आज के दौर में हर व्यक्ति किसी न किसी वजह से दुखी और चिंतित है। कई लोगों को अपने भविष्य की चिंता होती है, तो कई लोगों को अपने घर-परिवार की चिंता होती है। यानी हर व्यक्ति को अपने जीवन से जुड़ी चीजों को लेकर चिंता होती है। चिंता एक ऐसा भाव है, जिससे व्यक्ति खुद को नियंत्रित नहीं रख पाता है। इसी चिंता और दुख से मुक्ति पाने के लिए अष्टावक्र गीता में बेहद खास बात बताई गई है। अष्टावक्र गीता में बताया गया है कि दुख और चिंता व्यक्ति को नहीं होते हैं, बल्कि ये केवल व्यक्ति के मन के भाव हैं, जिनसे आसानी से मुक्ति पाई जा सकती है।
सनातन धर्म में ऐसे कई ग्रंथ हैं, जिन्हें पढ़कर व्यक्ति अपने मन के भावनाओं पर विजय पा सकता है। इसके साथ ही जीवन की चुनौतियों पर विजय पा सकता है। इसी प्रकार अष्टावक्र गीता भी एक ऐसा ग्रंथ है, जो व्यक्ति को जीवन की कई समस्याओं से निपटने के उपाय बताता है। अष्टावक्र गीता में 21 प्रकरण और 302 श्लोक हैं। इस ग्रंथ में ऋषि अष्टावक्र द्वारा बताई गई बातें बताई गई हैं। अब सवाल उठता है कि दुख और चिंता को लेकर ऋषि अष्टावक्र ने क्या बताया है।
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चिंता और दुख केवल मन के भाव
लोग अक्सर बोलते हैं, मैं दुखी हूं या मुझे चिंता है। इसी को लेकर अष्टावक्र ने बताया कि व्यक्ति कभी दुखी नहीं होता, बल्कि यह केवल व्यक्ति के क्षणिक भाव हैं। इसी को लेकर एक बार ऋषि अष्टावक्र मिथिला के राजा जनक से बोले थे। तब अष्टावक्र ने कहा था कि दुनिया में जो कुछ भी आता और जाता है, वह आप नहीं हैं। दुख आता है, चिंता आती है, सुख भी आता है। इसका मतलब है कि दुख-सुख मन के भाव हैं। जब व्यक्ति दुखी महसूस करता है, तब उसकी अंतरात्मा या चेतना दुखी नहीं होती है। व्यक्ति की आत्मा केवल इस मन के भीतर बैठकर देखती है।
धर्माधर्मौ सुखं दुःखं मानसानि न ते विभो।
न कर्तासि न भोक्तासि मुक्त एवासि सर्वदा॥
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इस श्लोक का अर्थ है कि धर्म-अधर्म, सुख-दुख, ये सब मन के भाव हैं। यह सब व्यक्ति नहीं है। व्यक्ति न कर्ता है, न भोक्ता है। तुम तो हमेशा इन भावों से मुक्त हो।
इस श्लोक के जरिए अष्टावक्र जी ने राजा जनक को समझा दिया कि व्यक्ति चिंतित है और व्यक्ति के मन में चिंता चल रही है, इन दोनों के बीच फर्क है। व्यक्ति अक्सर अपने भावनाओं को खुद से जोड़ लेता है। तब अष्टावक्र इस जुड़ाव को तोड़ते हैं। यानी जिस तरह आसमान में बादल आते हैं, गरजते हैं, बरसते हैं और चले जाते हैं, पर आकाश न भीगता है, न बिगड़ता है। इसी प्रकार व्यक्ति के मन में दुख और चिंता आते हैं, लेकिन इससे व्यक्ति की चेतना पर कोई बदलाव नहीं होता है।
दुखों से मुक्ति का मार्ग
अष्टावक्र गीता ग्रंथ में बताया गया है कि व्यक्ति न आसमान है, न अग्नि, न हवा और न ही जल है। व्यक्ति केवल इन सबको देख सकता है। इसी तरह व्यक्ति सुखी या दुखी नहीं है। वह अपने मन के सुख या दुख को देखता है, न कि वह खुद दुखी है।
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अगर व्यक्ति को अपने दुखों से मुक्ति चाहिए, तो उसे शरीर, मन और चेतना को अलग-अलग समझना चाहिए। व्यक्ति का शरीर क्षणिक है, जो आज है और कल नहीं होगा, जबकि व्यक्ति की आत्मा या चेतना अमर है, जो संसार के सभी बंधनों से मुक्त है। इसी तरह व्यक्ति को क्षण भर के सुख-दुख की भावनाओं से मुक्त होना चाहिए। अष्टावक्र ग्रंथ की सीख हमें यह नहीं सिखाती कि व्यक्ति को अपने भावों को नकारना चाहिए। इसके बजाय व्यक्ति को अपने भावों को पूरी तरह महसूस करना चाहिए, लेकिन उन भावों में बंधना नहीं चाहिए।