इस दिन सभी लोग अपने घर गणेश भगवान की प्रतिमा स्थापित करते हैं। महाराष्ट्र के कई लोग गणेश और गौरी माता की पूजा करते हैं और 10 दिनों के बाद गणेश विसर्जन की प्रक्रिया निभाते हैं। धार्मिक जानकारों के मुताबिक, गणेश भगवान और गौरी मां की प्रतिमा खरीदते वक्त लोगों को यह देखना चाहिए कि वह प्रतिमा गणेश भगवान के असली स्वरूप जैसी हो। अब सवाल उठता है कि गणेश भगवान की असली प्रतिमा कैसी होनी चाहिए।
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गणेश भगवान की प्रतिमा
सनातन धर्म के कई धर्म ग्रंथों में गणेश भगवान और गौरी माता के स्वरूप के बारे में बताया गया है। शिव पुराण में खासतौर पर गणेश के स्वरूप के बारे में लिखा है। तो आइए जानते हैं कि गणेश और गौरी माता का असली स्वरूप कैसा होना चाहिए।
आसन- धार्मिक ग्रंथों के मुताबिक, गणेश भगवान पद्मासन में बैठना पसंद करते हैं। यही उनका शुभ आसन माना जाता है। इसी वजह से लोगों को गणेश भगवान की वही प्रतिमा लेनी चाहिए, जिसमें भगवान पद्मासन में बैठे हों।
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सूंड की दिशा- भक्तों को इस बात का ध्यान देना चाहिए कि जिस प्रतिमा में सूंड बाईं ओर मुड़ी हुई हो, वह पूजा के लिए अधिक शुभ मानी जाती है। यह सौम्य और शांत स्वरूप का प्रतीक है। दाईं ओर मुड़ी सूंड अधिक कठोर साधना-नियमों की मांग करती है।
हाथों में प्रतीक- गणेश जी की प्रतिमा में अभय या वरद मुद्रा वाला हाथ पारंपरिक स्वरूप माना जाता है। इसी प्रकार की प्रतिमा को घर में स्थापित किया जा सकता है।
वाहन- गणेश जी के साथ मूषक का होना बेहद शुभ माना जाता है। यह विनम्रता और सूक्ष्म बुद्धि का प्रतीक है।
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गौरी माता की प्रतिमा
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, गौरी मां का स्वरूप बेहद सुंदर, शांत और सौम्य है। माता गौरी को या तो स्वतंत्र रूप से पद्मासन में स्थापित किया जाता है, या फिर सुपारी से प्रतिष्ठित कर कलावा लपेटकर प्रतीकात्मक रूप दिया जाता है।