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पिता कभी भारत के लिए नहीं खेल पाए, अब सारांश जैन पूरा करेंगे सपना

भारतीय टेस्ट टीम में चुने गए सारांश जैन का नाम अचानक सुर्खियों में आ गया है। बहुत कम लोग जानते हैं कि उनके पिता भी क्रिकेटर रहे हैं लेकिन वह कभी भारतीय टीम में नहीं खेल पाए।

saransh jain indian test team

भारतीय टीम में शामिल हुए सारांश जैन, Photo Credit: Social Media

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भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (BCCI) ने श्रीलंका के खिलाफ 15 अगस्त से शुरू होने वाली टैस्ट सीरीज के लिए टीम को ऐलान कर दिया है। इस टीम में सबसे ज्यादा चर्चा मध्य प्रदेश के अनुभवी ऑलराउंडर सारांश जैन की हो रही है। जिन्हें 33 वर्ष की उम्र में पहली बार भारतीय टेस्ट टीम में शामिल होने को मौका मिला है। लंबे समय से घरेलू क्रिकेट खेल रहे सारांश अगर इस सीरीज में डेब्यू करते हैं तो वह ज्यादा उम्र में डेब्यू करने वाले खिलाड़ियों में शुमार हो जाएंगे। सारांश को उनके पिता सुबोध ने ऑफ स्पिन की यह कला सिखाई थी। सुबोध खुद भी मध्य प्रदेश की रणजी टीम के लिए खेल चुके हैं। उनका सपना था कि वह भारत के लिए खेलें लेकिन उनका यह सपना पूरा नहीं हो पाया था। अब यही सपना उनका बेटा सारांश ने पूरा किया।

 

बात 2014 की है जब 21 वर्षीय सारांश जैन इंदौर के एक क्लब की टीम के साथ ऑस्ट्रेलिया का दौरा कर रहे थे और सीमित ओवरों की क्रिकेट में अपना सपना साकार करने की कोशिश में लगे थे। उस समय वह जब भी फोन करके अपने पिता सुबोध जैन के बारे में पूछते थे तो उनकी मां या बड़ा भाई बताते कि वह अभी व्यस्त हैं। हालांकि, उनके पिता उनके पहले और एकमात्र कोच भी थे। जब सारांश वापस घर लौटे तो वह अपने पिता को देखकर चौंक गए क्योंकि उनके पिता को मुंह का कैंसर हो गया था।

 

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सारांश के पिता 61 वर्षीय सुबोध ने कहा, 'सर्जरी के बाद मेरा मुंह बुरी तरह से सूज गया था और मैं बोल भी नहीं पा रहा था। जैसे ही सारांश ने मुझे देखा वह फूट-फूट कर रोने लगा। मैंने कलम उठाई और कागज के एक टुकड़े पर लिखा- बेटा तू जितना अच्छा करेगा, मैं उतनी जल्दी ठीक हो जाऊंगा।'

परिवार का सपना हुआ साकार

सारांश को मंगलवार को जब 33 वर्ष की उम्र में पहली बार भारतीय टेस्ट टीम में शामिल किया गया तो उनका और उनके परिवार का सपना साकार हो गया। इससे उनके पिता की लिखी बात भी सच साबित हो गई। जब सारांश हनुमान मंदिर में प्रार्थना कर रहे थे जब चयनकर्ताओं ने टीम की घोषणा की। सुबोध ने बताया कि लेकिन वह मंदिर के अंदर था और पहले फोन नहीं उठा पाया। वह जब बाहर आया तब उसे अपने चयन के बारे में पता चला। उन्होंने कहा कि मैं बेहद खुश हूं।

 

इस पूर्व ऑफ स्पिनर ने 9 रणजी ट्रॉफी मैचों में 23 विकेट लिए थे। उन्होंने कहा कि उन्हें शुरू से ही पता था कि उनका बेटा दूसरों से अलग है। सुबोध ने कहा, 'मुझे इसका अहसास तब हुआ जब वह अंडर-12 क्रिकेट खेल रहा था। सारांश और रजत पाटीदार 11 साल की उम्र से साथ खेलते आ रहे हैं। उसे खेलते हुए देखने वाले लोगों ने मुझे बताया कि उसमें कुछ खास बात है। बेशक मैं उसका कोच हूं लेकिन मैं उसका पिता भी हूं। सारांश के लिए यह सफर आसान नहीं रहा।' उन्होंने तमिलनाडु के खिलाफ रणजी ट्रॉफी में अपने पदार्पण मैच में पांच विकेट लिए लेकिन जल्द ही उन्हें टीम से बाहर कर दिया गया।

 

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बेटे को खास क्यों मानते हैं सुबोध?

सुबोध अपने बेटे सारांश के बारे में कहते हैं, 'मध्य प्रदेश के पूर्व कोच चंद्रकांत पंडित ने उसमें कुछ खास देखा है।' सारांश ने मध्य प्रदेश की रणजी ट्रॉफी में जीत में बल्ले और गेंद दोनों से अहम भूमिका निभाई। उन्होंने दलीप ट्रॉफी के दो मैचों में 16 विकेट लिए और ईरानी कप में भी अच्छा प्रदर्शन किया। सुबोध की अपने बेटे के लिए एक सलाह है,  'बेटा अगर मौका मिले तो बिंदास खेलना। किसी तरह का दबाव मत लेना। साथ ही वह कहते हैं कि अब सारांश रविचंद्रन अश्विन के वीडियो देखता है और सीखता रहता है लेकिन जब उसने शुरुआत की थी तब मैं उसका आदर्श था। मैंने अपने बेटे सहित रणजी ट्रॉफी में खेलने वाले कई खिलाड़ियों को कोचिंग दी है।'

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