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क्या ज्यादा सोचने से खत्म हो जाती है खुशी? बुद्ध के विचार से समझिए

ज्यादा सोचना हमारी मानसिक शांति के लिए बेहद खतरनाक हो सकता है। ज्यादा सोचने से इंसान की खुशी भी खत्म हो सकती है। इसी विषय पर गौतम बुद्ध के विचार समझिए।

Buddh

प्रतीकात्मक तस्वीर, Photo Credit- Gemini

हम कई बार एक ही विषय को लेकर बार-बार सोचते हैं। हद से ज्यादा किसी विषय के बारे में सोचना ठीक नहीं होता। यह कई बार व्यक्ति की मानसिक अशांति का कारण भी बन सकता है। गौतम बुद्ध के विचारों के मुताबिक, व्यक्ति के ज्यादा सोचने की वजह से खुशी पर दुख की परत चढ़ जाती है, जिससे खुशी दुख में बदल जाती है। ज्यादा सोचने की वजह से व्यक्ति वर्तमान के बजाय भूतकाल में उलझा रहता है। गौतम बुद्ध के मुताबिक, जब व्यक्ति एक ही चीज को बार-बार सोचता है, तो उसके मन के विचार अनियंत्रित और बेकाबू हो जाते हैं, जिससे दुख मिलना तय है।

 

आज के समय में कोई भी काम सोच-समझकर करना बेहद जरूरी है। हालांकि, ज्यादा सोचने की वजह से व्यक्ति किसी मुद्दे पर धीमी रफ्तार से निर्णय ले पाता है। जब हम किसी खुशी के पल के बारे में बार-बार सोचते हैं, तो हम बीते पलों में ही डूब जाते हैं और वर्तमान व भविष्य के बारे में सोच नहीं पाते। दूसरी तरफ, दुख भरे पलों के बारे में बार-बार सोचते हैं, तो और ज्यादा दुखी होते जाते हैं और वर्तमान में घट रही खुशी के पलों में भी खुश नहीं रह पाते। अब सवाल उठता है कि ज्यादा सोचने को लेकर गौतम बुद्ध के क्या विचार थे?

 

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ज्यादा सोचने से क्या होता है?


गौतम बुद्ध के विचारों के मुताबिक, जब किसी व्यक्ति को कुछ भी अनुभव होता है, तो उसके मन में कई विचार जन्म लेते हैं। वहीं विचार धीरे-धीरे बढ़ने लगते हैं, जिससे व्यक्ति के मन में तुलना, भय, पछतावा और आशंका जैसे भाव जन्म लेते हैं। ये भाव खुशी को वैसे ही ढक लेते हैं जैसे बादल सूरज को ढक लेते हैं। गौतम बुद्ध ने ज्यादा सोचने की इस परिस्थिति को 'प्रपंच' कहा है।

 

धम्मपद ग्रंथ के पहले श्लोक में गौतम बुद्ध ने कहा, 'मन ही सब कुछ है, जो व्यक्ति सोचता है वही बन जाता है।' इस श्लोक का अर्थ है कि सोचना गलत नहीं है, बल्कि अच्छे विषयों पर सोचना जरूरी है, क्योंकि व्यक्ति जैसा सोचता है वैसा ही बन जाता है। अगर व्यक्ति बीती हुई बातों के बारे में ही सोचता रहेगा, तो वह वर्तमान के बजाय भूतकाल में ही डूबा रहेगा।

 

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गौतम बुद्ध के ज्यादा सोचने को लेकर उपदेश

 

कालाम सुत्त के मुताबिक, एक बार बुद्ध केसपुत्त गांव में उपदेश दे रहे थे। तब उन्होंने ज्यादा सोचने को लेकर बताया केवल परंपराओं को मानना व्यक्ति को सोचने से मुक्ति नहीं देता। इस वजह से व्यक्ति को खुद अनुभव करना चाहिए, ताकि वह किसी विषय पर बार-बार सोचने से मुक्ति पा सके।

 

सुत्त निपात में बुद्ध ने साफ तौर पर कहा है कि ज्यादा सोचने से मानसिक उलझन पैदा होती है और यही उलझन दुख का कारण बनती है। इस उलझन से बचने का समाधान यह नहीं है कि व्यक्ति सोचना बंद कर दे। इसके बजाय व्यक्ति को अपने विचारों को देखना चाहिए, उनमें डूबना नहीं चाहिए।

 

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ज्यादा सोचने से मुक्ति कैसे पाएं?

 

बुद्ध ने ज्यादा सोचने से बचने के लिए बताया है कि जब भी मन में कोई विचार आए, तो उसे पहचानो और उसका नाम दो। जैसे- यह भय है, यह क्रोध है या यह चिंता है। अब इन विचारों को दिशा दो और खुद से पूछो कि इस विषय पर सोचने से क्या होगा। अगर उस विषय पर बार-बार सोचने से कुछ नहीं बदल सकता, तो उस विचार को जाने दो।

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