आज के दौर में लाखों लोग मानते हैं कि वही व्यक्ति धार्मिक है, जो पूजा-पाठ और धार्मिक कर्मकांड करता है। जबकि सनातन धर्म के ग्रंथों में बताया गया है कि कर्म ही धर्म है। भगवद्गीता के छठे अध्याय में श्रीकृष्ण ने बताया कि व्यक्ति को कर्म करते रहना चाहिए। कर्म न करना भी अधर्म है। इसी वजह से व्यक्ति को अपने जीवन में कर्म करते रहना चाहिए। इसके साथ ही गीता में लिखा है कि व्यक्ति को जीवन सुधारने के लिए आलस त्यागना चाहिए।
सनातन धर्म में भगवद्गीता को बेहद महत्वपूर्ण ग्रंथ माना जाता है। इस ग्रंथ को पढ़ने से व्यक्ति को जीवन का मार्ग मिलता है। साथ ही वह जीवन की चुनौतियों से निपट सकता है। अब सवाल उठता है कि भगवद्गीता में कर्म को लेकर क्या बताया गया है?
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क्यों जरूरी है कर्म करना
भगवद्गीता में श्रीकृष्ण ने बताया कि व्यक्ति को अपना कर्म करते रहना चाहिए। साथ ही श्रीकृष्ण ने कहा है कि व्यक्ति एक पल भी कर्म किए बिना नहीं रह सकता है। व्यक्ति को कर्म के फल की चिंता नहीं करनी चाहिए। कर्म के जरिए व्यक्ति को फल मिल पाएगा, बिना कर्म किए व्यक्ति को फल नहीं मिल सकता है।
न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।
कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः।।
इसका मतलब है कि कोई भी व्यक्ति क्षणभर भी बिना कर्म किए नहीं रह सकता। व्यक्ति की प्रकृति ऐसी है कि वह कर्म करता रहे। इस वजह से व्यक्ति को कर्म करते रहना चाहिए।इसके साथ ही कर्म को लेकर श्रीकृष्ण ने बताया है कि व्यक्ति के पास केवल कर्म करने का अधिकार है। इस वजह से कर्म के फल की उम्मीद से कर्म नहीं करना चाहिए।
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि।।
इसका मतलब है कि व्यक्ति का अधिकार केवल कर्म करने में है, उसके फल में कभी नहीं। न फल की इच्छा से कर्म करें और न ही कर्म न करने में आसक्ति रखें। फल की चिंता ही मनुष्य को भय, लोभ और मानसिक बंधन में डालती है, जबकि कर्म करना उसके हाथ में है।
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कर्म से ही चलती है दुनिया
भगवद्गीता में बताया गया है कि व्यक्ति का कर्म करना केवल एक व्यक्तिगत जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि यह सृष्टि के संतुलन का आधार भी है। अगर हर व्यक्ति कर्म नहीं करेगा, तो यह दुनिया ही नहीं चल पाएगी।
सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः।
अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक्।।
इसका मतलब है कि कर्म को यज्ञ यानी धर्म माना गया है। जब मनुष्य निःस्वार्थ भाव से अपना कर्तव्य निभाता है, तो वह समाज और सृष्टि के चक्र को चलाए रखता है। इसलिए कहा जाता है कि व्यक्ति को स्वार्थरहित होकर कर्म करते रहना चाहिए।