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कुत्ता खरीदने से पहले जरूर करवा लें यह मेडिकल टेस्ट, नहीं तो हो जाएगी प्रॉब्लम

अगर आप भी अपने घर में कुत्ता पालना चाहते हैं और अभी तक आपने कुत्ता नहीं खरीदा है तो आपको कुत्ता खरीदने से पहले की जरूरी मेडिकल टेस्ट के बारे में जान लेना चाहिए।

Pet Dog

AI इमेज। Photo Credit: Sora

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घर में पालतू कुत्ता रखना बहुत से परिवारों की इच्छा होती है। आजकल छोटे परिवारों में लोग कुत्ते को परिवार के सदस्य की तरह मानते हैं। कुत्ता न केवल घर की रखवाली करता है बल्कि बच्चों और बड़ों का अच्छा साथी भी बनता है लेकिन कुत्ता पालना इतना आसान भी नहीं है जितना हम समझते हैं। कुत्ते के पिल्ले को इंसानी बच्चे की तरह खाने से लेकर वैक्सीनेशन तक की जरूरत होती है। यही कारण है कि पिल्ला घर में लाने के साथ बहुत बड़ी जिम्मेदारी जुड़ी होती है।

 

अगर कोई व्यक्ति अपने घर में कुत्ता पालना चाहता है तो उसे कुत्ता खरीदने से पहले और खरीदने के बाद कई जरूरी मेडिकल जांच और टीकाकरण की जानकारी होना बहुत जरूरी है। सही जानकारी के अभाव में कुत्ते की सेहत को नुकसान हो सकता है और परिवार के अन्य सदस्यों पर भी असर पड़ सकता है। कई बार हम बिना मेडिकल जांच के पिल्ला खरीद लेते हैं लेकिन कुछ ही समय में वह बीमार हो जाता है और उसकी मौत हो जाती है। इसलिए पिल्ला खरीदने से पहले आपको उसको पालने के बारे में जरूरी जानकारी होनी चाहिए। इस आर्टिकल में हम आपको डिटेल में बताएंगे कि कुत्ता खरीदने से पहले कौन कौन से मेडिकल टेस्ट जरूरी होते हैं और एक या दो महीने के कुत्ते के बच्चे को कब कब कौन सी वैक्सीन लगवानी चाहिए और कब डॉक्टर को दिखाना चाहिए।

 

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कुत्ता खरीदते हुए रखें ध्यान

कई लोग सिर्फ इस बात से परेशान रहते हैं कि वह कु्त्ते का पिल्ला खरीदते हैं लेकिन घर लाते ही वह बीमार हो जाता है। यह वाक्या कई लोगों के साथ होता है। इसके पीछे लोग समझते हैं कि उनकी गलती है लेकिन ऐसा नहीं है। पिल्ले की मौत हो जाने का कारण जानकारी का अभाव भी हो सकता है। सबसे पहले आपको यह समझना जरूरी है कि कुत्ता खरीदना केवल भावनात्मक फैसला नहीं होना चाहिए। यह एक जिम्मेदार कदम है। 

 

मार्केट में कई जगहों पर कुत्ते बेचे जाते हैं लेकिन हर जगह सही और स्वस्थ कुत्ता नहीं मिलता। कई बार कुत्ते पहले से ही बीमार होते हैं और बाहर से देखने पर यह पता नहीं चलता। इसलिए कुत्ता खरीदने से पहले उसके मेडिकल टेस्ट करवाना बहुत जरूरी होता है। इससे यह पता चलता है कि कुत्ता किसी गंभीर बीमारी से तो पीड़ित नहीं है और वह भविष्य में घर के लिए सुरक्षित रहेगा। एक महीने के पिल्ले में आमतौर पर दो प्रमुख बीमारियां देखी जाती हैं। इसमें डिस्टेंपर और पार्वोवायरस शामिल हैं। अगर यह दो बीमारी पिल्ले में निकल जाती हैं तो उस पिल्ले को आप ना खरीदें क्योंकि उस पिल्ले के जिंदा रहने के चांस बहुत  कम होते हैं। 

 

मेडिकल रिपोर्ट जरूर लें

अगर आप मार्केट में कुत्ता खरीदने जा रहे हैं तो कुत्ते को खरीदने से पहले उसका मेडिकल टेस्ट जरूर करवा लें। वैटेनरी सर्जन कुत्ते के पूरे शरीर की जांच करके मेडिकल सर्टिफिकेट जारी करता है। उसकी आंखें कान नाक मुंह और त्वचा को ध्यान से देखा जाता है। मेडिकल जांच में देखा जाता है कि कहीं कुत्ते को कोई बीमारी या संक्रमण तो नहीं है। डिस्टेंपर और पार्वोवायरस जैसी बीमारी की भी जांच होती है।

 

इसके बाद कुत्ते का ब्लड टेस्ट करवाना बहुत जरूरी माना जाता है। ब्लड टेस्ट से यह पता चलता है कि कुत्ते के शरीर में खून की कमी तो नहीं है और किसी तरह का संक्रमण तो नहीं फैला हुआ है। कई बार कुत्ते में अंदरूनी बीमारी होती है जो बाहर से नजर नहीं आती। आम तौर पर मार्केट में पिल्ला खरीदते समय लोग बाहर से उसको देखते हैं और देखने में लगता है कि कुत्ता स्वस्थ है लेकिन वह किसी अंदरूनी बीमारी का शिकार होता है। ब्लड टेस्ट से लीवर और किडनी की स्थिति का भी अंदाजा लगाया जा सकता है। अगर ब्लड टेस्ट में कोई गड़बड़ी आती है तो कुत्ता खरीदने से पहले ही सतर्क हो जाना चाहिए।

 

 स्टूल टेस्ट क्यों जरूरी?

कुत्ता खरीदने से पहले उसका  स्टूल टेस्ट  यानी मल जांच जरूर करवा लें। इस टेस्ट से यह पता चलता है कि कुत्ते के पेट में कीड़े तो नहीं हैं। छोटे कुत्ते के बच्चों में पेट के कीड़े होना आम बात है लेकिन अगर यह ज्यादा हों तो कुत्ते की सेहत पर बुरा असर पड़ता है। कई बार पेट में कीड़े होने से कुत्ता बीमार रहने लगता है और यह उसकी मौत का कारण भी बन सकता है। अगर कुत्ते के पेट में ज्यादा कीड़े हैं तो यह इंसानों के लिए भी खरतरनाक हो सकता है, क्योंकि पेट के कीड़े इंसानों में भी फैल सकते हैं। इसलिए कुत्ता खरीदने से पहले यह जांच जरूरी मानी जाती है और मार्केट से कुत्ता खरीदने से पहले उसकी यह जांच जरूर करवा लें। 

 

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रेबीज का टीकाकरण

रेबीज एक बहुत ही खतरनाक बीमारी होती है जो कुत्ते से इंसान में फैल सकती है। इसलिए कुत्ता खरीदते समय यह जानना जरूरी है कि उसकी मां को रेबीज की वैक्सीन लगी थी या नहीं। अगर संभव हो तो वैटेनरी सर्जन से इस बारे में सलाह लेनी चाहिए। कुछ जगहों पर रेबीज से जुड़ा मेडिकल सर्टिफिकेट भी दिया जाता है जो बहुत जरूरी होता है। कुत्ता खरीदने से पहले आपको इस बात का भी ध्यान रखना है कि आप किस नस्ल का कुत्ता खरीद रहे हैं। कुछ खास नस्लों के कुत्तों के लिए वैक्सीनेशन अलग हो सकता है। अगर आप किसी खास नस्ल का कुत्ता खरीद रहे हैं तो उस नस्ल से जुड़ी आनुवंशिक बीमारियों की जानकारी भी जरूर ले लें। इसके लिए आप डॉक्टर की सलाह ले सकते हैं। कुछ नस्लों में हड्डियों की समस्या होती है तो कुछ में दिल से जुड़ी बीमारी का खतरा रहता है। इसलिए वैटेनरी सर्जन से सलाह लेकर जरूरी टेस्ट करवाने चाहिए ताकि भविष्य में आपको कोई दिक्कत ना हो। 

 

मेडिकल सर्टिफिकेट के बाद ही कुत्ता खरीदें

अगर आपने मन बना लिया है कि आपको कुत्ता खरीदना है तो आप यह बात समझ लें कि आपको कुत्ते के साथ उसका मेडिकल सर्टिफिकेट भी लेना है। जब सभी जरूरी टेस्ट के रिजल्ट ठीक आ जाएं तब ही कुत्ता खरीदना सही माना जाता है। मेडिकल सर्टिफिकेट लेना इसलिए जरूरी है क्योंकि कुत्ता खरीदने के बाद करीब छह महीने में उसे 6-7 वैक्सीन लगती हैं। इन वैक्सीन का रिकॉर्ड मेडिकल सर्टिफिकेट में होता है। इसके अलावा अगर कुत्ते का लाइसेंस लेना स्थानीय प्रशासन ने जरूरी किया है तो आपको उसके लिए भी मेडिकल सर्टिफिकेट की जरूरत पड़ेगी। 

समय से वैक्सीन लगवाना जरूरी

 

कुत्ते को खरीदते समय तो आपने वैक्सीनेशन और मेडिकल टेस्ट करवा लिया लेकिन उसके बाद भी कुत्ते को समय-समय पर वैक्सीन लगवानी होती है। आमतौर पर लोग एक या दो महीने का कुत्ते का बच्चा घर लाते हैं। यह उम्र बहुत नाजुक होती है और इसी समय सही देखभाल सबसे ज्यादा जरूरी होती है। हर दूसरे या तीसरे हफ्ते कुत्ते को वैक्सीन लगती है और यह सिलसिला 2 से 3 महीने तक चलता है। कुत्ते के वैक्सीनेशन क्रम को समझना बहुत जरूरी है।

 

जब कुत्ते का बच्चा लगभग छह से आठ हफ्ते का होता है तब उसकी पहली वैक्सीन लगाई जाती है। इस वैक्सीन से कुत्ते को कई खतरनाक बीमारियों से बचाया जाता है। इसमें डिस्टेंपर हेपेटाइटिस और पार्वो जैसी बीमारियों से सुरक्षा मिलती है। यह बीमारियां कुत्ते के बच्चे के लिए जानलेवा हो सकती हैं इसलिए पहली वैक्सीन बहुत जरूरी मानी जाती है। 

 

पहली वैक्सीन लगवाने के बाद कुत्ते के बच्चे को कुछ दिन तक बाहर नहीं ले जाना चाहिए। इस दौरान उसे साफ और सुरक्षित जगह पर रखना चाहिए। वैटेनरी सर्जन आमतौर पर पहली वैक्सीन के बाद कुछ जरूरी सावधानियां भी बताते हैं जिनका पालन करना जरूरी होता है।

 

पहली वैक्सीन के लगभग तीन से चार हफ्ते बाद दूसरी वैक्सीन लगाई जाती है। इसे बूस्टर डोज भी कहा जाता है। यह पहली वैक्सीन के असर को और मजबूत करती है। दूसरी वैक्सीन भी उतनी ही जरूरी होती है जितनी पहली। कई लोग पहली वैक्सीन के बाद लापरवाही बरतते हैं लेकिन यह कुत्ते के लिए खतरनाक साबित हो सकता है। दूसरी वैक्सीन के समय भी वैटेनरी सर्जन कुत्ते के बच्चे की सामान्य जांच करता है। उसका वजन देखा जाता है और यह भी जांचा जाता है कि पहली वैक्सीन के बाद कुत्ते पर कोई साइड इफेक्ट तो नहीं हुआ। अगर सब कुछ सामान्य होता है तो दूसरी वैक्सीन लगाई जाती है।

 

इसके बाद तीसरी वैक्सीन का समय आता है जो आमतौर पर कुत्ते के तीन महीने की उम्र में लगाई जाती है। इस वैक्सीन के बाद कुत्ता अंदरूनी रूप से बहुत मजबूत हो चुका होता है। हालांकि, कुत्ते को इस टीकाकरण के बाद भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं माना जाता। इसलिए कुत्ते को बाहर ले जाने के बारे में डॉक्टर की सलाह जरूर ले लें। एक बार जरूरी वैक्सीनेशन पूरा हो जाए तो आपको कुत्ते को डॉक्टर के पास ले जाने की जरूरत नहीं है। वैक्सीन के साथ साथ कुत्ते के बच्चे को समय पर डी वर्मिंग यानी पेट के कीड़ों की दवा देना भी जरूरी होता है। आमतौर पर यह दवा हर पंद्रह दिन या महीने में दी जाती है। वैटेनरी सर्जन कुत्ते की उम्र और वजन के अनुसार दवा की मात्रा बताता है। पेट के कीड़े कुत्ते की सेहत को कमजोर कर देते हैं इसलिए इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

 

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डॉक्टर की सलाह जरूरी

कुत्ते के बच्चे को हर वैक्सीन के समय डॉक्टर को दिखाना चाहिए। इससे डॉक्टर यह देख पाता है कि कुत्ता सही तरीके से बढ़ रहा है या नहीं। अगर किसी तरह की समस्या शुरुआती दौर में पकड़ में आ जाए तो उसका इलाज आसान होता है। चार से पांच महीने की उम्र में कुत्ते के दांत बदलने लगते हैं। इस समय उसे चबाने की आदत होती है। यह भी एक ऐसा समय होता है जब डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी होता है। गलत चीजें चबाने से कुत्ते को नुकसान हो सकता है। डॉक्टर सही खिलौने और खान पान की जानकारी देता है।

 

छह महीने की उम्र के आसपास कुत्ते को एक बार फिर सामान्य जांच के लिए डॉक्टर को दिखाना चाहिए। इस समय उसकी हड्डियों जोड़ों और वजन पर खास ध्यान दिया जाता है। अगर कुत्ता मोटा या बहुत कमजोर हो रहा है तो खान पान में बदलाव की सलाह दी जाती है। एक साल की उम्र पूरी होने पर कुत्ते को सालाना वैक्सीन लगाई जाती है। इसमें रेबीज और अन्य जरूरी वैक्सीन का बूस्टर शामिल होता है। इसके बाद हर साल एक बार यह वैक्सीन लगवाना जरूरी होता है। बहुत से लोग एक साल बाद वैक्सीन लगवाना भूल जाते हैं जो कुत्ते के लिए जानलेवा हो सकता है। 

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