सनातन धर्म में पितृ पक्ष को बेहद खास माना जाता है। इस दौरान लोग अपने पितरों की आत्मा को शांति और मोक्ष दिलाने के लिए पिंडदान की परंपरा निभाते हैं। पिंडदान और श्राद्ध के लिए बिहार के गया जी को सबसे ज्यादा अहम माना जाता है। इसी वजह से इस वक्त लाखों लोग गया जी के फल्गु नदी तट के किनारे पिंडदान की परंपरा निभा रहे हैं। इसी सिलसिले में सोशल मीडिया पर एक दिलचस्प वीडियो वायरल हो रहा है, जिसमें साफ तौर पर देखा जा सकता है कि रूस, यूक्रेन और जर्मनी की महिलाएं पिंडदान कर रही हैं। हिंदू धर्म ग्रंथ गरुड़ पुराण में गया जी में पिंडदान के महत्व के बारे में बताया गया है, जिसके बारे में लोगों को जानना चाहिए।
पितृ पक्ष के दौरान बिहार का गया सिर्फ भारत के लिए ही नहीं, बल्कि रूस, यूक्रेन और जर्मनी में रहने वाले लोगों के लिए भी खास बन गया है। सनातन पंचांग के अनुसार, पितृ पक्ष 27 सितंबर से शुरू हुआ और 10 अक्टूबर को खत्म होगा। धार्मिक मान्यता के अनुसार, गया में पिंडदान करने से न सिर्फ पितरों की आत्मा को शांति मिलती है, बल्कि पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है। अब सवाल उठता है कि गरुड़ पुराण में गया जी में पिंडदान को लेकर क्या बताया गया है? आइए जानते हैं।
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गरुड़ पुराण में क्या बताया?
सनातन धर्म में गरुड़ पुराण ग्रंथ को बेहद खास माना जाता है। इस ग्रंथ में जीवन, मृत्यु और मोक्ष के चक्र को लेकर अहम बातें बताई गई हैं। गरुड़ पुराण में बिहार के गया को लेकर भी बेहद खास बात बताई गई है। गरुड़ पुराण में बताया गया है कि धरती पर सर्वोत्तम तीर्थ स्थल गया है, जहां फल्गु नदी के किनारे पिंडदान करना सबसे उत्तम बताया गया है।
इसके साथ ही गरुड़ पुराण में बताया गया है कि जब व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है, तब उसके तुरंत बाद व्यक्ति की आत्मा को दूसरा शरीर नहीं मिलता है। कुछ समय तक व्यक्ति की आत्मा प्रेत अवस्था में रहती है। इसी वजह से व्यक्ति को पितरों की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान करना चाहिए।
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गया जी में पिंडदान करना क्यों है खास?
गरुड़ पुराण में बताया गया है कि बिहार के गया जी में भगवान विष्णु पितृदेव के रूप में विराजमान हैं। गया जी की फल्गु नदी में पिंडदान कराने का खास महत्व है। माना जाता है कि यहां श्राद्ध और पिंडदान करने से पितरों की आत्मा को मोक्ष मिलता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, व्यक्ति पितृ पक्ष में एक बार पिंडदान करने के बाद बार-बार पिंडदान करने की जरूरत नहीं होती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, राम जी ने अपने पिता का पिंडदान गया जी में ही किया था।