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दरगाहों पर चादर क्यों चढ़ाते हैं, कब से शुरू हुई है यह प्रथा?

दरगाह पर हर धर्म के लोग चादर चढ़ाते नजर आते हैं। क्या आपको पता है कि दरगाह पर चादर क्यों चढ़ाई जाती है और यह परंपरा कब शुरू हुई, आइए जानते हैं इसकी पूरी कहानी क्या है?

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प्रतीकात्मक तस्वीर: Photo Credit: AI

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देशभर में स्थित दरगाहों पर चादर क्यों चढ़ाते हैं, इसको लेकर लोगों के मन में हमेशा सवाल बने रहते हैं। अजमेर शरीफ से लेकर निजामुद्दीन दरगाह तक, हर रोज हजारों श्रद्धालु मजारों पर चादर पेश कर अमन, चैन और मन्नतों की दुआ मांगते नजर आते हैं। सूफी संतों से जुड़ी यह सदियों पुरानी परंपरा सिर्फ धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत की साझा संस्कृति और भाईचारे की पहचान भी मानी जाती है। 

 

उर्स और खास मौकों पर चादरपोशी की रस्म को लेकर लोगों में खास उत्साह देखने को मिलता है, जहां धर्म और जाति से ऊपर उठकर श्रद्धालु एक साथ सिर झुकाते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि दरगाहों पर चादर क्यों चढ़ाई जाती है, इसकी शुरुआत कब हुई और इसके पीछे की मान्यताएं क्या हैं।

 

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दरगाहों पर चादर क्यों चढ़ाते हैं

दरगाह किसी महान सूफी संत या वली अल्लाह की मजार होती है। चादर चढ़ाना उस संत के प्रति श्रद्धा, सम्मान और आस्था प्रकट करने का तरीका है। माना जाता है कि सूफी संतों ने अपना पूरा जीवन मानवता, प्रेम, ईश्वर भक्ति और सेवा में बिताया। उनकी मजार पर चादर चढ़ाकर लोग उनसे दुआ, बरकत और रहमत की उम्मीद करते हैं। यह भावना होती है कि संत अल्लाह के करीबी होते हैं और उनकी दुआएं अल्लाह तक जल्दी पहुंचती हैं।

यह परंपरा कब से शुरू हुई

दरगाहों पर चादर चढ़ाने की परंपरा मध्यकालीन भारत में सूफी सिलसिलों के फैलने के साथ प्रचलित हुई। लगभग 12वीं–13वीं शताब्दी से, जब ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती, निजामुद्दीन औलिया, कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी जैसे सूफी संतों की दरगाहें प्रसिद्ध होने लगीं, तभी से यह प्रथा मजबूत हुई। मुगल काल में इस परंपरा को शाही संरक्षण मिला, जिससे चादर चढ़ाने की रस्म और ज्यादा व्यापक हो गई।

 

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इसके पीछे की वजह क्या है

चादर चढ़ाने के पीछे मुख्य वजह आदर और विनम्रता है। जिस तरह किसी सम्मानित व्यक्ति को ढककर सम्मान दिया जाता है, उसी तरह मजार को चादर से ढकना श्रद्धा का प्रतीक माना जाता है। साथ ही, यह भी माना जाता है कि चादर चढ़ाने से व्यक्ति की मन्नत कबूल होती है और उसके दुख-दर्द दूर होते हैं। कई लोग अपनी मनोकामना पूरी होने पर धन्यवाद स्वरूप चादर चढ़ाते हैं।

इसके पीछे की मान्यता क्या है

मान्यता है कि सूफी संत मृत्यु के बाद भी रूहानी रूप से जीवित रहते हैं और अपने भक्तों की पुकार सुनते हैं। चादर चढ़ाना इस विश्वास का प्रतीक है कि संत अल्लाह की बारगाह में सिफारिश कर सकते हैं। हरी या लाल रंग की चादर को विशेष रूप से शुभ माना जाता है। हरा रंग इस्लाम में पवित्रता और जन्नत का प्रतीक है, जबकि लाल रंग प्रेम और बलिदान को दर्शाता है।

चादर के साथ दुआ और फातिहा

चादर चढ़ाते समय लोग फातिहा पढ़ते हैं और अल्लाह से दुआ मांगते हैं। माना जाता है कि इस मौके पर मांगी गई दुआ जल्द कबूल होती है। कुछ दरगाहों पर खास मौकों, जैसे उर्स के दौरान, सामूहिक रूप से चादर चढ़ाई जाती है, जिसे 'चादरपोशी' कहा जाता है।

समग्र रूप में महत्व

दरगाह पर चादर चढ़ाना हिंदू-मुस्लिम दोनों समुदायों में प्रचलित है, जो गंगा-जमुनी तहजीब और सांझी संस्कृति का प्रतीक है। यह परंपरा बताती है कि सूफी परंपरा में धर्म से ज्यादा मानवता, प्रेम और आपसी सौहार्द को महत्व दिया गया है।

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