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'मैं रहूं या ना रहूं, चिंता मत करना...', वायरल हो गया प्रेमानंद महाराज का वीडियो

प्रेमानंद महाराज का एक वीडियो वायरल हो रहा है जिसमें उन्होंने भक्तों से अपनी सेहत की चिंता न करने की अपील की है। उन्होंने सभी से धैर्य रखने और अपनी भक्ति जारी रखने के लिए कहा है।

Premanand Maharaj

प्रेमानंद महाराज, Photo Credit: Social Media

प्रेमानंद महाराज की तबीयत अभी ठीक नहीं है, जिसकी वजह से उनकी रोज होने वाली पैदल यात्रा और भक्तों से मिलना अभी बंद है। इसी बीच उनका एक वीडियो सोशल मीडिया पर काफी वायरल हो रहा है जिसमें वह अपने भक्तों को समझाते हुए कह रहे हैं, 'बिल्कुल भी चिंता मत करना। चाहे हम मिलें या ना मिलें, चाहे हम बोलें या ना बोलें, हम आप सब से बहुत प्यार करते हैं। सबसे जरूरी बात है कि आपको फिक्र नहीं करनी है। आप ये मत सोचिए कि आगे क्या होगा। हम बिना बोले भी आपके मन में रहेंगे।'

 

प्रेमानंद महाराज की रात वाली पदयात्रा 17 मई से बंद है। इस वजह से भक्त उनकी सेहत को लेकर परेशान हैं। उनके शिष्यों ने पहले ही बताया था कि उनकी तबीयत स्थिर नहीं है। इसलिए उनसे मिलना और बातचीत अभी बंद है। उनके करीबी लोगों के मुताबिक, प्रेमानंद महाराज की दोनों किडनी खराब हैं और उन्हें हफ्ते में दो से तीन बार डायलिसिस कराना पड़ता है।

 

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भक्तों से कही यह बात

महाराज जी ने अपने वीडियो में आगे कहा, 'गुरुदेव जो कहते हैं आप उसका पालन करें। आप एकदम बेफिक्र रहें। आप जो भी सेवा कर रहे हैं, उसे करते रहें। भगवान के नाम का जाप लगातार करें सब अच्छा होगा। आपका गुरुदेव आपके मन में हमेशा रहेगा। आप बिना किसी डर के भजन करें। जब हमारा मन करेगा, हम फिर से बात करेंगे।' 17 मई की रात को जब हजारों भक्त उनके दर्शन के लिए आए थे तब शिष्यों ने जानकारी दी थी कि प्रेमानंद महाराज की पदयात्रा अभी नहीं हो पाएगी।

 

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प्रेमानंद महाराज का सफर 

प्रेमानंद महाराज का जन्म कानपुर जिले की नरवल तहसील में हुआ था। उनके पिता का नाम शंभू नारायण पांडेय और माता का नाम रमा देवी है। वह तीन भाइयों में से दूसरे नंबर पर हैं। बचपन में उनका नाम अनिरुद्ध कुमार पांडेय था। उन्होंने आठवीं कक्षा तक पढ़ाई की है, जब वह छोटे थे तब उन्होंने अपने दोस्तों के साथ एक शिव मंदिर बनाने की कोशिश की थी लेकिन कुछ लोगों के विरोध के कारण वह काम पूरा नहीं हो पाया।

 

इस बात से वह बहुत दुखी हुए और उन्होंने घर छोड़ दिया। वह कानपुर से काशी चले गए और 13 साल की उम्र में उन्होंने ब्रह्मचारी बनने का फैसला किया और उन्हें 'आर्यन ब्रह्मचारी' नाम दिया गया। वहां करीब 15 महीने रहने के बाद उन्होंने गुरु गौरी शरण महाराज से दीक्षा ली और फिर वह मथुरा आ गए।


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