भारत की प्राचीन आध्यात्मिक परंपराओं में भगवान शिव को केवल संहारकर्ता या योगी के रूप में ही नहीं, बल्कि समस्त जीव-जंतुओं के स्वामी ‘पशुपतिनाथ’ के रूप में भी पूजा जाता है। शास्त्रों और पुराणों में वर्णित कथाओं के अनुसार, महादेव ने समय-समय पर धर्म की रक्षा, अहंकार के अंत और सृष्टि के संतुलन के लिए मानव रूप के साथ-साथ पशु और पशु-सदृश अवतार भी धारण किए।
नंदी से लेकर शरभ और भैरव तक, भगवान शिव के ये रूप न केवल धार्मिक आस्था से जुड़े हैं, बल्कि प्रकृति, करुणा और समरसता का गहरा संदेश भी देते हैं। आज जब पर्यावरण संरक्षण और जीवों के प्रति संवेदनशीलता जैसे विषय वैश्विक चिंता बने हुए हैं, तब शिव के पशु अवतारों से जुड़ी कथाएं एक बार फिर प्रासंगिक हो उठी हैं, जो यह बताती हैं कि भारतीय संस्कृति में हर जीव को ईश्वर का अंश माना गया है और यही सनातन सोच की सबसे बड़ी शक्ति रही है।
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नंदी के रूप में (बैल अवतार)
कब: सृष्टि के प्रारंभिक काल में
क्यों: धर्म और शक्ति के संतुलन के लिए
नंदी केवल शिव जी का वाहन नहीं हैं, बल्कि उन्हें शिव का अंशावतार भी माना जाता है। नंदी धर्म, धैर्य और सेवा का प्रतीक हैं। शिव ने बैल रूप इसलिए स्वीकार किया जिससे यह बताया जा सके कि सेवा, शक्ति और विनम्रता ही सच्ची भक्ति है। नंदी शिवभक्ति की चरम अवस्था का प्रतीक हैं।
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शरभ अवतार (आधा सिंह, आधा पक्षी)
कब: नरसिंह अवतार के बाद
क्यों: विष्णु के उग्र रूप को शांत करने के लिए
जब हिरण्यकश्यप वध के बाद भगवान विष्णु का नरसिंह रूप बहुत उग्र हो गया और सृष्टि पर संकट आने लगा, तब शिव ने शरभ नामक अद्भुत पशु-पक्षी रूप धारण किया। इस अवतार का उद्देश्य यह संदेश देना था कि संहार के बाद शांति भी आवश्यक है।
कीर्ति मुख (भयानक पशु मुख)
कब: जालंधर असुर के समय
क्यों: अहंकार और लालच के नाश के लिए
कीर्ति मुख को शिव ने अपने क्रोध से उत्पन्न किया था। यह एक भयावह पशु-मुख था, जिसने अंत में स्वयं को ही खा लिया। शिव जी ने इसे द्वारपाल बनाया। इसका अर्थ है, अहंकार अंत में स्वयं का ही विनाश करता है।
भैरव (कुत्ते से जुड़ा रूप)
कब: ब्रह्मा के पंचम सिर के दंड के समय
क्यों: अधर्म के दंड और नियम स्थापना के लिए
कालभैरव शिव का उग्र रूप हैं, जिनका वाहन कुत्ता है। कुत्ता सतर्कता, निष्ठा और समय का प्रतीक है। शिव ने यह रूप इसलिए लिया, जिससे यह बताया जा सके कि समय और मृत्यु पर भी नियंत्रण संभव है।
पिप्पलाद कथा में पशु-सदृश तपस्वी रूप
कब: पिप्पलाद ऋषि की परीक्षा के समय
क्यों: सच्चे ज्ञान और वैराग्य की परीक्षा के लिए
कई कथाओं में शिव पशु-सदृश, वनवासी और विक्षिप्त योगी के रूप में प्रकट हुए। इसका उद्देश्य यह था कि बाहरी रूप नहीं, बल्कि आंतरिक भाव ही भक्ति का मापदंड है।
वन्य पशुओं के स्वामी के रूप में (पशुपति अवतार)
कब: वैदिक काल से निरंतर
क्यों: सभी जीवों में ईश्वर की उपस्थिति दिखाने के लिए
शिव को पशुपति कहा गया क्योंकि वह केवल मनुष्य ही नहीं, बल्कि हर जीव, हर पशु, हर प्राणी के ईश्वर हैं। उन्होंने पशु रूप इसलिए स्वीकार किया जिससे यह संदेश जाए कि जीवन का कोई भी रूप तुच्छ नहीं है।
महादेव ने पशु अवतार क्यों लिए?
- अहंकार और अधर्म का नाश करने के लिए
- भक्तों की परीक्षा लेने के लिए
- यह दिखाने के लिए कि ईश्वर हर रूप में मौजूद है
- प्रकृति और जीवों के साथ सामंजस्य का संदेश देने के लिए
- शक्ति और करुणा का संतुलन समझाने के लिए