हिंदू धर्म में राधाष्टमी का त्योहार बेहद हर्ष और उल्लास के साथ मनाया जाता है। इस साल 19 सितंबर को राधाष्टमी का पावन त्योहार मनाया जाएगा। जिस महीने में भगवान कृष्ण का जन्म हुआ था, उसी महीने में राधा जी का भी जन्म हुआ था। जन्माष्टमी के पर्व के दिन सुबह की पूजा के बजाय रात के 12 बजे की पूजा को खास महत्व दिया जाता है। इसी तरह राधाष्टमी पर सुबह की बजाय दोपहर 12 बजे की पूजा को अहम माना जाता है। जबकि हिंदू धर्म में ब्रह्म मुहूर्त में की गई पूजा को खास अहमियत दी जाती है। राधाष्टमी और जन्माष्टमी में दोपहर और आधी रात को पूजा करने की खास वजह है, जो भक्तों को जाननी चाहिए।
इस साल 4 सितंबर को जन्माष्टमी का त्योहार मनाया गया था। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इसी दिन भगवान कृष्ण का जन्म हुआ। संयोग से भादो महीने में ही राधा जी का भी जन्म हुआ था, जिस दिन सभी भक्त राधाष्टमी का त्योहार मनाते हैं। इस दिन सभी व्रत रखते हैं, ताकि भक्तों को राधा और भगवान कृष्ण का आशीर्वाद मिल सके। अब सवाल उठता है कि जब राधा और भगवान कृष्ण का जन्म अष्टमी तिथि में हुआ, तो दोनों के जन्म उत्सव अलग-अलग दिन क्यों मनाए जाते हैं? आइए जानते हैं।
यह भी पढ़ें: 17 या 18 सितंबर कब मनाई जाएगी विश्वकर्मा पूजा? तारीख और खरीदारी का टाइम जानें
क्या नहीं होती सुबह पूजा?
धार्मिक कथाओं के मुताबिक, कृष्ण जी का जन्म रात के 12 बजे हुआ था, वहीं दूसरी तरफ राधा जी का जन्म दिन के 12 बजे हुआ था। इस वजह से राधाष्टमी के दिन लोगों को सुबह पूजा नहीं करनी चाहिए, बल्कि दोपहर के 12 बजे पूजा करनी चाहिए। साथ ही लोगों को व्रत रखना चाहिए, ताकि लोगों के जीवन में प्रेम, सुख और शांति का वास हो। हालांकि, ब्रह्म मुहूर्त के दौरान भी भक्त मंत्र जाप कर सकते हैं। ब्रह्म मुहूर्त में किए गए मंत्र जाप को बेहद शुभ माना जाता है।
इसके अलावा, राधाष्टमी और कृष्ण जन्माष्टमी में रोचक बात यह है कि ये दोनों पर्व अष्टमी के दिन मनाए जाते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, भगवान कृष्ण का जन्म भादो महीने के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को हुआ था, जबकि राधा जी का जन्म भादो महीने के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को हुआ था। इसी वजह से कृष्ण जन्माष्टमी और राधाष्टमी अलग-अलग दिन मनाई जाती हैं।
यह भी पढ़ें: 17 सितंबर का राशिफल: विश्वकर्मा जयंती के दिन किन लोगों पर बरसेगी धन-संपत्ति
राधाष्टमी में पूजा करें
राधाष्टमी के दिन सभी भक्तों को ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करना चाहिए। जिसके बाद सूर्य देव को जल चढ़ाएं। इसके बाद साफ कपड़े पहनकर अपने घर के पूजा स्थान को सजाना चाहिए। दोपहर के 12 बजते ही विधिवत तरीके से राधा जी की पूजा-पाठ करनी चाहिए। पूजा के बाद जिन लोगों ने व्रत रखा है, उन्हें व्रत बरकरार रखना चाहिए और अगले दिन सुबह व्रत का पारण करना चाहिए। साथ ही राधाष्टमी के दिन लोगों को दान देना चाहिए।
नोट- यह लेख धार्मिक मान्यताओं और गणनाओं पर आधारित है। इसकी पुष्टि हम नहीं करते हैं।