इलाहाबाद हाई कोर्ट ने हाल ही में एक पति की याचिका खारिज कर दी है। पति ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसे अपनी पत्नी को हर महीने 15,000 रुपये भरण-पोषण (मेंटेनेंस) देने का निर्देश दिया गया था। पति का कहना था कि उसकी पत्नी पढ़ी-लिखी है, नौकरी करती है और आर्थिक रूप से स्वतंत्र है। इसलिए उसे मेंटेनेंस नहीं मिलना चाहिए। पति ने पत्नी की 2018 की इनकम टैक्स रिटर्न दिखाई, जिसमें उसकी सालाना सैलरी 11 लाख 28 हजार 780 रुपये बताई गई थी।
पत्नी ने जवाब में कहा कि पति ने अपनी असली कमाई नहीं बताई। ट्रायल कोर्ट में पति ने खुद माना था कि वह अप्रैल 2018 से अप्रैल 2020 तक एक कंपनी में काम करता था और उसकी सालाना पैकेज करीब 40 लाख रुपये थी। जस्टिस मदन पाल सिंह की बेंच ने फैसला सुनाते हुए कहा कि भले ही पत्नी की कुछ कमाई हो, लेकिन दोनों की कमाई और आर्थिक स्थिति में बहुत बड़ा अंतर है। पत्नी की कमाई इतनी नहीं है कि वह उसी स्तर और आराम की जिंदगी जी सके, जैसी शादी के दौरान वह पति के साथ रहते हुए जीती थी।
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सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला
कोर्ट ने कहा, 'केवल पत्नी का नौकरी करना या कमाना ही मेंटेनेंस देने से इनकार करने का आधार नहीं है।' सेक्शन 125 CrPC का मकसद सिर्फ गरीबी से बचाना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि पत्नी सम्मान से जी सके, पति के स्तर के मुताबिक।
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया है कि पत्नी की कमाई होने से वह मेंटेनेंस के हक से वंचित नहीं हो जाती। असली जांच यह है कि क्या उसकी कमाई इतनी है कि वह वैवाहिक जीवन में मिले स्तर की जिंदगी जी सके।
जिम्मेदारी न निभाने का आरोप
पति ने यह भी कहा कि पत्नी ने खुद घर छोड़ा, वैवाहिक जिम्मेदारियां नहीं निभाईं और सास-ससुर के साथ रहने से मना कर दिया। साथ ही, पति को बीमार माता-पिता की देखभाल के लिए नौकरी छोड़नी पड़ी और उसके पास पैसे की कमी है।
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लेकिन कोर्ट ने कहा कि पति ने अपनी आर्थिक तंगी के सबूत नहीं दिए। सिर्फ बातें की गईं, कोई ठोस प्रमाण नहीं रखा।
अंत में जस्टिस सिंह ने कहा कि फैमिली कोर्ट का आदेश उचित, ठीक और पति की कमाई व स्थिति के अनुरूप है। इसमें कोई गलती या गैरकानूनी बात नहीं है। इसलिए पति की क्रिमिनल रिवीजन याचिका खारिज कर दी गई।