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क्यों खास है रमजान में आने वाली लैलात अल-क़द्र?

रमजान के महीने में लैलात अल-क़द्र वह रात है जिसकी इबादत का सवाब 83 साल से भी ज्यादा है। ऐसा माना जाता है कि इसी रात को कुरान का धरती पर आगमन हुआ था, जिसे मुस्लिम समुदाय पूरे विश्वास के साथ मनाता है।  

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प्रतीकात्मक तस्वीर, AI Sora

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रमजान का पाक महीना अपने अंतिम पड़ाव पर है और इसी के साथ शुरू हो गई है उस रात की तलाश जिसे 'लैलात अल-क़द्र' या 'शब-ए-क़द्र' कहा जाता है। मान्यता है कि यह रात साल की तमाम रातों में सबसे बेहतर है। इस्लामिक जानकारों के मुताबिक, इस रात को किया गया नेक काम और इबादत एक हजार महीनों यानी लगभग 83 साल 4 महीने की इबादत से भी ज्यादा कीमती है।

 

यह वह रात है जब अल्लाह ने फरिश्ते जिब्रील के जरिए पैगंबर मुहम्मद पर पवित्र कुरान उतारने का सिलसिला शुरू किया था। इसी वजह से इस रात की अहमियत बढ़ जाती है। मुस्लिम समुदाय के लोग रमजान की आखिरी 10 रातों में से कुछ विषम रातों जैसे 21वीं, 23वीं, 25वीं, 27वीं और 29वीं में इसे तलाशते हैं और अल्लाह से अपने गुनाहों की माफी मांगते हैं।

 

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भाग्य और शांति की रात

इसे 'शक्ति या भाग्य की रात' भी कहा जाता है। माना जाता है कि इस रात अल्लाह अगले एक साल के लिए इंसानों के भाग्य, रिज्क यानी रोज़ी-रोटी और फैसलों की जिम्मेदारी फरिश्तों को सौंपता है। कुरान के सूरह अल-कद्र में जिक्र है कि इस रात फज्र यानी सुबह होने तक जमीन पर फरिश्तों का आना होता है, जो चारों तरफ शांति और बरकत लेकर आते हैं।

इबादत का खास तरीका

शब-ए-क़द्र की रूहानियत को पाने के लिए लोग मस्जिदों और घरों में जागकर रात बिताते हैं। इस दौरान ये खास काम किए जाते हैं जैसे कुरान की तिलावत। चूंकि यह कुरान के अवतरण की रात है इसलिए इसे पढ़ना और समझना सबसे अहम माना जाता है। 

 

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इस दिन विशेष नमाजे पढ़ी जाती हैं और पुराने गुनाहों से माफी मांगी जाती है। इसी दौरान बहुत से लोग आखिरी 10 दिनों के लिए मस्जिद में एकांतवास करते हैं ताकि पूरी तरह से इबाबत में डुबे रहे। इस रात को अपनी गलतियों की माफी भी मांगते हैं। 

नोट: इस खबर में लिखी गई बातें धार्मिक और स्थानीय मान्यताओं पर आधारित हैं। हम इसकी पुष्टि नहीं करते हैं।

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