सूर्य के मकर राशि में प्रवेश के साथ ही देशभर में मकर संक्रांति का पर्व श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है। इस पर्व के आते ही खासकर उत्तर भारत के घरों में खिचड़ी की खुशबू फैल जाती है। यह परंपरा केवल स्वाद या खानपान तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे धार्मिक आस्था, ऋतु परिवर्तन, आयुर्वेदिक विज्ञान और कृषि संस्कृति से जुड़ा गहरा महत्व छिपा हुआ है। सदियों से चली आ रही इस परंपरा के अनुसार मकर संक्रांति के दिन घर में खिचड़ी बनाना शुभ माना जाता है और इसे भगवान को भोग लगाकर प्रसाद के रूप में बांटा जाता है।
मौसम के सबसे ठंडे दौर में पड़ने वाले इस पर्व पर खिचड़ी को शरीर के लिए सबसे उपयुक्त आहार माना जाता है। चावल, दाल और देसी घी से बनी खिचड़ी न सिर्फ सुपाच्य होती है, बल्कि सर्दी में शरीर को ऊर्जा और गर्माहट भी देती है। यही वजह है कि मकर संक्रांति को कई क्षेत्रों में ‘खिचड़ी पर्व’ के नाम से भी जाना जाता है। नई फसल के स्वागत, सूर्य देव के प्रति कृतज्ञता और दान-पुण्य की भावना के साथ जुड़ी यह परंपरा आज भी भारतीय संस्कृति की समृद्ध विरासत को दर्शाती है।
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मकर संक्रांति पर खिचड़ी क्यों बनाई जाती है?
मकर संक्रांति के दिन सूर्य धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करते हैं। इसे सूर्य के उत्तरायण होने की शुरुआत माना जाता है। इस समय ठंड अपने चरम पर होती है और शरीर की पाचन शक्ति अपेक्षाकृत कमजोर हो जाती है। ऐसे मौसम में खिचड़ी सबसे उपयुक्त भोजन मानी जाती है, क्योंकि यह हल्की, सुपाच्य और ऊर्जा देने वाली होती है। इसी वजह से इस दिन विशेष रूप से खिचड़ी बनाई जाती है।
आयुर्वेद और स्वास्थ्य से जुड़ा महत्व
आयुर्वेद के अनुसार, सर्दियों में शरीर में वात दोष बढ़ जाता है। खिचड़ी में इस्तेमाल होने वाले चावल, दाल और देसी घी शरीर को अंदर से गर्म रखते हैं। साथ ही पाचन को बेहतर बनाते हैं। बता दें कि खिचड़ी में पड़ने वाली चीजें सर्दी, जुकाम और कमजोरी से बचाव करते हैं। यही वजह है कि मकर संक्रांति जैसे ठंडे मौसम के पर्व पर खिचड़ी को सबसे संतुलित और लाभकारी भोजन माना गया है।
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धार्मिक और पौराणिक मान्यताएं
धार्मिक दृष्टि से मकर संक्रांति दान-पुण्य का विशेष दिन माना जाता है। इस दिन खिचड़ी, तिल, गुड़, चावल और दाल का दान करना बहुत पुण्यदायी माना गया है। उत्तर प्रदेश और बिहार में भगवान को खिचड़ी का भोग लगाकर इसे प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है।
एक प्रचलित मान्यता के अनुसार, बाबा गोरखनाथ ने अपने शिष्यों को ठंड में पौष्टिक और जल्दी बनने वाला भोजन करने की सलाह दी थी, जिसके बाद खिचड़ी बनाने की परंपरा शुरू हुई। तभी से मकर संक्रांति पर खिचड़ी का विशेष महत्व माना जाता है।
कृषि और नई फसल से जुड़ा संबंध
मकर संक्रांति एक फसल उत्सव भी है। इस समय धान और दाल की नई फसल घर आती है। खिचड़ी में नई फसल के चावल और दाल का इस्तेमाल कर प्रकृति और सूर्य देव के प्रति कृतज्ञता प्रकट की जाती है। यह भोजन किसान संस्कृति और समृद्धि का प्रतीक भी है।
क्यों माना जाता है कि इस दिन खिचड़ी बनाना जरूरी है?
लोक परंपराओं के अनुसार, मकर संक्रांति पर खिचड़ी न बनाना शुभ नहीं माना जाता। माना जाता है कि इस दिन खिचड़ी बनाने से घर में सुख-समृद्धि आती है, नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और पूरे वर्ष स्वास्थ्य बना रहता है। इसी वजह से इसे एक शुभ परंपरा के रूप में निभाया जाता है।
मकर संक्रांति की खिचड़ी की विशेषता
इस दिन बनने वाली खिचड़ी सामान्य दिनों से अलग होती है। इसमें नई फसल का चावल, मूंग या उड़द की दाल, देसी घी, तिल और कभी-कभी गुड़ का इस्तेमाल किया जाता है। यही इसकी सबसे बड़ी विशेषता है, जो इसे धार्मिक और पौष्टिक दोनों बनाती है।
सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व
खिचड़ी ऐसा भोजन है जिसे हर उम्र और वर्ग का व्यक्ति खा सकता है। इसे बनाकर पड़ोसियों और जरूरतमंदों में बांटना सामाजिक एकता और भाईचारे का प्रतीक माना जाता है। यही वजह है कि यह पर्व केवल घर तक सीमित नहीं रहता, बल्कि समाज को जोड़ने का माध्यम बनता है।