बसंत पंचमी, जिसे सरस्वती पूजा भी कहा जाता है, शरद ऋतु के समाप्त होने और बसंत ऋतु के आगमन का संकेत मानी जाती है। हिंदू धर्म में कई ऐसे पर्व होते हैं जिनकी तिथि को लेकर लोगों के मन में भ्रम बना रहता है। इसी तरह इस वर्ष भी बसंत पंचमी को लेकर यह सवाल उठ रहा है कि इसे 23 जनवरी को मनाया जाए या 24 जनवरी को। पंचांग के अनुसार, इस वर्ष बसंत पंचमी का पर्व 23 जनवरी को ही मनाना शास्त्रसम्मत माना गया है।
हिंदू पंचांग के अनुसार, माघ महिने के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि का आरंभ 22 जनवरी 2026 को शाम 6:15 बजे हो रहा है। हालांकि, पंचमी तिथि का सूर्योदय 23 जनवरी को होगा।
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तारीख को लेकर कन्फ्यूजन क्यों?
शास्त्रों में ‘उदया तिथि’ को मान्यता दी जाती है, यानी जिस तिथि का सूर्योदय होता है, उसी दिन पर्व मनाया जाता है। पंचमी तिथि का समापन 24 जनवरी को रात 01:46 बजे होगा। 24 जनवरी को सूर्योदय के समय षष्ठी तिथि प्रारंभ हो जाएगी। इसी कारण सरस्वती पूजा के लिए 23 जनवरी, शुक्रवार का दिन ही सबसे उत्तम माना गया है। इस दिन छात्र-छात्राएं अपनी पुस्तकों, पेन और अध्ययन से जुड़ी अन्य सामग्री की पूजा कर ज्ञान की देवी मां सरस्वती का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।
बसंत पंचमी का शुभ मुहूर्त
मां सरस्वती की पूजा के लिए सुबह का समय सबसे शुभ माना जाता है। 23 जनवरी को सरस्वती पूजा का शुभ मुहूर्त सुबह 7:13 से दोपहर 12:33 बजे तक रहेगा। इस दौरान सबसे उत्तम समय सुबह 9:53 से 11:13 बजे तक होगा, जिसे अमृत चौघड़िया कहा जाता है। वहीं, अभिजीत मुहूर्त इस दिन दोपहर 11:50 से 12:40 बजे तक रहेगा। इसके अलावा, विद्या आरंभ और अक्षर अभ्यास के लिए सुबह 8:33 से 11:13 बजे तक का समय सबसे श्रेष्ठ और फलदायी माना गया है।
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पर्व का महत्व और दुर्लभ संयोग
इस बार की बसंत पंचमी बेहद खास है क्योंकि इस दिन 'गजकेसरी योग' और 'बुधादित्य योग' जैसे दुर्लभ संयोग बन रहे हैं। चंद्रमा का गोचर मीन राशि में होने और गुरु की नजर पड़ने से बना यह संयोग छात्रों और कला-संगीत से जुड़े लोगों के लिए अत्यंत लाभकारी सिद्ध होगा।
बसंत पंचमी को 'अबूझ मुहूर्त' भी कहा जाता है जिसका अर्थ है कि इस दिन कोई भी शुभ कार्य जैसे विवाह, मुंडन या गृह प्रवेश, बिना पंचांग देखे किया जा सकता है। इसी दिन से वसंत ऋतु का आगमन माना जाता है, इसलिए पीले रंग के कपड़े पहनने और पीले रंग के भोजन का भोग लगाने की परंपरा है।
नोट: इस खबर में लिखी गई बातें धार्मिक और स्थानीय मान्यताओं पर आधारित हैं। हम इसकी पुष्टि नहीं करते हैं।