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श्रीमद्भागवत पुराण में बार-बार क्यों आता है शुकदेव मुनि का नाम?

हिंदू धर्म में सबसे पवित्र ग्रंथ श्रीमद्भागवत पुराण को माना जाता है। इस पुराण में शुक उवाच शब्द बार-बार आता है, आइए जानते हैं इस शब्द का महत्व क्या है और भागवत में इसका इस्तेमाल इतनी बार क्यों हुआ है।

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प्रतीकात्मक तस्वीर: AI

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श्रीमद्भागवत पुराण जैसे दिव्य ग्रंथ में शुकदेव मुनि का नाम बार-बार क्यों आता है, यह सवाल अक्सर श्रद्धालुओं और धर्म में रुचि रखने वाले लोगों के मन में उठता है। शुकदेव मुनि केवल एक ऋषि या कथावाचक नहीं थे, बल्कि वह भागवत ज्ञान की जीवंत परंपरा के प्रतीक माने जाते हैं। यह वही महापुरुष थे जिनके मुख से श्रीकृष्ण की अमृतमयी कथा पहली बार पृथ्वी पर विस्तार से प्रकट हुई। राजा परीक्षित को सात दिनों तक सुनाई गई यही कथा आगे चलकर श्रीमद्भागवत पुराण के रूप में जानी गई।

 

आज भी भागवत कथा के हर आयोजन में 'शुक उवाच' का उच्चारण इस बात की याद दिलाता है कि यह ग्रंथ केवल शब्दों का संग्रह नहीं, बल्कि वैराग्य, भक्ति और ब्रह्मज्ञान से उपजा दिव्य उपदेश है। शुकदेव मुनि का बार-बार उल्लेख इस बात का संकेत है कि भागवत पुराण का मूल उद्देश्य केवल कथा कहना नहीं, बल्कि मनुष्य को जीवन के अंतिम सत्य से जोड़ना है।

 

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शुकदेव मुनि का महत्व क्यों है

श्रीमद्भागवत पुराण केवल एक ग्रंथ नहीं, बल्कि भक्ति, ज्ञान और वैराग्य का जीवंत स्वरूप है। इस ग्रंथ को सुनाने के लिए ऐसे वक्ता की आवश्यकता थी जो सांसारिक बंधनों से पूरी तरह मुक्त हो, जिसका मन केवल भगवान श्रीकृष्ण में लीन हो। शुकदेव मुनि ऐसे ही महापुरुष थे। वह जन्म से ही परम वैरागी थे और उन्हें संसार के सुख-दुख, मान-अपमान, मोह-माया से कोई लगाव नहीं था। इसी शुद्धता की वजह से वह भागवत कथा के योग्य माने गए।

शुकदेव मुनि कौन थे?

शुकदेव मुनि महर्षि वेदव्यास के पुत्र थे। वेदव्यास वही महान ऋषि हैं जिन्होंने वेदों का विभाजन किया, महाभारत की रचना की और 18 महापुराणों की रचना या संकलन किया। शुकदेव मुनि का जन्म अत्यंत दिव्य माना जाता है। कहा जाता है कि वह गर्भ से ही ज्ञानी थे और जन्म लेते ही संसार का त्याग कर वन की ओर चले गए थे।

 

उनका नाम 'शुक'इसलिए पड़ा क्योंकि वह तोते (शुक पक्षी) की तरह मुक्त और निर्लेप थे। जैसे तोता फल को बिना नुकसान पहुंचाए खा लेता है, वैसे ही शुकदेव मुनि संसार में रहते हुए भी उससे प्रभावित नहीं होते थे।

 

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राजा परीक्षित और भागवत कथा

श्रीमद्भागवत पुराण की कथा राजा परीक्षित से जुड़ी है। राजा परीक्षित को एक ऋषि के शाप की वजह से सात दिन में मृत्यु का वरदान मिला था। मृत्यु से पहले उन्होंने यह जानना चाहा कि मनुष्य को अंतिम समय में क्या करना चाहिए। तब सभी ऋषियों ने शुकदेव मुनि को बुलाया क्योंकि वह ही इस प्रश्न का सही उत्तर दे सकते थे।

 

शुकदेव मुनि ने सात दिनों तक राजा परीक्षित को श्रीकृष्ण की कथा सुनाई। यही कथा आगे चलकर श्रीमद्भागवत पुराण के रूप में प्रसिद्ध हुई। इसलिए भागवत में बार-बार 'शुक उवाच' यानी 'शुकदेव मुनि बोले' आता है।

शुकदेव मुनि की विशेषताएं

शुकदेव मुनि पूर्ण ब्रह्मज्ञानी थे। उन्हें न किसी वस्त्र की चिंता थी, न भोजन की, न समाज की मान्यताओं की। वह जहां भी जाते, केवल भगवान का नाम और उनकी लीलाओं का चिंतन करते। उनका जीवन यह सिखाता है कि सच्चा ज्ञान वही है जो मनुष्य को अहंकार, भय और मोह से मुक्त कर दे।

भागवत में शुकदेव मुनि की भूमिका

भागवत पुराण में शुकदेव मुनि केवल कथावाचक नहीं हैं, बल्कि वह भक्ति के जीवंत उदाहरण हैं। वह बताते हैं कि मोक्ष का मार्ग ज्ञान से नहीं, बल्कि निष्काम भक्ति से होकर जाता है। उनका हर उपदेश यही दर्शाता है कि भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण ही जीवन का अंतिम लक्ष्य है।


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