उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के अलीगंज अग्निकांड केस में अब कार्रवाई का दायरा बढ़ता जा रहा है। लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA) के एक पूर्व उपाध्यक्ष को भी जांच में जिम्मेदार माना गया है और उनके खिलाफ रिपोर्ट जल्द शासन को भेजी जाएगी। इससे पहले एलडीए में अलग-अलग समय पर अहम जिम्मेदारियां संभाल चुके 6 वरिष्ठ पीसीएस अधिकारियों को दोषी ठहराते हुए उनके खिलाफ रिपोर्ट शासन को भेजी जा चुकी है।
अब SIT की सख्ती के बाद वर्ष 2016 से 2026 तक अलीगंज क्षेत्र में तैनात रहे 100 से अधिक अधिकारियों और अभियंताओं की भूमिका की भी जांच की जा रही है। सूत्रों के मुताबिक SIT जांच के आधार पर संबंधित अधिकारियों और अभियंताओं की जिम्मेदारी तय कर रही है। रिपोर्ट मिलने के बाद शासन स्तर पर प्रशासनिक कार्रवाई का दायरा और बढ़ सकता है। अलीगंज अग्निकांड के बाद अवैध निर्माण और प्रशासनिक लापरवाही को लेकर सरकार सख्त रुख अपनाए हुए है।
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6 वरिष्ठ PCS अधिकारी पहले ही हो चुके हैं चिन्हित
लखनऊ विकास प्राधिकरण ने 6 सीनियर पीसीएस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश करते हुए रिपोर्ट शासन को भेज दी है। इनमें अरविंद त्रिपाठी, वीवी मिश्रा, अरुण सिंह, संजय पांडेय, शिरीष वर्मा और डीके सिंह शामिल हैं।
एलडीए अब और बड़ी कार्रवाई की तैयारी कर रहा है। वर्ष 2016 से 2026 के बीच अलीगंज क्षेत्र में संपत्ति, मानचित्र, प्रवर्तन और विहित प्राधिकारी से जुड़े 100 से ज्यादा अधिकारियों और इंजीनियरों की पूरी सूची तैयार की जा रही है।
यह सूची शासन और SIT को भेजी जाएगी। इससे पहले एलडीए ने 18 इंजीनियरों और 6 अधिकारियों की सूची जांच के लिए भेजी थी। यह पूरी प्रक्रिया अलीगंज क्षेत्र में हुई अनियमितताओं की जांच का हिस्सा है।
VC और अधिकारियों से हुई पूछताछ
SIT के बुलावे पर एलडीए के मौजूदा वीसी प्रथमेश कुमार और एक अपर सचिव शनिवार को शासन पहुंचे। उनसे अवैध निर्माण को लेकर हुई लापरवाही, भविष्य में ऐसी घटनाएं रोकने के उपाय और संबंधित फाइलों के बारे में जानकारी ली गई है। एलडीए ने संपत्ति आवंटन, मानचित्र स्वीकृति और ध्वस्तीकरण आदेशों से जुड़ी फाइलें भी एसआईटी को उपलब्ध करा दी हैं।
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अधिकारियों और इंजीनियरों में बढ़ी नाराजगी
जांच का दायरा बढ़ने के बाद एलडीए के अधिकारियों और अभियंताओं में नाराजगी भी देखने को मिल रही है। उनका कहना है कि अवैध निर्माण के लिए सीधे जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई होनी चाहिए। केवल कुछ समय के लिए तैनात रहे अधिकारियों और कर्मचारियों को भी जांच के दायरे में शामिल करना न्यायसंगत नहीं है।