सनातन धर्म में शारदीय नवरात्र बेहद पावन पर्व है। कई लोगों को लगता है कि यह पर्व सिर्फ देवी मां के 9 स्वरूपों और शक्ति को ही नहीं दर्शाता है, बल्कि यह नवरात्र माता सती के पुनर्जन्म, प्रेम और त्याग की कहानी भी बयां करता है। धार्मिक कथाओं के अनुसार, नवरात्र के पहले दिन शैलपुत्री की आराधना की जाती है, जिन्हें माता पार्वती माना जाता है। देवी सती ने ही माता पार्वती के रूप में अवतार लिया था। नवरात्र में पूजी जाने वाली नवदुर्गा माता सती के जीवन की कहानी के विभिन्न पहलुओं का प्रतीक हैं, जिनके बारे में भक्तों को जानना चाहिए।
इस साल 11 अक्टूबर से नवरात्रि का पर्व मनाया जा रहा है। इस त्योहार को पूरे भारत में बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, भगवान श्रीराम ने शारदीय नवरात्र में देवी के नौ रूपों की आराधना की थी। इसी वजह से आज भी नवरात्र के नौ दिनों तक दुर्गा मां की पूजा-आराधना की जाती है, ताकि भक्तों को देवी मां का आशीर्वाद मिले। अब सवाल उठता है कि नवरात्रि का पर्व सती की कहानी को कैसे बयां करता है।
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मां सती और नवदुर्गा का कनेक्शन
धार्मिक कथाओं के अनुसार, देवी सती ने अपने पिता दक्ष की इच्छा के विरुद्ध भगवान शिव से शादी की थी। एक बार राजा दक्ष ने अपने दामाद भगवान शिव का अपमान किया था, जिससे आहत होकर देवी सती ने आत्मदाह कर लिया था। इसके बाद उन्होंने माता पार्वती के रूप में पुनर्जन्म लिया, जिन्हें माता शैलपुत्री के नाम से जाना जाता है।
नवदुर्गा ने बयां की मां सती की कहानी
नवरात्र के पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा की जाती है। मान्यता के अनुसार, उन्होंने राजा हिमालय की पुत्री के रूप में जन्म लिया था। यह स्वरूप माता सती के नए जीवन को दर्शाता है। देवी मां का यह स्वरूप बेहद शांत और कोमल है। इसके बाद जब माता पार्वती को नारद जी ने उपदेश दिया, तब उन्होंने भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए हजारों साल तक तपस्या की थी। उस दौरान माता के दाहिने हाथ में मंत्र जाप करने वाली माला और बाएं हाथ में कमंडल था। पार्वती के इसी स्वरूप को ब्रह्मचारिणी कहा जाता है, जिनकी पूजा नवरात्र के दूसरे दिन की जाती है। कठिन तपस्या के बाद भगवान शिव ने देवी पार्वती का प्रेम स्वीकार कर लिया था। इसके बाद माता पार्वती और शिव जी का विवाह हुआ।
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जब विवाह के दौरान भगवान शिव विराट रूप में आए थे, तब मां पार्वती ने चंद्रघंटा स्वरूप धारण किया था। इस स्वरूप में उनकी भुजाओं में अस्त्र विराजमान हैं और वे सिंह पर सवार होती हैं। माता पार्वती ने जब पूरी सृष्टि में अंधकार देखा, तो उन्होंने कूष्मांडा के स्वरूप में अपनी एक मुस्कान के जरिए संसार में रोशनी फैला दी।
पौराणिक कथा के अनुसार, तारकासुर ने तीनों लोकों को परेशान कर रखा था। उसने धरती लोक से लेकर देवताओं तक को परेशान किया। तब माता पार्वती ने स्कंदमाता के स्वरूप में कार्तिकेय को जन्म दिया, जिन्होंने तारकासुर का वध किया।
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देवी ने भक्तों की मनोकामना की पूरी
महर्षि कात्यायन ने कठोर तपस्या की थी। तब देवी मां ने उनकी मनोकामना पूरी करने के लिए उनकी पुत्री के रूप में जन्म लिया। इसी कारण देवी के इस स्वरूप को मां कात्यायनी कहा जाता है। इसके बाद असुरों के वध और बुराई का विनाश करने के लिए देवी ने कालरात्रि का रूप धारण किया था।
नवरात्रि के आठवें दिन महागौरी स्वरूप की पूजा की जाती है। मान्यता के अनुसार, जब देवी तपस्या करते-करते बेहद कमजोर हो गईं, तब भगवान शिव ने उन्हें स्वस्थ और गौर वर्ण का रूप प्रदान किया। इसके बाद मां पार्वती ने महागौरी का स्वरूप धारण किया। नवरात्रि के नौवें दिन सिद्धिदात्री देवी की पूजा की जाती है। मान्यता है कि देवी के इस स्वरूप से भगवान शिव को 18 सिद्धियां प्राप्त हुई थीं।
नोट: यह लेख धार्मिक मान्यताओं और गणनाओं पर आधारित है। इसकी पुष्टि हम नहीं करते हैं।