हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में स्थित मसरूर रॉक कट मंदिर अपनी अद्वितीय शिल्पकला, प्राचीन इतिहास और धार्मिक मान्यताओं के वजह से पूरे देश में प्रचलित है। एक ही विशाल चट्टान को काटकर निर्मित यह मंदिर समूह न केवल हिमाचल बल्कि पूरे देश में रॉक-कट वास्तुकला का दुर्लभ उदाहरण माना जाता है। आठवीं शताब्दी के आसपास निर्मित इस मंदिर परिसर को 'हिमाचल का एलोरा' भी कहा जाता है, जो आज भी इतिहास, आस्था और कला में रुचि रखने वाले लोगों को आकर्षित करता है।
मसरूर मंदिर परिसर में एक ही पत्थर से उकेरे गए लगभग 15 मंदिर हैं, जिनमें नागर शैली की स्पष्ट झलक मिलती है। मंदिर की नक्काशी, मंडप, शिखर और गर्भगृह सभी चट्टान को काटकर बनाए गए हैं। 1905 में आए भीषण भूकंप से मंदिर का कुछ हिस्सा क्षतिग्रस्त जरूर हुआ लेकिन इसके बावजूद इसकी स्थापत्य भव्यता आज भी साफ दिखाई देती है।
यह भी पढ़ें: खिचड़ी, लोहड़ी, मकर संक्रांति और पोंगल में क्या अंतर है ?
मंदिर से जुड़ी विशेषता
मसरूर रॉक कट मंदिर 8वीं शताब्दी की शुरुआत में एक ही विशाल चट्टान को काटकर बनाये गए मंदिरों का समूह है। इसे 'हिमाचल का एलोरा' भी कहा जाता है, क्योंकि इसकी संरचना और नक्काशियां ऐसे ही विश्व प्रसिद्ध रॉक-कट मंदिरों की याद दिलाती हैं।
यहां कुल लगभग 15 छोटे-बड़े मंदिर एक ही पत्थर से बनाए गए हैं, जिनकी नींव, शिखर और मंडप सभी चट्टान से काटकर बनाई गई हैं। मंदिरों के बाहर और अंदर भगवान, देवी-देवताओं और पौराणिक कथाओं की अत्यंत विस्तृत और बारीक नक्काशी दिखाई देती है। मंदिरों का पूरा परिसर एक वर्गाकार ग्रिड के अनुसार व्यवस्थित है।
मंदिर से जुड़ा इतिहास
मसरूर मंदिर परिसर का निर्माण 8वीं शताब्दी के आसपास हुआ माना जाता है। यह उत्तर भारतीय नागर शैली की वास्तुकला का उत्कृष्ट उदाहरण है।
1905 में आए भूकंप की वजह से बहुत से हिस्से क्षतिग्रस्त हो गए, इसलिए मंदिर आज पुरातात्विक रूप से कुछ हद तक खंडहर में दिखते हैं लेकिन अभी भी कई संरचनाएं सुरक्षित स्थिति में हैं।
पहले इस स्थल पर अस्तित्व और निर्माण की योजना और भी बड़ी थी लेकिन भूकंप और समय के साथ इसके कई हिस्से अभी भी अधूरे क्यों हैं, इस पर शोध जारी है।
यह भी पढ़ें: पूजा में कुछ ही चीजों का हो सकता है दोबारा इस्तेमाल, इन चीजों से बनाएं दूरी
मंदिर से जुड़ी मान्यताएं
स्थानीय मान्यता के अनुसार, महाभारत के पांडवों ने वनवास के दौरान यही मंदिर निर्माण शुरू किया था लेकिन किसी वजह से अधूरा ही छोड़ना पड़ा। मंदिर परिसर में बना एक तालाब, जिसे द्रौपदी से जोड़ा जाता है।
एक लोककथा में कहा जाता है कि परिसर के भीतर बनी एक सीढ़ी स्वर्ग तक पहुंचने के मार्ग के रूप में बनायी जा रही थी, जिसे पूरा करने से पहले ही रोक दिया गया था क्योंकि देवों ने इसे रोक दिया था। इन कथाओं का कोई लिखित प्रमाण नहीं है, फिर भी स्थानीय लोग इन्हें आज भी मानते हैं।
मंदिर में किसकी पूजा होती है?
- मंदिर परिसर भगवान शिव को समर्पित माना जाता है, क्योंकि मुख्य मंदिर में भगवान शिव की मूर्ति और प्रतीक मिलते हैं।
- खुदाई के दौरान यहां राम, सीता और लक्ष्मण की मूर्तियां भी मिली हैं, जो आज मुख्य मंदिर के गर्भगृह में स्थापित हैं।
- आसपास के छोटे मंदिरों और नक्काशियों में विष्णु, इन्द्र, कार्तिकेय, आगेन और अनेक देवी-देवताएं दिखाई देते हैं।
- इसलिए यह कहा जा सकता है कि मसरूर का मंदिर परिसर कई हिंदू देवताओं को समर्पित है लेकिन मुख्य रूप से यह भगवान शिव, लक्ष्मण-राम-सीता और विविध देवी-देवताओं का स्थल है।
कैसे पहुंचे?
सड़क मार्ग के जरिए:
- मसरूर मंदिर कांगड़ा शहर से लगभग 32-35 किलोमीटर दूर है और धर्मशाला से करीब 50-51 किमी की दूरी पर स्थित है।
- यह नागरोटा-सुरियन रोड पर आता है। निजी टैक्सी, बस और कैब से आसानी से पहुंचा जा सकता है।
नजदीकी एयरपोर्ट
- सबसे नजदीकी हवाई अड्डा गग्गल एयरपोर्ट (धर्मशाला) है, जो दिल्ली से नियमित उड़ानों से जुड़ा है।
नजदीकी रेलवे स्टेशन
- निकटतम अच्छी कनेक्टिविटी वाला रेलवे स्टेशन पठानकोट रेलवे स्टेशन है।