भारतीय पुराणों में वर्णित शुक्राचार्य से जुड़ी कथा हमेशा चर्चा में रहती है, जिसमें बताया गया है कि किस तरह भगवान विष्णु के वामन अवतार के दौरान असुर गुरु शुक्राचार्य की एक आंख नष्ट हो गई थी। यह प्रसंग न केवल देव–असुर संघर्ष से जुड़ा है, बल्कि गुरु-शिष्य परंपरा, दान की मर्यादा और धर्म-अधर्म के टकराव को भी उजागर करता है। राजा बलि के यज्ञ, तीन पग भूमि के वरदान और भगवान की लीला से जुड़ी यह कथा आज भी लोगों को यह संदेश देती है कि अहंकार और पक्षपात जब विवेक पर हावी हो जाते हैं, तो सबसे बड़े ज्ञानी को भी परिणाम भुगतने पड़ते हैं।
शुक्राचार्य को असुरों का गुरु (गुरु शुक्र) कहा जाता है। वह महर्षि भृगु के पुत्र थे और महान तपस्वी, ज्योतिषाचार्य और विद्वान माने जाते थे। शुक्राचार्य को संजीवनी विद्या का ज्ञान था, जिससे वह मरे हुए असुरों को दोबारा जीवित कर सकते थे। इसी वजह से देवताओं और असुरों के युद्ध में असुर बार-बार हारने के बाद भी फिर शक्तिशाली हो जाते थे।
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भगवान ने शुक्राचार्य की आंख क्यों फोड़ी – कथा
यह प्रसंग वामन अवतार से जुड़ा हुआ है। असुर राजा बलि बहुत शक्तिशाली हो गए थे और तीनों लोकों पर अधिकार करना चाहते थे। देवताओं की रक्षा के लिए भगवान विष्णु ने वामन ब्राह्मण का रूप धारण किया और बलि के यज्ञ में पहुंचे।
वामन ने बलि से केवल तीन पग भूमि दान में मांगी। राजा बलि तुरंत दान देने को तैयार हो गए लेकिन शुक्राचार्य ने अपनी दिव्य दृष्टि से पहचान लिया कि यह कोई साधारण ब्राह्मण नहीं बल्कि स्वयं भगवान विष्णु हैं। उन्होंने बलि को दान देने से रोकने का प्रयास किया।
जब बलि ने गुरु की बात नहीं मानी, तो शुक्राचार्य ने यज्ञ के कमंडलु (जल पात्र) की टोंटी में अपना रूप छोटा कर प्रवेश कर लिया, जिससे जलधारा रुक जाए और दान पूरा न हो सके। वामन रूप में भगवान विष्णु ने यह जान लिया और पास रखी कुशा (घास) या दर्भ से कमंडलु की टोंटी को साफ किया।
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इसी दौरान कुशा शुक्राचार्य की एक आंख में चुभ गई और उनकी एक आंख नष्ट हो गई। तभी से उन्हें एकाक्षी शुक्राचार्य कहा जाने लगा।
आंख फूटने का आध्यात्मिक अर्थ
यह घटना केवल शारीरिक चोट नहीं बल्कि एक गहरे प्रतीक को दर्शाती है। शुक्राचार्य असुरों के हित की वजह से धर्म से हटकर सोच रहे थे। उनकी एक आंख का नष्ट होना यह दर्शाता है कि जब बुद्धि पर अहंकार और पक्षपात हावी हो जाता है, तो विवेक की दृष्टि कमजोर हो जाती है।
शुक्राचार्य की महानता
आंख खोने के बावजूद शुक्राचार्य की विद्या, तप और ज्ञान कम नहीं हुआ। वह नवग्रहों में शुक्र ग्रह के अधिष्ठाता बने और आज भी वैदिक ज्योतिष में उन्हें वैभव, सुख, ऐश्वर्य और कला का कारक माना जाता है।