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नर्मदा नदी के अवतार की कथा क्या है?

भारत की पवित्र नदियों में से एक नर्मदा नदी अपनी उत्पत्ति की कथा और वेग की वजह से पूरे देश में मशहूर है। आइए जानते हैं नर्मदा नदी की उत्पत्ति किस तरह से हुई है।

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प्रतीकात्मक तस्वीर: Photo Credit: AI

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भारत की पवित्र नदियों में विशेष स्थान रखने वाली मां नर्मदा की उत्पत्ति को लेकर हमेशा लोगों के मन में प्रश्न बने रहते हैं। मध्य प्रदेश के अमरकंटक से निकलने वाली इस प्राचीन नदी की उत्पत्ति, उससे जुड़ी पौराणिक कथाएं और धार्मिक मान्यताएं लोगों की जिज्ञासा का विषय बनी रहती हैं। नर्मदा को भगवान शिव से उत्पन्न माना जाता है और इसे मोक्षदायिनी नदी का दर्जा प्राप्त है। 

 

यही वजह है कि देशभर से श्रद्धालु नर्मदा के दर्शन, स्नान और परिक्रमा के लिए पहुंचते हैं। धार्मिक ग्रंथों से लेकर लोक आस्था तक, नर्मदा की उत्पत्ति की कथा भारतीय संस्कृति की गहराई को दर्शाती है। ऐसे में नर्मदा नदी के जन्म, उसके पीछे की मान्यताओं और इसके धार्मिक महत्व को जानना आज भी लोगों के लिए उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना सदियों पहले था।

 

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नर्मदा नदी की उत्पत्ति कहां से हुई

नर्मदा नदी का उद्गम मध्य प्रदेश के अमरकंटक पर्वत से हुआ है। अमरकंटक विंध्य और सतपुड़ा पर्वत श्रृंखलाओं का संगम स्थल है। यहीं स्थित नर्मदा कुंड को नर्मदा नदी का जन्म स्थान माना जाता है। यह नदी लगभग 1312 किलोमीटर की यात्रा तय करते हुए पश्चिम दिशा में बहती है और अंत में गुजरात के भरूच के पास अरब सागर में मिल जाती है। भारत की अधिकांश नदियां पूर्व की ओर बहती हैं लेकिन नर्मदा पश्चिम की ओर बहने वाली प्रमुख नदियों में से एक है।

नर्मदा नदी की पौराणिक उत्पत्ति कथा

पुराणों के अनुसार, नर्मदा नदी की उत्पत्ति भगवान शिव से जुड़ी हुई है। कहा जाता है कि एक समय भगवान शिव गहन तपस्या में लीन थे। उनकी कठोर तपस्या और ध्यान के दौरान उनके शरीर से जो पसीने की बूंद गिरी, उसी से नर्मदा नदी का जन्म हुआ। इसी वजह से नर्मदा को शिव की पुत्री भी कहा जाता है।

 

एक अन्य कथा के अनुसार, जब पृथ्वी पर पाप और अधर्म बढ़ने लगा, तब देवताओं ने भगवान शिव से प्रार्थना की कि वह पृथ्वी को शुद्ध करने के लिए कोई उपाय करें। तब भगवान शिव के तप से एक दिव्य जलधारा प्रकट हुई, जो आगे चलकर नर्मदा नदी बनी। इसीलिए मान्यता है कि नर्मदा में स्नान करने से पाप नष्ट हो जाते हैं और किसी विशेष पर्व की आवश्यकता नहीं होती।

 

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नर्मदा और रेवा नाम की कथा

नर्मदा को रेवा भी कहा जाता है। पुराणों में वर्णन है कि नर्मदा नदी बहुत चंचल और वेगवान रूप में बहती थीं। उनके प्रवाह की ध्वनि 'रे-रे' जैसी प्रतीत होती थी, इसी वजह से उनका एक नाम रेवा पड़ा। कई प्राचीन ग्रंथों और स्तोत्रों में नर्मदा को रेवा नाम से ही संबोधित किया गया है।

नर्मदा और गंगा का प्रसंग

एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार, एक बार गंगा को अपने पवित्र होने पर अभिमान हो गया। तब भगवान शिव ने कहा कि नर्मदा का केवल दर्शन ही मनुष्य को पुण्य दे देता है, जबकि गंगा में स्नान करना पड़ता है। इस कथा से नर्मदा की महिमा और ज्यादा बढ़ जाती है। कहा जाता है, 'नर्मदा दर्शनात् पुण्यम्, गंगा स्नानात्' अर्थात नर्मदा के दर्शन मात्र से वही पुण्य मिलता है जो गंगा स्नान से मिलता है।

धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व

नर्मदा को मोक्षदायिनी नदी माना गया है। इसके दोनों तटों पर असंख्य तीर्थ, आश्रम और शिव मंदिर स्थित हैं। नर्मदा परिक्रमा की परंपरा हजारों वर्षों से चली आ रही है, जिसमें श्रद्धालु पैदल पूरी नदी की परिक्रमा करते हैं। यह यात्रा आत्मशुद्धि और साधना का प्रतीक मानी जाती है।


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