हिंदू धर्म में भगवान शिव के स्वरूप के साथ जुड़ी हर वस्तु का अपना एक गहरा आध्यात्मिक रहस्य है। ऐसा कहा जाता है कि उनके त्रिशूल पर बंधा 'डमरू' केवल एक वाद्य यंत्र नहीं बल्कि सृष्टि के सृजन और विनाश की धुन है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब सृष्टि की रचना हुई थी, तब संसार में आवाज तो थी लेकिन उसमें कोई लय या ताल नहीं था। देवी सरस्वती के प्रकट होने के बाद भगवान शिव ने 14 बार डमरू बजाया, जिससे निकले नाद ने दुनिया को संगीत, व्याकरण और 'माहेश्वर सूत्र' का उपहार दिया।
यह डमरू नाद साधना का प्रतीक है जिससे 'ॐ' की उत्पत्ति हुई। धार्मिक जानकारों का मानना है कि शिव जब आनंदित होकर तांडव करते हैं, तो डमरू की थाप से प्रकृति में नई ऊर्जा का संचार होता है। वहीं, आध्यात्मिक नजरिए से डमरू का ऊपरी और निचला हिस्सा आकाश और पाताल को जोड़ता है, जबकि बीच का हिस्सा वह बिंदु है जहां से जीवन की शुरुआत होती है।
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'माहेश्वर सूत्र'
माहेश्वर सूत्र डमरू से निकला 14 मंत्र का सूत्र है। यह माना जाता है कि डमरू से निकले गूंज से नकारात्मक शक्तियां दूर भागती हैं। भगवान शिव के डमरू से जो 14 ध्वनियां निकली थीं, उन्हें ही 'माहेश्वर सूत्र' कहा जाता है। ये मंत्र इस प्रकार हैं: अइउण्, ऋऌक्, एओङ्, ऐऔच्, हयवरट्, लण्, ञमङणनम्, झभञ्, घढधष्, जबगडदश्, खफछठथचटतव्, कपय्, शषसर्, हल्।
डमरू मंत्र के लाभ
शास्त्रों के अनुसार, इन सूत्रों का उपयोग प्राचीन काल में इलाज के लिए भी किया जाता था। इसके नियमित जाप से कई तरह के फायदे मिलते हैं। माना जाता है कि शिव पूजा के बाद इन 14 सूत्रों का 11 बार जाप करने से पुराने बीमारियों में सुधार होता है। लोगों का तो यह भी मानना है कि जहरीले जीवों के असर को कम करने के लिए भी इसका निरंतर जाप प्रभावी माना गया है।
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आदि शंकराचार्य अपने शिष्यों का ध्यान केंद्रित करने के लिए डमरू का उपयोग करते थे। आज भी यह तनाव दूर करने और फोकस बढ़ाने का बेहतरीन जरिया है।
लोगों को ऐसा विश्वास है कि डमरू की ध्वनि घर के वास्तु दोष और बुरी नजर के प्रभाव को खत्म करती है। छात्रों के लिए इन मंत्रों का जाप याददाश्त और सीखने की क्षमता बढ़ाने वाला माना जाता है।