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अंग्रेज अधिकारी का सपना और स्वंयभू मूर्ति..., डाट काली मंदिर की कहानी क्या है?

देहरादून का मां डाट काली मंदिर सुर्खियों में है। इस मंदिर का नाम पहले मां दंतकाली था, जो अंग्रेजों की वजह से बदलकर डाट काली मंदिर हो गया। इस मंदिर का इतिहास और रहस्य समझिए।

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मां डाट काली मंदिर, Photo Credit- Social media

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देवभूमि उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में मां डाट काली मंदिर स्थित है, जो अपनी अलौकिक कृपा और अनोखी वास्तुकला के लिए जाना जाता है। इस समय यह मंदिर इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मां डाट काली मंदिर में दर्शन करने गए थे। डाट काली मंदिर में मां काली की पूजा-अर्चना की जाती है। पौराणिक कथाओं के मुताबिक पहले इस मंदिर का नाम दंतकाली मंदिर था, जो अंग्रेजों के शासन काल में बदल गया।


इस मंदिर की अपार महिमा के कारण बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां दर्शन करने आते हैं। माना जाता है कि यह मंदिर देहरादून के सबसे पुराने मंदिरों में से एक है। इस मंदिर की सबसे खास बात यह है कि जितनी सुंदर इसकी बनावट है उतना ही सुंदर इसका आसपास का इलाका भी है। मंदिर हरे-भरे पेड़ों के बीच स्थित है। अब सवाल उठता है कि मां डाट काली मंदिर का नाम अंग्रेजों की वजह से क्यों बदला गया और इसका रहस्यमयी इतिहास क्या है।

 

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क्यों बदला मंदिर का नाम?


मां डाट काली मंदिर के नाम के पीछे बेहद दिलचस्प कहानी है। इस मंदिर की स्थापना 1804 में हुई थी, जब पूरे देश में अंग्रेजों का शासन था। स्थापना के समय मंदिर का नाम दंतकाली रखा गया था क्योंकि यहां मां काली के रौद्र रूप की पूजा की जाती है। इस रूप में मां काली के दांत दिखाई देते हैं, इसी वजह से इसका नाम दंतकाली रखा गया था।


अंग्रेज अफसर इस नाम का सही उच्चारण नहीं कर पाते थे और 'दंतकाली' की जगह 'डाटकाली' बोलते थे। धीरे-धीरे डाटकाली नाम इतना प्रचलित हो गया कि आगे चलकर मंदिर का नाम ही डाटकाली पड़ गया। इसी वजह से आज भी इस मंदिर को डाट काली मंदिर के नाम से जाना जाता है।

 

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मंदिर का इतिहास क्या है?


डाट काली मंदिर देहरादून और सहारनपुर की सीमा पर स्थित है। इस मंदिर के निर्माण के पीछे एक खास कहानी है। दरअसल, साल 1804 में देहरादून और सहारनपुर को जोड़ने के लिए एक हाईवे बनाया जा रहा था लेकिन निर्माण कार्य में इंजीनियरों को कई समस्याओं का सामना करना पड़ रहा था।


इन्हीं इंजीनियरों में से एक को मां काली का सपना आया, मां ने उस स्थान पर मंदिर बनाने का आदेश दिया। अगली सुबह इंजीनियर को हाईवे के पास मां काली की एक मूर्ति मिली। उसने यह मूर्ति स्थानीय महंत सुखवीर गुसाईं को सौंप दी। इसके बाद महंत गुसाईं ने वहां मंदिर का निर्माण करवाया। मान्यता है कि जैसे ही मंदिर का निर्माण पूरा हुआ, हाईवे का काम भी बिना किसी बाधा के सफलतापूर्वक पूरा हो गया। तभी से इस मंदिर को चमत्कारी और सिद्ध स्थल माना जाता है।

 

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कैसे जाएं मां डाट काली मंदिर?


मां डाट काली मंदिर के दर्शन करने के लिए श्रद्धालुओं को ट्रेन, बस या एरोप्लेन से देहरादून पहुंचना होगा। देहरादून से यह मंदिर लगभग 12 किलोमीटर दूर है। वहां पहुंचने के बाद श्रद्धालु आसानी से बस या कार के जरिए से मंदिर तक पहुंच सकते हैं।

 

डिस्क्लेमर: यह लेख धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है। इसकी पुष्टि नहीं की जाती है।

 

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