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मौलाना और इमाम से कितने अलग हैं अयातुल्लाह, शिया समाज में क्या है इनका महत्व?

इस्लाम में इमाम, मौलाना और अयातुल्लाह पद का विशेष महत्व बताया गया है। इस्लाम धर्म के शिया समाज में अयातुल्लाह को ईश्वर के समान माना जाता है।

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प्रतीकात्मक तस्वीर: Photo Credit: AI

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मध्य-पूर्व से लेकर भारत और दक्षिण एशिया तक, जब भी इस्लामिक दुनिया से जुड़ी कोई बड़ी धार्मिक या राजनीतिक घटना सामने आती है, तब मौलाना, इमाम और अयातुल्लाह जैसे शब्द अचानक चर्चा में आ जाते हैं। आम लोगों के लिए इन शब्दों के मायने और इनके बीच का फर्क अक्सर स्पष्ट नहीं होता। क्या मौलाना और अयातुल्लाह एक ही धार्मिक पद हैं? क्या हर इमाम सिर्फ नमाज पढ़ाने वाला होता है या फिर शिया समाज में इसका मतलब कुछ और है?

 

असल में इस्लाम के भीतर सुन्नी और शिया परंपराओं की अलग-अलग धार्मिक संरचना है और इसी वजह से धार्मिक नेतृत्व की भूमिका भी अलग दिखाई देती है। जहां एक ओर मौलाना और इमाम आम तौर पर मस्जिद, मदरसे और धार्मिक शिक्षा से जुड़े होते हैं, वहीं दूसरी ओर शिया समाज में अयातुल्लाह केवल धर्मगुरु नहीं, बल्कि धार्मिक कानून और सामाजिक जीवन के मार्गदर्शक माने जाते हैं।

 

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ईरान, इराक और अन्य शिया बहुल देशों में अयातुल्लाह का प्रभाव सिर्फ मस्जिद तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उनके फतवे और फैसले लाखों लोगों के व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन को प्रभावित करते हैं। कुछ मामलों में उनका प्रभाव राजनीति और शासन व्यवस्था तक भी दिखाई देता है। यही वजह है कि जब भी शिया समाज से जुड़ा कोई बड़ा मुद्दा सामने आता है, अयातुल्लाह की भूमिका अपने-आप केंद्र में आ जाती है।

मौलाना कौन है?

मौलाना शब्द किसी औपचारिक पद को नहीं दर्शाता, बल्कि यह एक सम्मानसूचक उपाधि है। मौलाना आमतौर पर वह व्यक्ति होता है जिसने इस्लामी शिक्षा प्राप्त की हो और जिसे कुरान, हदीस और इस्लामी कानून यानी फिक्ह का अच्छा ज्ञान हो। मौलाना मस्जिदों में प्रवचन देते हैं, मदरसों में पढ़ाते हैं और लोगों को धार्मिक मामलों में सलाह देते हैं। मौलाना सुन्नी और शिया दोनों समुदायों में पाए जाते हैं लेकिन आम बोलचाल में यह शब्द ज्यादातर सुन्नी समाज से जुड़ा हुआ माना जाता है। मौलाना का कोई सर्वोच्च या केंद्रीय अधिकार नहीं होता, बल्कि उनकी भूमिका शिक्षण और मार्गदर्शन तक सीमित रहती है।

 

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इमाम कौन होते हैं?

इमाम का अर्थ सामान्य रूप से नेतृत्व करने वाला होता है लेकिन इसका अर्थ सुन्नी और शिया परंपराओं में अलग-अलग है। सुन्नी इस्लाम में इमाम वह व्यक्ति होता है जो मस्जिद में नमाज का नेतृत्व करता है। वह धार्मिक रूप से सम्मानित होता है लेकिन उसका अधिकार सीमित होता है और वह कोई अंतिम धार्मिक निर्णय लेने वाला नहीं माना जाता। दूसरी ओर, शिया इस्लाम में इमाम का अर्थ पूरी तरह अलग और बहुत ऊंचे स्तर का है। शिया मान्यता के अनुसार इमाम केवल नमाज पढ़ाने वाला व्यक्ति नहीं होता, बल्कि वह पैगंबर मोहम्मद का उत्तराधिकारी और ईश्वर के जरिए चुना गया दिव्य मार्गदर्शक होता है। शिया समुदाय बारह इमामों को मानता है और उन्हें पाप से मुक्त, यानी मासूम माना जाता है। शिया समाज में इमाम का दर्जा सबसे ऊंचा और पवित्र होता है।

अयातुल्लाह कौन होते हैं?

अयातुल्लाह शिया इस्लाम का एक विशेष और बहुत उच्च धार्मिक पद है। अयातुल्लाह शब्द का अर्थ होता है 'ईश्वर की निशानी'। यह पद केवल शिया समाज में पाया जाता है और इसे पाने के लिए वर्षों तक गहरी धार्मिक शिक्षा हासिल करनी पड़ती है। अयातुल्लाह वह विद्वान होता है जिसे कुरान, हदीस और शिया फिक्ह में इतना ज्ञान हो कि वह खुद से धार्मिक फैसले और फतवे दे सके। अयातुल्लाह को समाज में उसकी विद्वत्ता और धार्मिक समझ की वजह से मान्यता मिलती है, यह पद किसी वंश या परिवार से नहीं मिलता।

 

कुछ अयातुल्लाह इतने प्रतिष्ठित होते हैं कि उन्हें ग्रैंड अयातुल्लाह कहा जाता है। ऐसे अयातुल्लाह को मरजए तकलीद माना जाता है, यानी शिया मुसलमान अपने रोजमर्रा के धार्मिक जीवन में उनके बताए नियमों और फैसलों का पालन करते हैं। विवाह, तलाक, धार्मिक कर, इबादत और सामाजिक मामलों में उनके फतवे माने जाते हैं। इसी वजह से शिया समाज में अयातुल्लाह का धार्मिक, सामाजिक और कभी-कभी राजनीतिक प्रभाव भी बहुत गहरा होता है।

 

सरल शब्दों में कहा जाए तो मौलाना एक धार्मिक शिक्षक और मार्गदर्शक होते हैं, इमाम सुन्नी समाज में नमाज का नेतृत्व करते हैं और शिया समाज में इमाम दिव्य और ऐतिहासिक हस्तियां हैं, जबकि अयातुल्लाह शिया समाज के सर्वोच्च धार्मिक विद्वान होते हैं जिनके फैसले करोड़ों लोग मानते हैं। यही वजह है कि अयातुल्लाह का दर्जा मौलाना और सामान्य इमाम से कहीं ज्यादा ऊंचा माना जाता है।

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